उजाले की ओर.... संस्मरण
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स्नेहिल नमस्कार मित्रों
बालपन भी क्या करतब दिखाता है और एक वह आयु जिसे किशोरावस्था कहते हैं जब वह आती है तब तो तौबा !क्या-क्या हरकतें होती हैं जिन पर डाँट का कहाँ कोई असर होता है ?और तो और डंडों का भी कहाँ होता है ?अब वह बात अलग है कि लड़कियाँ डंडे खाने से बच जाती हैं,देवी जो हुईं लेकिन ये किशोर बार-बार हरकतें भी वही करते हैं जिन पर घरवालों की लाल आँखें भी सहनी पड़ती हैं लेकिन भई दिल है कि मानता नहीं|अब डंडे पड़ें तो पड़ें ---क्या फ़र्क पड़ जाएगा लेकिन दोस्तों के सामने पड़ें तो गलत है भई !आखिर इज़्ज़त का सवाल होता !
लोदी गार्डन की गहरी हरियाली जमीन पर कितने ऊँचे-ऊँचे पलाश के पेड़ थे | हम सारे दोस्त जैसे रेस लगाते अपने ब्लॉक से निकलते ,सड़कों पर गाड़ियों की आवाजाही की परवाह भी कहाँ होती थी उन दिनों ! ऐसे साइकिलों को भगाते जैसे फ़्लाइट छूटने वाली हो । लंबी-लंबी साँसें भरते लोदी गार्डन पहुंचक पसीने से तरबतर अपनी साइकिलें पेड़ों के नीचे फेंककर उस चढ़ाई वाले ऊँचे पलाश के फूलों भरे पेड़ के नीचे ऐसे लोट लगाते जैसे वह गद्देदार पलंग हो| लोटपोट होते हुए इधर से उधर पूरे पेड़ का चक्कर लगाना और एक दूसरे से टकराकर खिलखिलाकर दाँत फाड़ना हमारा सबसे पसंददीदा खेल होता | बहुत गहने पलाश के पेड़ थे वहाँ,एक कतार में एक के बाद एक ! जहाँ पेड़ों को लगाया गया था वहाँ की जमीन कुछ ऊंची सी कर दी गई थी और मखमली घास की हरियाली तहें हमें उस पर लॉट् लगाने का आमंत्रण देतीं नज़र आतीं।
हमारा निवास था लोदी कॉलोनी के ऑफिसर्स क्वार्टर्स, अब उन्हें फ्लैट्स कह लीजिए |ऐसे ही तो होते थे वे, एक बड़ा सा हॉल,दो/तीन बैडरूम्स ! यूँ तो इतना बड़ा लॉन वहाँ पर ही था कि सारे बच्चे उसमें आसानी से खेल सकते ,खेलते भी थे लेकिन बाहर भागना सबकी चॉयस होती थी ।ब्लॉक के बीचोंबीच बीच का लंबा-चौड़ा हरी घास का हिस्सा यूँ ही बेचारा सा पड़ा रहता|उसमें तरह-तरह के झूले पड़े हुए थे जिन पर संध्या समय लगभग सभी परिवारों के बच्चे धक्का-मुक्की करते नज़र आते| कुछ बच्चे धक्का-मुक्की करने में चैंपियन थे जिन्हें झूलों पर जगह मिल जाती| ब्लॉक में बच्चों के ग्रुप्स भी तो थे|जिस ग्रुप के किसी धाकड़ बच्चों का झूलों पर अधिकार हो जाता उस ग्रुप के बच्चे झूलों पर फ़तह कर लेते और जिन्हें उस दिन मायूसी मिलती ,वे भी मायूस न होते |वे उस दिन अपनी-अपनी साइकिलें उठाकर ब्लॉक के एक गेट से दूसरे गेट के बीच में लाल बजरी पड़े हुए रास्तों पर साइकिलों की रेस लगाते,जिससे बजरी पर साइकिलें चलने की आवाज़ों को सुनकर सब खिलखिलाते हुए यहाँ से वहाँ बार-बार दुपहियों पर भागते नज़र आते |यानि उन दिनों खिलखिलाना जीवन का एक वह महत्वपूर्ण कार्य होता जिसके न होने से जैसे हमारा जीवन ही रुक जाता |
