Prem n Haat Bikaay - 33 in Hindi Love Stories by DrPranava Bharti books and stories PDF | प्रेम न हाट बिकाय - भाग 33

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प्रेम न हाट बिकाय - भाग 33

 33—

 

     मंढा चढ़ा, उत्तर प्रदेश के रिवाज़ों के अनुसार कढ़ी-चावल बनाए गए, जापानियों को बड़ा मज़ा आया और असली मज़ा तो शीनोदा के भाभी-भाई को देखकर आया जो स्टिक्स लेकर फटाफट चावल खाने में जुटे हुए थे |सबको लग रहा था आखिर ऐसे कैसे खा पाएँगे?सब उनका चेहरा ताके जा रहे थे |  लेकिन बड़ी सहजता से उन्होंने उसी समय में अपने चावल ख़त्म कर लिए थे जितने समय में सबने चम्मच से खाए थे |शीनोदा के दो दोस्त साउथ-इंडियन भी थे जिन्होंने हाथ से चावल खाने पसंद किए| सब एक-दूसरे को अजीब नज़रों से देख रहे थे, सब पहली बार ऐसी शादी में सम्मिलित हुए थे जिसमें सबके एकदम विभिन्न रंग, भाषा, रिवाज़, आदतें–देश तो अलग था ही|रंग-बिरंगी शादी थी यह! सब अपनी-अपनी आदतों से कुछ शरमाते से लेकिन वही करते जो उनके लिए सहज था| होना भी चाहिए ऐसा ही न !किसी को वृत्त में बाँधकर उसकी सारी हँसी-खुशी, उसका आनंद क्यों छीना जाए? आखिर सब उनकी खुशी में शामिल होने ही तो आए थे तो --करने दो न उन्हें अपने अनुसार एंजॉय !दृष्टि कभी मुँह बनाती तब आना को उसे समझाना पड़ता कि तुम सिर्फ देखो और एंजॉय करो कि कितना रंग-रंगीला है ये संसार !बिना पूछे, बिना कोशिश करे तुम्हें कितनी चीज़ें देखने को मिल रही हैं ! जो चीज़ें हम आँखों से देखते हैं वे हमें सदा याद रहती हैं | किताबों में  पढ़कर उसको महसूस किया जाना कुछ कठिन तो होता ही है | कोई चीज़ जो हम आँखों से  देखते हैं, उसे हम महसूस कर पाते हैं और वह हमारे मन का हिस्सा बन जाती है |      

     हल्दी का कार्यक्रम हुआ तो सबने शीनोदा और रंजु को एक ही मंडप में बैठाकर हल्दी लगाई | शीनोदा की भाभी ने हर प्रोग्राम में  लहंगा पहना |दो लहँगे वह दृष्टि के साथ जाकर खरीदकर लाई थी और हर बार लहंगा पहनकर अपना दुपट्टा ठीक से लगवाने में दृष्टि को तलाशती थी | दृष्टि को अपने कपड़े बदलने में देर हो जाती | खूब खुश होने के बावजूद भी वह भुनभुन करने लगी थी ;

“मम्मा ! आप देखो न, मैं इनको तैयार करने में गंदी सी रह जाती हूँ |” 

उस बेचारी जापानी गुड़िया को समझ में ही न आता और वह उसको ही आवाज़ लगाती रहती | अब तो दृष्टि को उसे झांसा देना आ गया था| जैसे ही वह पड़ौस के सटे हुए घर से आगे के गेट से उनको आते हुए देखती, वह पीछे वाले गेट से बराबर वाले घर के पीछे गेट से पड़ौस के बंगले में घुस जाती |वहीं शीनोदा के भाई-भाभी के ठहरने का इंतज़ाम किया गया था |  वहाँ जाकर आराम से तैयार होकर आती | जब अपने घर आती तब वह पूरी तरह बनी-ठनी होती | जापानी गुड़िया साची ‘दीती –दीती ‘बोलते हुए  घर भर  में उसे तलाश करती रहती | 

दृष्टि तैयार होकर बड़े आराम से आगे के गेट से फिर से अपने घर में जाती | उसे देखते ही साची का चेहरे खिल जाता | वह टूटी फूटी अंग्रेज़ी में कहती ;

“मी –रेडी ---?” 

