ये ट्रेन थी। पश्चिम रेलवे की
7उप और 8डाउन यह ट्रेन आगरा और बीकानेर के बीच चलती थी।
101व 102 ट्रेन बांदीकुई और आगरा के बीच चलती थी।
5उप व 6डाउन यह ट्रेन आगरा से अहमदाबाद के बीच चलती थी।
NE रेलवे की भी उन दिनों तीन ट्रेन चलती थी।
11अप व 12Down यह ट्रेन आगरा और काठगोदाम के बीच चलती थी।
13अप व 14 down ट्रेन आगरा से लखनऊ के बीच चलती थी।
व एक ट्रेन आगरा से कानपुर के बीच चलती थी।
अब पहले मैं मेहताजी के बारे में बता दूं। जैसा उनका भय स्टेशन पर बना रखा था। वैसे वह थे नहीं। वे निसंतान थे और बहुत ही रहम दिल व खुश मिजाज थे। उनके पास काम करके ही दो लोग अस्थाना व कपूर आगे पढ़ाई करके अस्थाना सेंट जॉन्स कॉलेज में जबकि कपूर राधा स्वामी कॉलेज, दयाल बाग में लेक्चरर हो गय थे।
उन दिनों मेरी शादी नहीं हुई थी। और मैं ऑफिस प्राय दो तीन घंटे पहले पहुंच जाता। और बड़े बाबू यानी मेहताजी के पास बैठकर काम करता। उन दिनों बुकिंग ऑफिस में काम बहुत होता था क्योंकि सब कुछ मैनुअल होता था। हर दस दिन बाद ग्रॉस अर्निंग स्टेटमेंट बनता जो कोटा जाता था।हर पीरियड, रेल में पीरियड तीन होते है
1तारीख से 10 तक पहला
11तारीख से 20तक दूसरा
21से महीने का अंतिम दिन तीसरा
हर पीरियड की बैलेंस शीट अलग बनती और फिर तीनों को मिलकर महीने की।
महीने के अंत में तो पूरे महीने का ब्यौरा और तमाम तरह के स्टेटमेंट जाते थे।हर बाबू का काम भी निर्धारित था। बड़े बाबू का काम समरी बनाकर अलग अलग बंडल बनाना व कोरियर को देना था। मैं इस काम में मेहताजी की मदद करने लगा।
उन दिनों कार्ड वो पेपर टिकट का जमाना था। छोटी दूरी के टिकट भी खूब बिकते थे। कार्ड टिकट अजमेर से प्रिंट होकर आते थे। एक एक स्टेशन के टिकट लाखों की संख्या में आते थे।थे पांच पांच हजार के बंडलों में आते । उन्हें गिनना पड़ता और मैं बड़े बाबू के साथ टिकट गिनाता उन्हें अलमारी में जमवाता। जिन मेहता जी के साथ लोग काम करने से घबराते जल्दी ही में उनका प्रिय बन गया और वह मुझे पुत्र समान स्नेह देने लगे।
मेहताजी जिंदादिल और निडर किस्म के इंसान थे। यार वास भी। मे उन दिनों सब से जूनियर था और कहीं भी जहां जरूरत होती भेजा जाता पर मेहताजी मुझे बचाकर रखते।लेकिन
सन 1971में मुझे पंद्रह दिन के लिए जाना पड़ा। अभी तक मुझे याद है , जिस दिन में गया उस दिन 3दिसंबर था। पहले मैं दिन में गया ताकि पता कर सकू मेरी ड्यूटी कौनसी है। और मेरी रात की ड्यूटी थी। उस समय वहां पर इंचार्ज गिरधारी लाल थे और स्टेशन अधीक्षक थे अमरजीत जो बाद में प्रमोट होकर अधिकारी भी बन गए थे।
और रात की ड्यूटी 10 बजे से थी। रात में समरी बनाना, डी टी सी क्रॉस करना, नॉन इशू स्टेटमेंट आदि कार्य भी टिकट बांटने के अलावा करने होते थे।
जब मैं बुकिंग में काम कर रहा था। बुकिंग ऑफिस बाहर की तरफ था। अचानक शोरगुल हुआ जिसे सुनकर में भी बाहर आ गया। सब स्टाफ मुसाफिर खाने में था
और आगे अगले भाग में