Prem n Haat Bikaay - 38 in Hindi Love Stories by DrPranava Bharti books and stories PDF | प्रेम न हाट बिकाय - भाग 38

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प्रेम न हाट बिकाय - भाग 38

38 

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  शीनोदा बेटी और पत्नी को लेकर आना के पास आ गया जबकि उसकी सास चाहती थीं कि वे अपनी देख-रेख में अपनी बेटी और धेवती को कुछ दिन रखें और कुछ बातें समझा भी सकें लेकिन शीनोदा ने उन्हें आश्वस्त किया कि कुछ दिनों में वह उनके कोटा जाने की व्यवस्था कर देगा लेकिन अभी कुछ दिन तो उन्हें अहमदाबाद के डॉक्टर्स के सुपरविजन में रहना चाहिए और पहुँच गया आना के पास | उसके पास अब कुछ दिन ही बाकी थे, उसे एक बार फिर से जापान का चक्कर मारना ही था | वैसे रंजु की  माँ ने बहुत सी बातें उसे सिखाने की कोशिश की थीं लेकिन इतना आसान भी नहीं था शीनोदा के सामने कुछ कह या सिखा पाना आना के परिवार के विरुद्ध ! कोई प्लानिंग तो करनी ही पड़ती उन्हें !

   खैर, शीनोदा ने आना की सहायता से अहमदाबाद के प्रसिद्ध डॉक्टर से पत्नी व बेटी का चैक-अप करवाया, कुछ भी तो नहीं था |बेकार ही शोर मचा रखा था | हाँ, थोड़ी कमजोरी रहनी स्वाभाविक थी|हो जानी थी ठीक थोड़े दिनों में | आना और विवेक ने समझाया, समझ में तो आया उसकी लेकिन अभी भी उसी बात पर चिपकाकर बैठा था कि कोटा के डॉक्टर ने उसे विदेशी देखकर उससे पैसे तो बहुत लिए हैं लेकिन उनका स्टाफ़ व वे खुद ठीक नहीं थे | उनका व्यवहार बहुत रूड था | विवेक जानते तो थे ही कि ऐसा होता तो है यानि खरीदारी से लेकर कहीं भी विदेशियों को देखकर होता तो यही सब है लेकिन आप समाज के कानों तक किसी न किसी माध्यम से सही और गलत का विश्लेषण कर पहुँचा तो सकते हैं लेकिन यह इतना आसान भी नहीं होता क्योंकि ‘अवेयरनैस’के लिए पहले आपको तैनात होना पड़ता है और आपके पास न तो इतना समय होता है और न ही वह शिद्दत कि मोर्चे पर डटकर खड़ा हो सकें |इसलिए विवेक ने बहुत समझाया तब कहीं जाकर उसने भिनभिनाना छोड़ा|

उसको फिर से जापान का चक्कर मारना था, पहले कहने लगा यहीं अहमदाबाद में रह लेगी फ़ैमिली जब तक वह एक चक्कर जापान मारकर आएगा |रंजु बेचारी परेशान ! स्वाभाविक था, उसे माँ के पास रहना अधिक सुविधापूर्ण लगता | 

रंजु ने आना से कहा;”दीदी!आप ही कहिए न, भला आप ही बताइए, मम्मी–पापा को कैसा लगेगा?ठीक तो हूँ मैं ---फिर इन्हें जाना ही है, जब आएंगे तब --” 

उसका कहना ठीक ही तो था |रंजु ने अभी ठीक प्रकार से शीनोदा को जाना भी कहाँ था? पहली बार उसका नाराज़गी का रूप देखा उसने अपनी डिलीवरी के समय पर ! वरना वह तो नाप-तुला बोलने वाला, बहुत सभ्य, सलीकेवाला इंसान था| 

आना और विवेक ने उसे बैठाकर समझाया तब कहीं वह समझा और रंजु व बच्ची को कोटा छोड़ने के लिए गया |उसने कहा कि फिर वह, उधर से दिल्ली से ही जापान चला जाएगा | चलो, सबके मुँह पर तसल्ली सी दिखाई दी | 