“यस आंटी –कमिंग –” फिर वह उसे तैयार करती और शादी के लिए आए हुए फूलों और गजरों से उसको सजाकर खुश कर देती |दृष्टि दो दिनों में ही यह सब चालाकी सीख गई थी कि पहले खुद ही तैयार हो जाना चाहिए बाद में साची आंटी के साथ बिज़ी होना ही है | साची अपनी छवि देखकर खुद पर फ़िदा होने लगती |  वह कितनी देर तक आना के बैड- रूम में ड्रेसिंग टेबल के आगे खड़ी होकर मुग्धा सी खुद को निहारती रहती | उसका जापानी पति शीनोदा  के अन्य दोस्तों के साथ डाइनिग टेबल पर बैठा चाय पी रहा होता | जो अधिकतर अपने –अपने देश में चाय पीने के तरीकों को लगभग इशारों में डिस्कस कर रहे होते |शीनोदा के भाई-भाभी पहली बार भारत आए थे, वो भी अपने भाई की शादी में, खूब एंजॉय कर लेना चाहते थे | शीनोदा का भाई जीरो उससे छोटा था और अपने पिता के साथ फलों के  होलसेल के व्यापार में व्यस्त रहता था | जीरो नाम सुनकर बच्चे बहुत असमंजस में थे | मन में सोच रहे थे कि ये भी कोई नाम है भला ? शीनोदा ने उन्हें बताया कि उनके भाई के नाम का अर्थ है ‘दूसरा बेटा’ | 

“मैं अपने पेरेंट्स का पहला बेटा हूँ न और यह दूसरा, मतलब मेरा छोटा भी तो इसका नाम जीरो रखा गया है यानि दूसरा बेटा ---”

“तो आप  तो पहले हैं, आपके नाम का क्या मतलब है ?” दृष्टांत ने पूछा | 

“भैया, तू भी न ---”यानि पागल है | 

“क्यों ? जब तू शीनोदा मामा  के छोटे भाई के नाम का मतलब पूछ सकती है तो मैं उनके नाम का मतलब  नहीं पूछ सकता ?”दृष्टांत को बड़ा बुरा लगा | आखिर बड़ा भाई था | 

“बताया तो था उन्होंने --”दृष्टि ने उसे चिढाने की कोशिश की | 

“कहाँ बताया ? तू ही बता दे न –वैसे ही अपने आपको ---“ वह बड़बड़ करने लगा था | 

“हाँ, आपके नाम का मतलब बैंबू है न ? “ दृष्टि की आँखें चमकने लगीं थीं  | 

“यस, बताया था न मैंने ‘मजबूत बैंबू’---यू फ़ोरगोट ---”दृष्टि की आँखें चमकने लगीं |    

     शीनोदा बच्चों  की छिपी हुई मुस्कुराहट पहचान गया था | वैसे भी इतने दिनों से साथ रहते वह बच्चों की नस-नस पहचानने लगा था |   

     हल्दी और मेंहदी वाले दिन सबने खूब मस्ती की | साची कभी शीनोदा के हल्दी लगाती, कभी रंजू के जिनको पास पास ही कुछ ऊँचे से पटरों पर बैठा दिया गया था | शीनोदा को भी कुछ कहाँ समझ में आ रहा था लेकिन वह खूब खुश था और जो कहो, करने के लिए तैयार था | रंजु  के और स्त्रियों के मेहंदी लगाने के लिए पार्लर से मेंहदी लगाने के लिए लड़कियाँ आईं थीं  जिन्होंने सब महिलाओं के मेंहदी लगाई जिनमें पास-पड़ौस की सभी स्त्रियाँ थीं जिन्होंने शीनोदा की शादी को घर की शादी स्वीकार करके गहने-कपड़े पहने थे | साची अपने गोरे हाथों पर मेंहदी देखकर खुशी के मारे पगलाए जा रही थी |सबकी मेंहदी देखकर शीनोदा ने भी अपने हाथ मेंहदी लगाने वाली लड़की के सामने कर दिए ;

