Amma - 2 in Hindi Moral Stories by Nandini Agarwal Apne Kalam Sein books and stories PDF | अम्मा - 2

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अम्मा - 2

अम्मा -२ 

मेरे सामने ' वाले घर से चीखने चिल्लाने की आवाजे आ रही थी। सुबह - सुबह सामने घर में कौन लड़ रहा है।

घर जाना उचित न समझा अभी तो इस घर में खुशिया मनायी जा रही थी। घर मे नयी नवेली दुल्हन है। हमारे साथ जो खेलता था। उस सुरेश की शादी हुई थी। अंकल आंटी ने सुरेश का विवाह किया था। फिर ये दुल्हन ने शोर मचाया मेरे साथ धोखा हुआ है। अपने बेटे की शादी करके जो कि औरत के लायक ही नहीं है। वो एक किन्नर है। बेटे ने अंकल आंटी से कहाँ जब आप लोगो से अलग हूँ । आप को मालूम था। तो मेरे साथ ऐसा क्यो किया की जो मैं इस लायक ही नही था। आप ने मेरी जिन्दगी बर्बाद कर दी। दुल्हन गोरी मायके वापस चली गयी।

जब यह बात किन्नरो को पता चली सुरेश को अपने साथ

ले गये। सुरेश के मां-बाप को पश्चात्पा रहा काश हम  शादी न करते तो हमारा बेटा हमारे पास रहता । अब वो उनकी दुनिया मे जा कर उन के जैसा हो जायेगा। हमारे साथ था। जब तक वो हमारे जैसा था। इस में न हमारा दोष है, न सुरेश का ये तो कुदरत का खेल है। जिस को वो जैसा बना दे। उधर सुरेश को लग रहा था। जैसे उसने दूसरा जन्म लिया है। जीते जी दूसरा जन्म दूसरो को खुश करना नाचना, गाना, बजाना पैसे मांगना बस यही रह गया जीवन । सुरेश सोचने लगा हम ने भी माँ की कोख से जन्म लिया है। मां के आंचल मे -छुपकर लिपटकर दूध पीया है। पिता ने कंधे पर बिठाकर मेला दिखाया है।

फरमाइश पूरी करी है। पढाई करी है। कमबख्त उम्र क्यों? बढ गयी। बचपन ही बढ़िय था। हमारा भी परिवार था। रिश्तेदार थे। क्यों? समाज के लिय हँसी के पात्र बन गये। हमारे अन्दर भी जान है। दिल धड़कता है। खून है। रगो में . दिमाग है। पूरा का पूरा शरीर है। बस समाज ने हमारा किन्नर समाज बना दिया । इंसान कुत्तो बिल्ली जानवरो को अपने घर मे पाल लेता है। लेकिन हिजड़ों को उनके परिवार से अलग करक सांस लेता है। इतना अशुंभ मानता है। शुभ कार्य योजना मे नचाता है। एक से एक दूसरे शहरो में नाचना गाना बजाना स्टेशनो पर चढ़ना उतरना वही लौट फिर कर यही काम कर ना । नाचता कौन नहीं है। सब नाचते हैं। डांसर बनते है। पैसे फैंके जाते हैं। सुरेश बोला बस हमारी जाति को एक हंसी का पात्र बना दिया जाता है। देख देख कर हंसा जाता है।

जाते. जाते लोग देखते है। और कहते हैं। देखो देखो हिजड़ जा रहे हैं। हमारा भी जन्म होता है। नाम सरनेम दिया जाता है। बचपन भी और बच्चो की तरह बचपन कटता है। साली उम्र जवान होते ही जीवन झरनूम बन जाता है। दुनिया मे सभी लोग शादी तो नही करते तो बहुत बिना संतान के भी रहते हैं। वंचित रह जाते है।

कोई सम्पूर्ण जीवन समाज सेवा मे लगाता है। धर्मकार्यों मे लगाता है। किन्नर जाति को अलग न कर के आम लोगो की तरह परिवार के सदस्य की तरह रहने दे। तो शायद वो अलग दिखने मे नही लगेंगे । समाज तो किसी का नही है। कामयाब लोगो का और नाकामयाव लोगो तो ये घृणा क्यों? सभी पृथ्वी लोक पर कर्म भोगता है। फिर ये पक्षपात क्यों? पूछता है सुरेश ? विकलांग ' दिव्यांग पेट से शरीर का कोई अंग हिस्सा खराब आना जब भी तो उस बच्चे को परिवार अलग नही किया जाता है। दो हजार बच्चो के बीच एक किन्नर पैदा होता है। माता पिता के हार्मोन्स की गड़बड से दोषी कोई नहीं है। किन्नर नाम का बालक क्यो अलग किया जाता है। पूछता है सुरेश ?