“दीदी !मैंने कुछ लिखा है, आप देख लेंगी ?” रंजु ने जाते-जाते एक कागज़ों का पुलिंदा आना के हाथ पर रखा ---“ आना उसे इधर-उधर घुमाकर देखने लगी तो रंजु बोली;

“ऐसे नहीं, पढ़कर देखिएगा | जरूरी नहीं, आपको पसंद ही आए | मैंने अपने जापान पहुँचने और वहाँ की संस्कृति के बारे में कुछ कहने की कोशिश की है, जितना और जैसा मैं लिख पाई हूँ| अगर कुछ ठीक सा होगा तो आगे कभी पब्लिश करने के बारे में सोचूँगी ---–“उसने संकोच से कहा | 

    आना ने रंजु और बच्ची  को प्यार किया और कागज़ों का पुलिंदा एक तरफ़ संभालकर रख दिया और भूल गई |सोचा, जैसे ही समय मिलेगा, पढ़ लेगी |         

      अनामिका अब डिग्री कॉलेज में पढाने लगी थी| एक दिन वह कॉलेज से आकर लेटी ही थी कि अचानक उसको याद आया, रंजु उसे कोई पुलिंदा थमाकर गई थी, वह भूल ही गई| वह उठी और उस पुलिंदे को खोजने का प्रयास करने लगी जो उसे आसानी से उसकी अलमारी में फ़ाइलों के बीच मिल गया | आना ने रबरबैंड से लिपटा कागज़ों का रोल खोला और बिस्तर पर ही गाव ताकिए लगाकर पढ़ने बैठ गई | उसकी चाय आ गई थी, उसने इशारा करके  चाय-नाश्ता साइड-टेबल पर रखवा दिया |रंजु ने कुछ ऐसे लिखना शुरू किया था --    

“जिंदगी का सफ़र है ये कैसा सफ़र, कोई समझा नहीं कोई जाना नहीं...
सच कहा है किसी ने ।
मैं रंजु, भारत में मध्यम परिवार में जन्मी, पली, बढ़ी | कभी सपने में भी नहीं सोचा था कि किसी विदेशी से शादी करुंगी और विदेश में आ जाऊंगी।
पर किस्मत की रेखाओं को कुछ ऐसा ही मंजूर था। मेरी एक जापानी लड़के से शादी हुई और मैं जापान चली आई।शादी का निर्णय करने में मुझे कोई ज्यादा देर नहीं लगी क्योंकि मैं हमेशा कहती थी  मैं किसी ऐसे लड़के से शादी करुंगी जो दहेज नहीं लेगा|हमारे यहाँ क्या नौटंकी होती थी, मैं न जाने कितनी बार देखकर बोर हो चुकी थी|लड़की चाय लेकर आएगी, उसकी चाल देखी जाएगी और पूछा जायेगा घर का काम करना आता है?कभी गाना गाने का आदेश होगा तो कभी माँ उछल-उछलकर लड़की के कमरे या बरामदे या फिर छोटे से उस ड्राइंग-रूम में जो पेंटिंग्स लटकी होंगी, उन्हें बड़े उत्साह से दिखाएंगी, चाहे वे उसकी बनाई हुई हों या न हों, यहाँ तककि कभी तो शंभू हलवाई के यहाँ से आए समोसे और गुलाबजामुन भी उनकी बेटी के ही कमाल हैं, बताया जाएगा चाहे बेटी को यह भी मालूम न हो कि समोसा आटे से बनता है, मैदा से या फिर सूजी से –और मज़े की बात है कि उसे चुप रहना होगा। किसी बात पर उसका कोई बस तो होगा ही नहीं, कम से कम शब्दों में जवाब देना होगा चाहे अंदर से उसे लग रहा हो कि माँ के झूठ का भांडा फोड़ दे !यानि ऐसा ही ड्रामा ---वगैरह... वगैरह... लड़कियों की एक नुमाइश (प्रदर्शनी) बना देते हैं जैसे !कोई सोचता भी है कि उस समय लड़की कितनी उलझन महसूस कर रही होगी |लड़के से कोई कुछ पूछता ही नहीं...ये क्या बात हुई भला –”