वैसे छुट्टियों में रात के बारह बजे तक लॉन पर बिछी उन चारपाइयों पर जितने दोस्त होते वे उछल कूद मचाते रहते और सुबह कितने बजे एक-दूसरे को उठाना है प्लानिंग बनती|शोर मचता तो घरों से आवाज़ आती;
“सो जाओ वरना सुबह लोदी गार्डन नहीं जा सकोगे---”
कुछ–कुछ देर के अंतराल में कुछ ऐसे ही शब्द वातावरण में हर उस घर से निकलते सुनाई देते जिस परिवार के बच्चे उन चार चारपाइयों पर कुदान मचा रहे होते|चार नहीं ---तीन ,चौथी चारपाई तो उस घर के सेवक की होती थी जिसके बच्चे वहाँ अपने बिस्तरे बिछवाने के लिए शाम ही से शोर मचाते|आखिर रात में रोशनी होते हुए भी घास पर चलना एलाउड़ नहीं था। कोई कीड़ा-मकौड़ा ही चिपट जाए ‘तो’?
ये ‘तो’ बच्चों के प्रति सरासर बेईमानी थी |बच्चे कहीं घूमने जा रहे हैं ‘तो’ उनके साथ कोई बड़ा जाना चाहिए अगर किसी परेशानी में फँस जाएं ‘तो’?कहीं कोई गलत आदमी मिल जाए ‘तो’?कभी बीच में किसी से मुठभेड़ हो जाए ‘तो’?या ‘तो’ फिर ये सारे मिलकर कुछ शैतानी करें और कहीं पर पिट-पिटा जाएं ‘तो’?बड़ों के द्वारा यह ‘तो’बड़ी ही कड़ी ज़ंजीर थी बच्चों के लिए !हम बच्चों को इस ‘तो’के अन्याय से बड़ी ही ऊब होती| और तो कुछ हमारे बस में था नहीं,हम बड़ों के सामने ‘रिवोल्ट’तो कर नहीं सकते थे ‘भुनभुन’ के अलावा|इस भुनभुन में अपने बड़ों के लिए आक्रोश मन ही मन उठता जो दूध के उबाल की तरह बैठ भी जाता|हम सभी वैसे तो बड़े समझदार थे न,कहीं ज़रा सा असभ्य व्यवहार हुआ कि हमारा मिलना-जुलना,ये बाग में जाने की मौज-मस्ती ---इन सब पर ‘सेंसर’ लग सकता था। हम बखूबी जानते थे।
लोदी कॉलोनी के पास ही था वह लोदी टॉम्ब का वो बड़ा बाग जिसमें बीच-बीच में कहीं-कहीं लोदी के समय की गोल गुंबद वाली प्राचीन इमारतें थीं जिनमें लोदी के वंशजों की स्मृतियाँ छिपी हुई थीं,उनके गुंबद बहुत ऊँचे थे। अपनी साइकिलें पेड़ों के नीचे ही पड़ी छोड़कर हम सब बच्चे लोट लगाकर फिर उन गुंबदों वाले ऊँचे-ऊँचे गोल खूब बड़े हॉल जैसे स्थानों में भागते-भागते घुस जाते और ज़ोर-ज़ोर से एक-दूसरे का नाम पुकारकर आवाज़ लगाते | वे आवाज़ें ऐसी गूंजतीं कि गडमड होती हुई एक दूसरे से टकराकर वापिस लौटती रहतीं और हम फिर वही क्रिया लगातार दोहराते रहते |मज़े की बात यह थी कि जब हम आवाज़ें लगाने से बोर हो जाते तब सब मिलकर ज़ोर-ज़ोर से खिल-खिल करते या शोर मचाने लगते|ये खिलखिलाहट और शोर की आवाज़ें एक-दूसरे से टकरातीं और हमें खूब मज़ा आता|बड़ों को आदत थी हमें टोकने की तो हमें आदत पड़ गई थी उनके टोकने को अनसुना कर देने की !
