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बड़े जीजा जी जैसा मज़ेदार इंसान ! कोई शादी-ब्याह ऐसा न होता जिसमें जीजा जी कोई ऐसी शरारत न करते जो सबको चौंका दे | शीनोदा को उसके दोस्तों से झाड़ पर चढ़वाने का काम जीजा जी ही कर सकते थे | कर दिया जी, उस बेचारे को क्या मालूम ये सब मज़ाक हो रहा था | अड़ गया वह ---
“इज़ इट --?”उसने जीजा जी की ओर मुँह घुमाकर बड़े गंभीर अंदाज़ में पूछा|
“ओ ! यस ---” जीजा जी ने बड़े गंभीर अंदाज़ में उत्तर दिया और मुँह पीछे घुमाकर उसके दोस्तों की तरफ एक आँख दबा दी |
शीनोदा जो घर-गृहस्थी सजाने चला था, वह भी भारतीय लड़की और भारतीय संस्कारों के साथ ! उसके लिए बहुत ज़रूरी था कि वह सब वही सब करे जो उसकी ज़िंदगी में सुख और आनंद लेकर आए |
दुनिया का कोई भी समाज क्यों न हो, कहावतें भरपूर होती हैं | जीजा जी शीनोदा के चेहरे पर जैसे कुछ पढ़ने की कोशिश कर रहे थे | अचानक बोले ;
“लाओ भाई एक ग्लास पानी लाओ ---” लगा, जीजा जी अपने लिए पानी माँग रहे हैं | तुरंत दो /तीन युवक पानी लाने भागे और मिनटों में उनके सामने पानी के भरे हुए ग्लास हाज़िर थे | उन्होंने एक ग्लास लिया और दूल्हे राजा की ओर बढ़ा दिया | वह आश्चर्य से उनकी ओर देखने लगा, उसने तो माँगा नहीं था |
घूँट घूँट पानी पीयो, रहो तनाव से दूर
एसीडिटी या मोटापा, होवे चकनाचूर ---न जाने कहाँ से निकालकर लाए थे जीजा जी ! एकदम अनप्रिडिक्टेबल !! किस समय क्या कह जाएँ, कर जाएँ ?
शीनोदा बेचारे को कहाँ से जीजा जी की अफ़लातून बातें समझ में आतीं, मुँह बाए उनकी और कभी पानी के भरे हुए ग्लास की तरफ़ देखता रहा | हाँ, एसीडिटी और मुटापा –ये दो शब्द समझ में आए थे बाकी तो सब मूर्खों की तरह एक-दूसरों का चेहरा ताक रहे थे |
“अरे भाई ! ठीक ही तो कह रहा हूँ, ये हमारे दूल्हे राजा कुछ टेंशन में नहीं लग रहे हैं क्या ?”
दूल्हे राजा को तो भला क्या समझ में आता, दूसरे भी वो ही समझे थे जो जीजा जी से परिचित थे बाकी तो सभी पहले भी दाँत फाड़ रहे थे, वही अब भी उनके चालू रहे |
उसने चुपचाप पानी का ग्लास पकड़ लिया और दो लंबे घूँट में पूरा पानी गले से नीचे उतार लिया |
“अरे यार ! मैंने कहा था ‘घूँट घूँट’ तुम तो दूल्हे राजा एक साँस में गटक गए |” और फिर से रुकी हुई हँसी को खुला रास्ता मिल गया |
इन्हीं सब हल्की-फुल्की हँसी–मज़ाक में फेरों का समय आ गया | ख़ैर मंडप तक उछल-कूद होती रही, क्या मस्ती करते रहे सब ! यहाँ तक कि भाषा न जानने वाले एक-दूसरे के चेहरों को देखकर हँसते रहे और उन्हें देखकर बाकी लोग भी खूब हँसते रहे यानि हँसने-खिलखिलाने पर ताला ही नहीं लग रहा था | जबकि कई लोगों को तो बात ही समझ में नहीं आ रही थी कि आख़िर किस बात पर हँसी फूट रही है ?
फेरों पर भी साची अजीब सी उत्सुकता से शीनोदा और रंजु को चक्कर लगाते देखते रहे | वे पति-पत्नी फेरों पर से उठे ही तो नहीं, यज्ञ की लपटों को देखकर बड़े असमंजस में रहे जैसे कोई अजूबा देख रहे हों |
''फ़ायर--फ़ायर------ '' जैसे ही पंडित जी ने हवनकुंड में अग्नि प्रज्वलित की साची ने अपने पति से जाने क्या कहा, और सबको तो उसके बस ये दो शब्द ही समझ में आए |
फेरों के बीच में सब लोग उठ-उठकर चाय-कॉफ़ी पीने जा रहे थे लेकिन शीनोदा के भाई-भाभी वहीं बैठे रहे | आखिर उन्हें वहीं लाकर कुछ कॉफ़ी व स्नैक्स देने पड़े |उन्होंने कॉफ़ी पीनी भारत में आकर ही शुरू की थी | वहीं बैठे वे हवन कुंड में जलती अग्नि को देखते रहे, पंडित जी के मुख से निकलते हुए श्लोक सुनते रहे, उनका सारा ध्यान विवाह की रस्मों पर था आख़िर वे इसी के लिए तो आए थे | उनका इनवॉलवमेंट गज़ब का था जैसे किसी भक्त का अपनी भक्ति करते समय !