 अनामिका के चेहरे पर मुस्कान पसर गई|उसके सामने कागज़ों पर सच खुला हुआ था|ऐसे ही तो होता है अधिकतर, मज़े की बात यह है कि शिक्षित परिवारों में भी यह आम है|लड़कियों के मन में विद्रोह न हो तो भला क्या हो ?आगे रंजु ने लिखा था ---
“मुझे ऐसे रीति-रिवाज पसंद नहीं थे। इसलिए हमेशा घर पर कहा करती थी मुझे ऐसी शादी नहीं करनी जहाँ लड़की की नुमायश ही बनाकर रख दी जाए | मेरी बात सुनकर मम्मी कहा करती थी – “वह सब तो करना ही पड़ता है तू कोई अनोखी तो है नहीं, जैसा तुझे चाहिए ऐसा लड़का यहाँ तो मिलेगा नहीं। तेरे लिए कोई आसमान से टपकेगा क्या?”
लेकिन मेरा मन कहता था मैं ऐसी जगह जाऊंगी जहाँ न ऊंच-नीच का भेदभाव हो, न जात-पात का और न लड़के-लड़कियों में कोई अंतर हो।
एक दिन कुछ ऐसा ही हुआ मेरे बड़े भैया जो अहमदाबाद में पढ़ते थे जब छुट्टियों में घर आए (हम राजस्थान के कोटा शहर में रहते थे)  उन्होंने मुझसे पूछा –

“रंजु ! विदेश जाना है क्या?”

 मैंने पूछा—“क्यों?कहाँ ? “

 भैया बोले—“जापान”

मुझे कुछ समझ में ही नहीं आ रहा था कि पढ़ाई करने या रहने?मैं पशोपेश में पड़ गई |   आखिर भैया कैसी बातें कर रहे हैं ? हम तो एक मध्यमवर्गीय परिवार से थे, विदेश जाने के बारे में सोच भी नहीं सकते थे और मैं पढ़ने में इतनी  होशियार तो थी नहीं  कि विदेश जाकर पढ़ूँ ... मुझे आश्चर्य हुआ भैया कैसी बातें कर रहे है? मैंने पूछा—“सही बताओ, क्या बात है?”

  यहाँ कहानी में उसके बड़े भाई अनिल का पदार्पण हो चुका था | एकदम चुप्पी साधे  लड़का !अनिल को जब शुरू में मिली थी तब कितनी दिक्कत हुई थी आना को उसका मुँह खुलवाने में !वह आगे पढ़ने लगी -- 