अक्सर हम सब अपने-अपने घरों में गार्डन से वापिस लौटने का समय बताकर आते थे जो हमने पहले दिन पक्का कर लिया होता था । दो घंटों में तो पक्का घर पर होंगे लेकिन कभी भी बताए हुए समय में घर में पहुँच गए हों,तो बात ही क्या? आधा-घंटा लेट हो जाने पर किसी न किसी घर का सहायक खोजता हुआ,ज़ोर ज़ोर से आवाज़ लगाता,साइकिल पर ज़ोरों से पैडल मारता वहाँ आ पहुँचता और हम सब उसे देखकर और भी दूर जाकर छिपने लगते। वे सब भी हमारी हरकतों को देखकर स्मार्ट हो चुके थे। जब हममें से कोई आवाज़ न सुनता,वह अपनी साइकिल रखकर हमारे अड्डे वाले पेड़ के नीचे आराम से लेट जाता|कई बार तो हमने वहाँ आकर ठंडी छाँव में खर्राटे लेते हुए देखा था उनमें से कई को। आखिर घर के काम के साथ हमारी चौकीदारी भी तो करनी पड़ती थी उन लोगों को !स्वाभाविक ही तो था उनका थक जाना और हरी घास का व ठंडी बयार का नाज़ुक सा स्पर्श पाकर झटोके आ जाना। हम कई बार उस बेचारे सोते हुए बंदे की साइकिल ज़बरदस्ती घसीटकर किसी गुंबद की दीवार या फिर पेड़ों के झुरमुट में छिपा आते और उसे सोने देते|उसी में तो अपनी भलाई थी यानि हमें शैतानी करने का और समय मिल जाता था न !देखा जाएगा जब डांट पड़ेगी ।
गर्मी की छुट्टियों में उधम मचाने में बच्चों को तो मज़ा आ जाता और मम्मी लोगों की आफ़त ! इतने लंबे वर्षों के अंतराल के बाद एक दिन अचानक मीनू का फ़ोन सुनकर मैं हकबका सी गई थी |“कहाँ से मिला नं ?”मुँह से आवाज़ भी नहीं निकल पा रही थी उसके। कैसे हो सकता है कि यह मीनू है|पता चला था वह शादी के बाद न्यूजीलैंड शिफ़्ट हो गई थी और मैं दिल्ली आती जाती रहती लेकिन डिग्री तो मुजफ्फरनगर में ही की थी और अब बरसों से अहमदाबाद रह रही थी । कभी भी पुरानी शरारतों की याद आती,पुराने मित्रों की याद आती और मन सोचता न जाने सब कहाँ होंगे !
“हाँ,यार बूढ़े हो गए हैं ,तेरी एक किताब हाथ आई और तेरा नं मिल गया ।“बहुत अच्छा लगा,बचपन के दिनों में दिल्ली में जो धमाके किए थे हमने मिलकर वे आँखों में चटकने लगे ।
बरसों बीत जाने पर एफ.बी के माध्यम से न जाने कितने पुराने दोस्त मिल गए थे लेकिन तलाशने पर भी कुछ नहीं मिले थे ।लगभग चालीस वर्षों के बाद जब अचानक मीनू का फ़ोन आया ,दिल की धड़कनें बढ़ने लगीं एक ही साँस में हम दोनों जैसे पूरे बीते हुए पास्ट को जी जाना चाहते थे। स्वाभाविक था ,परिवार की बातें हुईं,कौन कौन-कहाँ है कुछ मैंने बताया ,कुछ उसने । अब हर दस/पंद्रह दिनों में बातें होने लगीं थीं।धीरे-धीरे कई दोस्त जुड़ गए और उन लोदी टॉम्ब के दोस्तों का एक ग्रुप बन गया ।
