Bade dil wala - Part - 12 in Hindi Motivational Stories by Ratna Pandey books and stories PDF | बड़े दिल वाला - भाग - 12

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बड़े दिल वाला - भाग - 12

अभी तक आपने पढ़ा कि अनन्या अपने पति अनुराग से दूरी बनाकर वीर के साथ मिलन की कोशिश करती रही। पहले दिन वह अपने पिता की बात और मंगलसूत्र देखकर रुक गई और शादी के बाद ही संबंध बनाने की शर्त रखी। लेकिन अगले दिन जब वह वीर के घर पहुँची तो उसने देखा कि वीर किसी और लड़की के साथ था। यह दृश्य देखकर अनन्या का भरोसा और उसका अधूरा प्रेम पूरी तरह टूट गया। अब इसके आगे -

अनन्या को वीर के कमरे में चल रहे उस दृश्य पर बिल्कुल विश्वास नहीं हो रहा था, उसके पैर मानों ज़मीन में धंसे चले जा रहे थे। उसकी आंखों में खून उतर आया था। इतना बड़ा विश्वासघात ...? वीर तो उसे गंगा की तरह पवित्र रहने को कहता है और ख़ुद ही ...!

यही सोचकर वह उल्टे पांव वहाँ से चुपचाप वापस आ गई।

घर से जाते समय वह अनुराग की तकिया के नीचे एक काग़ज़ लिखकर गई थी, जिस पर लिखा था "सॉरी।" उसने सोचा था, आज जब वह वीर के पास पहुँचेगी, तो वह उसे वापस कहाँ आने देगा। वह तो हमारे अधूरे मिलन को पूरा करने के लिए कितना उतावला हो रहा है। आज वह भी उसे मना नहीं कर सकेगी। कल कितना दुखी हो गया था वह। वह भारी कदमों से घर की तरफ जाने के लिए निकल गई। रिक्शा करके वह जल्दी घर पहुँच जाना चाहती थी। इस समय  घर में  कोई भी नहीं होगा सोचकर वह थोड़ी राहत महसूस कर रही थी।

इधर अनुराग आज ऑफिस से जल्दी घर वापस आ गया था क्योंकि उसका ऑफिस में मन लग ही नहीं रहा था। उसके भी दिमाग़ में कई तरह की बातें आना-जाना करके उसे परेशान कर रही थीं। उसने घर आकर देखा तो अनु घर पर नहीं थी।

अनुराग परेशान हो गया, पर उसने उसे फ़ोन नहीं लगाया। वह अपने बिस्तर के पास गया और बैठकर तकिया उठाकर अपने पैरों पर रखने लगा, तो उसे एक काग़ज़ दिखाई दिया। उसने काग़ज़ उठाया, तो उस पर लिखा था "सॉरी।"

अनुराग का शक यक़ीन में बदल गया। वह सोच रहा था, मतलब अनु उसे छोड़कर चली गई। तभी उसे दरवाजे पर कुछ आहट सुनाई दी, तो वह जल्दी से काग़ज़ उसी तरह तकिया के नीचे रखकर सोने का नाटक करने लगा।

तभी अनन्या कमरे में आई और अनुराग को सोया देखकर वह दंग रह गई। इतनी जल्दी यह कैसे आ गए। परंतु तकिया उसी तरह रखी थी जैसे वह रखकर गई थी। वह अनुराग की तरफ़ देख रही थी। वह सोच रही थी कि कितने अच्छे इंसान हैं ये, जो उसकी किसी भी बात पर अब तक नाराज नहीं हुए। पापा का निर्णय सही था। वह वीर को अच्छी तरह पहचानते थे। इसीलिए उन्होंने उसे उस नर्क में जाने से रोक लिया। वह मन ही मन कह रही थी, "थैंक यू पापा।"

पापा और मम्मी का कहना न मानकर उसने बहुत बड़ी गलती कर दी है। उसे वीर के पास इस तरह नहीं जाना चाहिए था। सच में, अपने माता-पिता से बढ़कर दुनिया में और कोई नहीं होता। वह हमेशा हमारे भले की ही सोचते हैं। हम ही उनकी बातों को इस तरह नज़र अंदाज़ कर जाते हैं। काश, उसने उनकी बात मान ली होती, तो आज अनुराग से नजरें मिलाने की हिम्मत न खोती। लेकिन अब पछताने से क्या फायदा, अच्छा हुआ जो उसने सच्चाई अपनी आंखों से देख ली, वरना यदि पापा कहते, तो शायद वह अभी भी सही नहीं मानती।

तब तक अनुराग ने आंखें खोलीं और पूछा, "अरे अनु, तुम कहाँ चली गई थीं? कुछ चाहिए था तो मुझे बता देतीं, मैं ले आता।"

सब कुछ समझकर भी अनुराग अनजान बन रहा था क्योंकि उसने तो अनन्या को पत्नी के रूप में स्वीकार कर लिया था। उसके लिए विवाह का बंधन ऐसा पवित्र बंधन होता है जिसे हर क़ीमत पर निभाया जाता है। 

रत्ना पांडे, वडोदरा (गुजरात)
स्वरचित और मौलिक 
क्रमशः