 “भैया ने बताया कि उनका एक जापानी दोस्त है | दोनों एक ही यूनिवर्सिटी से साथ-साथ पीएच.डी कर रहे हैं, होस्टल में भी साथ ही रहते हैं । एक-दूसरे से परिवार की बातें भी होती रहती हैं | जैसे ज्यादातर भारत में होता है हम दोस्तों के सामने अपने पूरे परिवार का चिट्ठा खोलकर रख देते है, रो-गा भी लेते हैं ....
    उस समय भैया को फोटोग्राफी का नया-नया शौक हुआ था | जब भी वे छुट्टियों में घर आते, मेरी खूब फ़ोटो खींचते थे और अपने जापानी दोस्त को भी दिखाते थे और मेरी बातें भी शेयर करते थे| पर दोनों देशों की संस्कृति के अंतर के कारण दोनों में कुछ हिचक सी थी | उस जापानी लड़के को भारतीय संस्कृति बहुत पसंद थी |वह पहले से भारतीय लड़की से शादी करनी चाहता था ।इसके लिए वह पहले भी कई बार गौड़ परिवार में ज़िक्र भी करता रहता था, शायद मिसेज़ गौड़ यानि अनामिका दीदी ने कुछ कोशिश भी की थी |भैया को भी वह अपने उस परिचित परिवार में ले गया था और भैया भी उन्हें दीदी कहने लगे थे| गौडस  ने भी उन्हें यही सुझाव दिया था कि वे मेरे पास तक यह प्रस्ताव पहुँचाएँ तो सही |    
बस, संस्कृति के अंतर की बात सबके दिमाग में चलती रही |उसी बीच उसकी पीएच.डी खत्म हो गयी और वह अपने देश वापस चला गया जहाँ  उसने विश्वविद्यालय में लेक्चरर के रूप में काम शुरू कर दिया।
    कुछ महीनों बाद भैया के पास उसका पत्र आया कि वह शादी के सिलसिले में मुझसे मिलना चाहता है। पत्र पढ़कर भैया सोच में पड़ गये, भैया ने उसे लिखा हम मध्यम परिवार के हैं जिनके लिए अपनी जाति से दूसरी जाति में विवाह करना बहुत मुश्किल होता है। एक विदेशी की तो बहुत दूर की बात है।”
 दोस्त का जवाब था, अपने माता-पिता और बहन से बात करके रखना |छुट्टियों में भारत आ रहा हूँ, शादी की बात करने |भैया घर पर तो आए लेकिन वह पहले से ही पापा जी से बात करने में हिचकते क्या डरते ही थे| इसलिए उन्होंने मुझसे कहा कि मैं पापाजी से बात करूँ।पापा, मम्मी मेरी शादी के लिए आम भारतीय माता-पिता की तरह चिंतित तो थे ही|मैंने बातों-बातों में पापाजी से कह दिया कि भैया एक विदेशी लड़के का रिश्ता लेकर आये हैं, आपको एतराज तो नहीं?
हमारे पापाजी ने अपनी बेटियों को बेटियों जैसे नहीं बेटों जैसे पाला था इसलिए आपस में हम सब बहुत खुले हुए थे, हर प्रकार की बातें कर सकते थे।
मुझसे बात करके उन्होंने भैया की क्लास ली |जब उन्हें भैया से पूरी बात मालूम चली तो उन्होंने मम्मी से ज़िक्र किया और घर मे एक सकारात्मक वातावरण बनना शुरू हो गया|  भैया ने बताया था कि वे उसे 4-5 साल से जानते है, बहुत अच्छा लड़का है।आपको वैसे ही रंजु की अरेंज मैरेज करनी है| हम उस दूसरे लड़के को भी कितना जान पाएंगे? यह सुनकर पापाजी ने भैया से पूछा था कि क्या उन्हें उस पर विश्वास है? मुझे भैया का उत्तर अच्छी तरह से याद है, उन्होंने कहा था---“आजकल तो भाई-भाई पर विश्वास नहीं करता, मैं  इस बात का उत्तर कैसे दे सकता हूँ?” यह सुनकर पापाजी उससे मिलने के लिए तैयार हो गए और भैया से कहा कि उसे घर पर बुला लें।
कुछ दिनों के बाद भैया फिर घर आये देखा तो उनके साथ सफेद कुर्ता पजामा पहने कंधे पर एक झोला जैसा बैग लटकाए 6 फुट का लड़का खड़ा था जो कुछ-कुछ  डैनी जैसा लग रहा था।
उसने पापा-मम्मी को हाथ जोड़कर विनम्रता से नमस्कार किया और अपना नाम बताया | वह हिन्दी में बोला, थोडी टूटी फूटी हिन्दी में बात करना, मम्मी के हाथ का बना खाना बहुत स्वाद से खाना, बस इसी सरलता से वह सबके मन को भा गया।
उन्होंने अपने परिवार के बारे में, अपने देश के बारे में बहुत सी बातें कीं|उन्होंने बताया कि

