Towards the Light – Memoirs in Hindi Moral Stories by Pranava Bharti books and stories PDF | उजाले की ओर –संस्मरण

Featured Books
Categories
Share

उजाले की ओर –संस्मरण

स्नेहिल नमस्कार मित्रो

     कभी कभी हम अपने आपसे डरकर जीते हैं। कोई भी अप्रत्याशित घटना जीवन में हुई नहीं कि हम घबरा जाते हैं। भूल जाते हैं कि यदि हम कुछ भी करना चाहें तो कर सकते हैँ। जरूरत है अपनी इच्छाइयों को देखने की. उन्हें पहचानकर पूरे विश्वास से आगे बढने की!

रामायण में कहीं एक प्रसंग आता है,जो कुछ समझने के लिए बाध्य करता है। जब सीता जी का हरण हुआ, उनका पता लगाने के लिए समुद्र को फांद कर लंका जाना था। तब वहाँ सभी उपस्थित लोग अपनी अपनी शक्तियों का बखान कर रहे थे।कोई कह रहा था कि मैं 10 योजन कूद सकता हूँ कोई 15, और सभी अपने आप को जीनियस समझ रहे थे, तो भी वो पूरा  नही पड़ रहा था क्योंकि दूरी काफी अधिक थी। हनुमान जी चुपचाप बैठे हुए थे।  जामवंत जी को  हनुमान जी की शक्तियों के  विषय में सब कुछ मालूम  था। उन्होंने हनुमान जी से कहा कि पवनपुत्र!  सीता का पता लगानेआप जाइये । हनुमान जी ने कहा कि यह दूरी अधिक है तब जामवंत जी ने उनको उनकी शक्तियों के बारे में याद दिलाया इसके बाद हनुमान जी  पूरे आत्मविश्वास से समुद्र को लांघ कर लंका गए। 

     यदि जामवंत जी उनको याद न दिलाते तो क्या वो अपनी शक्तियों के विषय में जान पाते, और जिस रूप में आज हम उनको याद करते हैं, पूजते हैं, उन्हे पूज पाते? याद कर पाते? मतलब साफ है कि हम सबको अपनी शक्तियों को पहचानना चाहिए। हमें स्वयं अपने आपको पहचानकर स्वयं को आगे बढना चाहिए।

अपने जीवन में बहुत कम लोग, होशियार, जीनियस बन पाते हैं।  अधिकतर लोग औसत दर्जे के ही रह जाते हैं। औसत रहने वाले लोग सोचते हैं कि शायद उनकी आई क्यू लेवल कम है, इसलिए वो औसत हैं, पर ऐसा नहीं है। दरअसल अधिकतर लोग 'औसत जीवन' इसलिए जीते हैं क्योंकि वे अपने भीतर की क्षमता को पहचान नहीं पाते, उनके जीवन में दूरदर्शिता का अभाव होता है। 

आवश्यक है कि हम सब अपने भीतर छिपी हुई शक्तियों को पहचानें और अपने जामवंत और अपने हनुमान स्वयं बनें।

   जीवन में सदा अपने चारों ओर देखकर चलें, अपने भीतर की शक्तियों को स्वयं पहचानकर बिना कहीं रुके अपने जीवन के लक्ष्य की ओर बढते रहें। हम अपने लक्ष्य पर पहुंचकर स्वयं पर गर्व करेंगे।

आप सबकी मित्र

डॉ. प्रणव भारती