समाचार भी मिलने लगे ,कौन है ,किसकी यात्रा पूरी हो गई । वॉट्सऐप के ज़माने में ,देश-विदेश में फैले हुए दोस्त वॉट्सऐप में सिकुड़कर बहुत खुश हो गए।सुहास मित्तल यू. के मैं है । भयंकर शैतान था बचपन में !वैसे कम तो हममें से कोई नहीं था इसलिए कचर-पचर होने लगी । एक दिन सुहास ने याद दिलाया कि सबको वो दिन याद है जब हम कोटला तक एक मांगने वाले के पीछे भागते गए थे ?उस दिन हम तीन/चार दोस्त गप्पें मारने में लगे थे कि सुहास के पूछने से उस दिन की रील आँखों के आगे से गुजरने लगी।
एक दिन हम हमेशा की तरह लोदी टॉम्ब गए और हर रोज़ की तरह साइकिल रेस लगा रहे थे।हम सभी दोस्त शायद 12 से 15 साल के बीच के रहे होंगे।साइकिल ऐसे भगाते जैसे फ़्लाइट निकलने वाली हो । यह तो हमारा रोज़ का शगल था।होली का समय था।पापा को उस दिन अपने मित्रों के साथ होली मिलन के लिए जाना था । मुझे भी कहा गया था कि उनके साथ जाना है । उन दिनों डॉ.स्वरूप सिंह दिल्ली विश्वविद्यालय में अँग्रेज़ी विभाग के विभागाध्यक्ष थे । पिता के विशेष मित्र ! उनके निवास पर होली मिलने सभी मित्र आने वाले थे ।
“आज मत जाओ ,होली का दिन है ,बेकार सड़कों पर कोई भिगो देगा । स्वरूप चाचा जी के यहाँ जाना है न !”बड़ी समझदारी से मैंने गर्दन तो हिला दी थी लेकिन मेरे अकेली के ऊपर तो था नहीं कि जल्दी आ जाती । सबके साथ जाना तो सबके साथ ही लौटना भी होता न !
“अंकल ! हम जल्दी आ जाएंगे जल्दी जाकर –”सुहास के साथ सब बच्चों ने मिलकर पापा को पटा ही तो लिया लेकिन पापा ने आँखों ही आँखों में मुझे समझा दिया था कि टाइम पर आ जाना नहीं तो खैर नहीं। हर बार की तरह ही हम सब शरारतें करने में मशगूल !क्या होली,किसकी होली ? उस दिन तो हम जल्दी निकले हुए थे फिर भी शरारतों को रोक लेना हमारे बसकी बात नहीं थी । हो गई देर ! उस दिन पापा को खुद मुझे लेने आना पड़ा । सारे बच्चे तो इधर-उधर हो गए ,मैं कहाँ भाग सकती थी ? पापा ने कान पकड़कर खींचा ,रुलाई फूट पड़ी । आदत तो थी नहीं कोई डांट खाने की ,ये तो सरे आम कान पकड़ा गया था । दर्द से ज़्यादा अपमानित महसूस किया होगा । आँखों में आँसू भरे पापा के साथ गाड़ी में आ बैठी।
“रोना बिलकुल नहीं है,गलती करते हो तो---” मेरे कारण उन्हें देर हो गई थी । उन दिनों जेब में फ़ोन तो होते नहीं थे। बात तो सब समझ में आ रही थी लेकिन सारा गुस्सा सुहास पर था । उसने ही पापा को पटाया था और वही था जिसकी वजह से मुझे पापा की डाँट खानी पड़ी थी।
होली जब भी आती है,पीले पृष्ठ उड़-उड़कर सामने आने लगते हैं जो रंग बदलते रहते हैं।पलाश के तले शरारती दोस्तों के साथ गुजारे हुए लम्हे आज भी ऐसे स्मृति पटल पर चिपके हुए हैं मानो कल की ही बात हो लेकिन सारे पृष्ठ गोंद से ऐसे चिपके हुए हैं जिन्हें खोलने में मस्तिष्क को पूरी कसरत करनी पड़ती है ।
संस्मरण के साथ सभी मित्रों को रंग भरे जीवन की मंगलकामनाएं !!
सस्नेह
डॉ. प्रणव भारती