“जापान में मौसम यानि ऋतुओं को बहुत महत्वपूर्ण माना जाता है।वहाँ की प्रतिदिन की क्रियाएँ मौसम के साथ जुडी हुई होती हैं।
जापान में चार ऋतुएँ होती हैं । हर एक ऋतु के अनुसार वहाँ की पोशाक, रंग, खान-पान प्रकृति की सुंदरता सब बदल जाता है।”

पापा-मम्मी को सारी बातें नई और रुचिकर लग रही थीं | शायद वे इस बात से बहुत खुश भी थे कि उनकी बेटी इतने सुंदर और खुले हुए वातावरण में जाएगी और अपने अनुसार अपने जीवन को जी सकेगी | भारत में तो सौ मुसीबतें साथ चलती रहती हैं | 

“अच्छा ! बड़ा सुंदर वातावरण होता होगा ---?” पापा ने उत्सुकता से पूछा | 

“जी, वो तो ठीक है, अच्छा होता है परंतु सब जगह एडजस्टमेंट तो करने ही होते हैं |”

“हाँ, आप ऋतुओं के बारे में बात रहे थे –”पापा ने कहा | 

“जी –”

आगे बोलने से पहले उसने कहा ;

“मैं आपके लिए अनिल के जैसा हूँ, कृपया मुझसे अनिल जैसा ही बिहेव करिए –आप मत बोलिए ---”    
फिर उसने बताया –“हम हर एक मौसम में उसके अनुकूल इन्जॉय करते हैं ।जैसे - बसंत ऋतु मार्च से मई के महीने तक होती है।मार्च और अप्रैल  का महीना बहुत महत्वपूर्ण होता है।मार्च में सबकी परीक्षा खत्म होकर रिजल्ट आते हैं और सब स्कूलों व विश्वविद्यालय की 

ग्रेजुएशन सेरेमनी मार्च में ही होती है। अप्रेल से नया वर्ष शुरू होता है स्कूल कॉलेज ऑफिस आदि अप्रेल से शुरू होते हैं तो ‘वेल्कम सेरेमनी’ अप्रेल में ज्यादा होती हैं |अप्रेल महीने से नया जीवन शुरू होता है। इसलिए स्कूलों, कॉलेजों के आसपास चैरी के बहुत पेड़ लगाये जाते हैं । वो मार्च के अंत से अप्रेल के पहले सप्ताह तक खिलते हैं।यह नये जीवन के लिए स्वागत का संकेत होता है।”

रंजु ने आगे लिखा था ---वह अपने जापान वर्णन में इतना निमग्न था कि साँस लेता और फिर से बोलना शुरू हो जाता-

“जापान में चेरी के फूलों की पैदावार बहुत ज्यादा है, लोगों में उनके खिलने का बहुत उत्साह और प्रतीक्षा रहती है।यहाँ तक कि समाचार में भी बताया जाता है कि फूल कब खिलेंगे? सब उन फूलों को देखने अलग-अलग बगीचों में भी जाते हैं |वृक्ष के नीचे बैठकर पिकनिक मनाते हैं । रात को ‘लाइटअप’ की जाती हैं और सब ‘अलकोहल’ पीकर आनंद लेते हैं।
नये साल की शुरुआत और चेरी के फूल सब एकसाथ खिलते हैं जो –यू नो -- बहुत सुंदर लगते हैं और एक या दो सप्ताह में सब फूल झड़ भी जाते हैं | इसलिए कहा जाता है जीवन ऐसा जीओ जो बेशक छोटा हो पर सुंदर हो।”

“वाह ! कितनी सुंदर बात है !” पापा जी के मुँह से एकदम ही निकला था |वे कितने तन्मय होकर सुन रहे थे –और वे ही क्यों, हम सभी उनके चेहरे पर टकटकी लगाए बैठे थे और आगे की बातें सुनने के लिए तैयार थे | 

“और बताओ, अपने इतने सुंदर देश के बारे में ---”मम्मी ने कहा | 
“जी, बसंत ऋतु के आते ही बगीचों में तरह-तरह के फूल खिलने शुरू हो जाते हैं।मौसम रंग- बिरंगा लगता है इसलिए ड्रेस में भी गुलाबी, हरे, पीले रंग के कपड़े ज्यादा पहनकर हम सब उस मौसम में रम जाते हैं।”