“मेरे भी लगाइए---ऐसे “ उसने रंजू के हाथों की ओर इशारा करके कहा | 

उसे समझाने की कोशिश भी की गई कि ऐसी डिज़ाइन वाली मेंहदी लड़कियाँ या औरतें लगाती हैं लेकिन वह माना ही नहीं और अपनी गुलाबी हथेलियाँ उसके सामने कर दीं | बेचारी ने इधर-उधर देखा और सबके मुस्कुराते हुए चेहरे देखकर, किसी के मना न करने पर उसके हथेलियों पर चित्रकारी करनी शुरू कर दी | शीनोदा ने अपनी हथेली पर मोर बनवाया और सबको दिखाता फिरा–भारत का राष्ट्रीय पक्षी ! सब लोगों ने खूब दाँत फाड़े लेकिन उस बंदे की समझ में नहीं आया कि सब लोग ऐसे क्यों हँस रहे हैं ? 

     जब विवेक के बड़े जीजाजी पिछली बार आए थे तब उनसे शीनोदा की बड़ी दोस्ती हो गई थी, खास तौर से फ़ोन करके उसने उन्हें भी बुलाया था | उनके होने से जैसे महफिल में ठंडी बयार बहने लगती | महफ़िलों के बादशाह जैसे होते थे वे ! कहाँ -कहाँ तक उनकी दोस्ती और पहचान थी | उत्तर प्रदेश में कलेक्टर रहे थे तो ठाठ भी खूब थे और अपने  ठहाकेदार स्वभाव के कारण सब उनसे एक बार में ही मुहब्बत करने लगते | उन्होंने शीनोदा की मेंहदी को लेकर कितनी खिंचाई की और वह सरल, सहज रूप में हँसते-हँसते अपनी खिंचाई करवाता रहा| यानि कोई ऐसी घड़ी थी ही नहीं कि किसी का मुँह चढ़ा हो, किसी ने बुरा माना हो --सब बस मस्ती के मूड में ! 

"देखो तुम सबको एक बात सुनाता हूँ ---" बड़े जीजा जी जहाँ होते, वहीं उनके चारों ओर महफ़िल जम जाती | 

"लेकिन, आज एक ऐसी बात सुनाता हूँ कि तुमको आश्चर्य होगा --" 

सब उनका मुँह ताकने लगे –

"पता है, ये शादी और सभी त्योहार या जितने भी उत्सव होते हैं न, ये सब परम आनंद के लिए होते हैं और होना भी यही चाहिए | हमारा इंडिया तो है ही रंग-बिरंगा लेकिन हमारे गाँवों में सो कौल्ड एजुकेटेड लोग कभी ऐसी हरकतें कर बैठते हैं कि करते वो हैं, शर्मिंदा हमें होना पड़ता है | लोग कई बार इतने फूहड़ हो जाते हैं, नीचे गिर जाते हैं कि क्या कहें –" वो वाक़ई परेशान लग रहे थे | 

"क्या हुआ जीजा जी ? आज आप इस मूड में क्यों हैं ?कुछ हुआ है क्या ? आपकी तबियत तो ठीक है ? " विवेक सचमुच परेशान होने लगे | इतने मज़ाक करने वाले, सबको हँसाए रखने वाले जीजा जी को आख़िर हुआ क्या होगा ?" विवेक  चिंतित होने लगे थे | 