साची इतनी उद्विग्न थी कि पूजा की रस्म पर कुछ कहने के लिए मुँह खोल देती |उसका पति उसका हाथ पकड़कर उसे चुप बैठा देता | वह पंडित जी को इशारे से बताती रही थी कि उसके देश यानि जापान में भी पूजा होती है | पंडित जी कुछ समझते और वह कुछ समझाती | बात मुस्कान पर आकर ठहर जाती किन्तु बात क्लीयर न होती |
शादी में अनिल इतना व्यस्त रहा कि कहीं दिखाई ही न देता | रंजु ठहरी छोटी बहन, उसके विवाह में बड़े भाई का व्यस्त रहना जरूरी भी था ही लेकिन शीनोदा का तो वह दोस्त था, उसे यह महसूस हो रहा था कि आखिर शीनोदा उसका इतना पक्का मित्र था फिर वह अपने दोस्त के पास क्यों नहीं है ? उसे लग रहा था कि अनिल जो उसका सबसे क्लोज़ फ्रैंड है, वह दोस्त की शादी में बहन का भाई होकर रह गया था |
“वहेयर वर यू ?” शीनोदा अचानक ही दोस्त को सामने देखकर पूछता |
“विल जॉइन यू सुन ---” कहकर वह फिर से गायब हो जाता |
हाँ, फेरों के समय अनिल वहीं आ गया और दूल्हे बने शीनोदा और दुल्हन बनी बहन के बीच में बैठ गया | उसने बहन के सिर पर लाड़ से हाथ फेरकर उसे दुलार किया तो रंजु की आँखें बरस पड़ीं, साथ ही अनिल की आँखें भी भीग गईं | शीनोदा जो दोस्त के आने से खुश हो गया था, अचानक दोनों भाई-बहनों के आँसु देखकर असमंजस में हो आया |
“व्हाट हैपनड, आर यू सॉरी फॉर दिस मैरेज ?आप खुश नहीं हैं ?” उसके तो मुँह पर ही जैसे किसी ने पीला कपड़ा फेर दिया हो | क्षण भर में गुलाबी से पीला होने लगा वह !
“व्हाई दिस मैरेज ? इफ़ यू पीपल आर सॉरी ---” वह हड़बड़ाकर बोल उठा | बेचारा समझ ही नहीं पा रहा था कि क्या और क्यों रोना ?
“ओह ! नो—एवरीथिंग ओके –” अनिल ने दोस्त के कंधे पर हाथ रखकर उसे समझाने की कोशिश की लेकिन वह पूरी शादी भर पशोपेश में ही नज़र आया|
सारे वातावरण में अजीब सी खलबली मच गई क्योंकि दूल्हे राजा का मूड अचानक दुखी दिखाई देने लगा था | उसकी कुछ समझ में ही नहीं आ रहा था कि भई शादी हो रही है फिर ये दोनों बहन-भाई दुखी क्यों हैं ? वहाँ उपस्थित अनिल के माता –पिता, भाई जो फेरों से पहले बड़े खुश दिखाई दे रहे थे, उनके चेहरे भी बड़े सपाट से दिखाई दे रहे थे उसे |
शीनोदा के मूड को ठीक करने की कोशिश की जा रही थी कि भई, ऐसा कुछ नहीं है यह बड़ी स्वाभाविक सी बात है | बेटी अपने पिता के घर से जा रही है, स्वाभाविक है, सब उसके घर छोड़कर जाने से उदास हैं, शादी से नहीं लेकिन उसके पल्ले कुछ पड़े तो तब न ! यानि एक बात दिमाग में घुस गई तो घुस गई –जीजा जी ने भी काफ़ी कोशिश की उसे समझाने की, वैसे भी अब वे थक चुके थे और घर जाकर आराम करना चाहते थे लेकिन वह रंजु का हाथ पकड़कर बैठ गया |
“तुमको शादी के लिए फ़ोर्स किया है ?” शीनोदा ने बड़ी आजिज़ी से रंजु से पूछा |
”नहीं, कोई क्यों फ़ोर्स करेगा ? आई एम हैप्पी ---” उसने उत्तर दिया |
“फिर आप लोग दोनों रोते क्यों हैं ?”शीनोदा अपने स्वभाव पर उतर आया |यानि हर बात को पूरी तरह जानकर, समझकर आगे बढ़ने का स्वभाव !इस शादी के लिए भी वह कितने चक्कर कोटा के लगा आया था |
अनिल और रंजु, दोनों बहन-भाई आँसु पोंछकर मुस्कुराने लगे पर शीनोदा के चेहरे पर मुस्कान नहीं आई | वह पशोपेश में ही बना रहा |
“ऐ शीनोदा ! डोंट बी ए फूल –” न जाने कहाँ से रेखा बहन के साथ बासुदी निकल आईं और उन्होंने जापानी और अंग्रेजी में शीनोदा को समझाना शुरू किया | समझाना भी क्या, एक तरह से डाँटना शुरू किया कि क्यों वह माहौल का पूरा मज़ा किरकिरा कर रहा था ? समझना तो क्या खाक था उसे हाँ, बासु दीदी की झाड़ से चुप्पी ज़रूर हो गई |
बेचारे दूल्हे शीनोदा की समझ में पूरी बात तो बाद तक भी नहीं आई लेकिन सबको मुस्कुराते देखकर वह थोड़ा सा सहज दिखाई देने लगा था |