“क्या वहाँ पर सब्जियाँ, तरकारियाँ भी मिलती हैं या बस फूलों से ही काम चल जाता है ?” मम्मी ने हँसकर मज़ाक किया था | वे अब शीनोदा से काफ़ी खुलने लगी थीं | 


“जी—जी–तरकारियाँ  भी बहुत आती है। इसलिए खाने में भी हम तरह-तरह के रंग की सब्जियों का प्रयोग करते हैं |चारों ओर बसंत आ गया हो, ऐसा लगता है। जून में वर्षा ऋतु आती है। बाजारों में छाते और बरसाती जूते बिकने शुरू हो जाते है।वर्षा ऋतु के फूल भी खिलने शुरू हो जाते हैं। सब लोग बगीचों में घूमने और प्रकृति का आनंद लेने जाते हैं|”  “गर्मियों के मौसम में गर्मी तो अधिक पड़ती है लेकिन सब तरफ हरियाली ही हरियाली दिखाई देती है जो आँखों और दिल को शीतलता पहुँचाती है।इस मौसम में ज़्यादातर सफ़ेद या नीले रंग के कपड़े अधिक पहने जाते हैं।खाने में भी ठंडी चीजों का प्रयोग अधिक किया जाता है |”

     बातों ही बातों में उन्होंने मुझसे पूछा कि माँ-पिताजी के रिटायर के बाद उन्हें कौन देखेगा?मैंने भी जैसे भारतीय विचार होते है वैसे बोल दिया भैया देखेंगे भारत में तो बेटे अपने माता-पिता की देखभाल करते हैं।
यह सुनकर उन्होंने कहा—“क्यों बेटे ? तुम भी तो उनकी बेटी हो तुम्हारी भी तो अपनी शादी के बाद अपने माता-पिता की देखभाल करने की ड्यूटी होनी चाहिए|”  
यह सुनकर मुझे बहुत अच्छा लगा, आश्चर्य भी !भारत में तो कोई लड़का ऐसा कहता क्या   सोच तक नहीं सकता। उसे तो बस अपने मम्मी-पापा, अपने परिवार की ही चिंता रहती है।लड़की के माता-पिता के बारे में तो सोचना लड़के वालों के लिए जैसे गुनाह होता है। बस इसी बात को सुनकर मैंने शादी का निर्णय कर लिया। मैं बहुत खुश थी कि मुझे ऐसी सोच का जीवन-साथी मिल रहा था | 
दो दिन रहने के बाद भैया और शीनोदा वापिस अहमदाबाद लौट गए | 
अभी उन्हें वापस गये दो ही दिन हुए थे, रात के तकरीबन 1 बजे थे। मैं अपने कमरे में अपनी क्लास के बच्चों का होमवर्क चैक कर रही थी| उन दिनों मैं एक स्कूल में अध्यापिका  थी।
घनी रात में मुझे किसी के कदमों की आहट सुनाई दी जो धीरे धीरे हमारे घर की ओर ही आ रहे थे | जाने क्यों ऐसे लगा कि वह पदचाप शीनोदा की थी | मेरा दिल जाने क्यों धड़कने लगा । इतने में घर की घंटी बज उठी |  मम्मी-पापा और मेरा छोटा भाई सब जाग गये इतनी रात में कौन आया होगा ? दरवाजा खोला तो वह जापानी लड़का ही सामने खड़ा हुआ था। उसे देखते ही मुझे लगा यही मेरा भाग्य है। उसने बताया वह अपने देश वापस जा रहा है|रंजु से शादी करने की बात अपने परिवार वालों से करेगा। इस बीच क्या हम एक-दूसरे को पत्र लिख सकते हैं ? वह इसके लिए  पिताजी की आज्ञा लेने आया था । कमाल का लड़का था ! मन में उसके लिए एक सम्मान पैदा हो गया था|
एक साल तक हमने एक दूसरे को पत्र लिखा आखिर 5 मार्च, 1988 में भारतीय विधि से अहमदाबाद में शीनोदा की भारतीय बहन आना दीदी यानि गौडस के घर पर हमारा विवाह संपन्न हो गया----


उस विवाह की याद करके आना कुछ देर के लिए रुक गई, चेहरे पर कुछ लम्हों के लिए मुस्कान फैल गई, एक लंबी साँस लेकर उसने फिर पढ़ना शुरू किया ---

“मार्च 14 की हमारी जापान जाने की फ्लाइट थी | सब परिवार के सदस्य दिल्ली के एयरपोर्ट पर हमें छोड़ने आए| विदा लेते समय मेरे आँसू थम ही नहीं रहे थे। हवाई जहाज ने जैसे ही उड़ान ली तो लगा दिल यहीं ज़मीन पर ही रह गया था जैसे केवल मेरा शरीर ही ऊपर जा रहा था । जब तक भारत की धरती दिखती रही ऐसा लगा सब मुझे पुकार रहे हैं |वैसे ही लड़की अपना घर छोड़कर जब जाती है तब वह कितनी असहाय व अकेला सा महसूस करती है | यहाँ तो मैं अपने देश को छोड़कर पहली बार इतनी दूर जा रही थी |बचपन की यादें और जवानी के दिन सबको छोडकर एक नये देश में जा रही थी ।अब समझ में आ रहा था कि शादी को नारी का दूसरा जन्म क्यों कहा जाता है?उसका पूरा कायाकल्प ही हो जाता है।
हवाई जहाज अब बादलों में खो गया था दूर-दूर तक सफेद रुई के ढेर से बादल थे। बचपन में कभी सोचती थी कि पंख होते तो आसमान में उड़कर बादलों को छू लेती ! 
धरती जितनी हरी भरी है आकाश उतना ही नीला ओर सफेद बादलों को समेटे हुए। दोनों की सुन्दरता एक -दूसरे से बढकर ! मैंने प्रकृति माँ को नमन किया प्रकृति भी क्या चीज़! कितनी खूबसूरत है !विधाता का निर्माण क्या खूब है! अपनों से बिछुड़ने का जो दर्द सीने में था इस सुंदरता को देखकर थोड़ा कम लगने लगा था। 

        हवाई-जहाज़ हांगकांग से होता हुआ 10 घंटे का सफर तय करके टोकियो पहुँचा । उस समय रात हो चुकी थी जब मुझे बताया गया टोकियो आ गया है। मैंने खिड़की से नीचे देखा ऐसा लगा आसमान के तारे सब ज़मीन पर बिखर गए हों | इतनी चमक तो आसमान के तारों में भी नहीं थी जितनी टोकियो के ऊपर बिखरे बिजली के तारों में दिखाई दे रही थी| ऊँची इमारतें जैसे आसमान को छूने की चुनौती दे रहीं थीं।
हवाई जहाज़ से नीचे उतरकर हम बस से शहर में आ गए |रास्ते भर लाइटों के नज़ारे देखते हुए मैं जैसे किसी अद्भुत, चमत्कारी दुनिया में पहुँच रही थी।”

       यह रंजु का पहला अध्याय था जिसको पढ़कर आना भी जैसे किसी दूसरे लोक में पहुँच गई थी | एकदम विस्मयकारी, रोमांचिक अनुभव ने आना को अपने आगोश में समेट लिया था | उसे रंजु के सफ़र को पढ़ना अच्छा लग रहा था | लेकिन कुछ थकान सी लगने लगी थी |उसने शेष कागज़ों को रोल करके अपने पलंग के साइड वाली छोटी मेज़ पर रख दिया |नज़र पड़ी, उसकी चाय, नाश्ता सब ठंडा हो चुका था | रंजु को और अधिक पढ़ने, जानने  की उत्सुकता उसके मन में थी लेकिन अभी थकान के कारण उसकी पलकें झपक गईं |