" अरे ! ऐसे कोई बहुत सीरियस होने की बात नहीं है विवेक लेकिन हमारे यहाँ शादियों में जो नखरे उठाए जाते हैं, उनके बारे में कभी-कभी सोचकर बुरा लगता है | ये सारी हरकतें लड़के वालों के साथ बरात में आए हुए लड़के-लपाड़े करते हैं | अभी कुछ दिन पहले देवबंद में एक बेटी की शादी थी, हमें भी वहाँ इन्विटेशन था | बड़े भले लोग हैं बेचारे ! उन्होंने हमसे कहा था कि हम दूध का इंतज़ाम देख लें क्योंकि गाँव में लोग इज्ज़त करते हैं  तो हमारे एक फ़ोन कॉल पर जो कुछ जितना चाहिए आ जाता है | हमने खुशी-खुशी 'हाँ' कर दी|तुम लोगों को पता है कि आज भी गाँव की बेटी सबकी बेटी होती है | जिनके घरों में दूध, दही होते हैं, वे आज भी जितने दूध की ज़रूरत होती है, दे जाते हैं |  --" जीजा जी जानते थे कि अंग्रेज़ी में बोलें या हिन्दी में इन जापानियों को तो बात समझ में आने से रही इसलिए अपने ऊपर ज़्यादा लोड क्यों लिया जाए ? वे मिली जुली भाषा में बात कर रहे थे | 

"ओ ! माई गॉड !" शीनोदा को बात कुछ-कुछ समझ में आ रही थी, उसके साउथ इंडियन दोस्तों को भी | वे सब बड़ी रुचि से जीजा जी की कहानी सुन रहे थे | सबके चेहरों पर आश्चर्य का भाव पसरा हुआ था | 

"दिस इज़ वेरी गुड, दे हेल्प ईच-अदर " डॉ.स्वामी ने कहा| 

"हाँ, लेकिन मुझे कुछ और याद आ गया --अभी हाल ही में यह सब हुआ न, इसीलिए ---उस बेटी की शादी में कुछ ऐसे लड़के भी आए थे जो लड़की वालों की कैसे भी हो इन्सल्ट  करना चाहते थे | मैं दूर से देख रहा था | वे दूध के काउंटर पर जाते, दूध माँगते और साइड में जाकर उसे गिरा आते | ऐसे कई लड़के थे जो ये सब कारीगरी दिखा रहे थे | मैं काफी देर तक उन्हें देखता रहा | दूध के काउंटर पर जो लोग सर्व कर रहे थे वे बेचारे क्या करते ? बारात में जो लोग आए थे, उन्हें मना भी नहीं कर सकते थे |मैंने वहीं दूर से बैठे-बैठे कुछ फ़ोन्स किए | मैं जानता था, ये लोग गड़बड़ करना चाहते हैं | दे एक्च्वली  वांटेड टु इन्सल्ट द गर्ल्स पेरेंट्स --"

" वैरी बैड ---" किसी ने कहा | 

"ऑफ कोर्स -- कुछ देर बाद मेरे फ़ोन्स का असर हुआ, मैंने देखा गाँव के कुछ लोग बड़े-बड़े केन्स में दूध लेकर वहाँ आ गए थे | मैं उठकर वहाँ गया जहाँ पर वो बदमाश लड़के खड़े थे | मैंने केन्स वहीं रखवा दिए और जो लोग दूध सर्व कर रहे थे उनसे कहा कि वो उन लोगों को बड़े-बड़े जग दे दें जिससे उन्हें छोटे ग्लासों से गिराने में अधिक परेशानी न उठानी पड़े |"

"साब --ये क्या कर रहे हैं ?" दूध के काउंटर पर खड़े लोगों ने पूछा | 

"मैंने उनकी बात का जवाब नहीं दिया और उन लड़कों से कहा कि अपना प्रोग्राम चालू रखें, कम रह जाएगा तो दूध और आ जाएगा | चिंता न करें --" 

"ओ ! माई गॉड ---!" सुनने वाले हैरान थे | 

"फिर साहब ! वो लड़के ऐसे भागे जैसे गधे के सिर से सींग ---" अब जीजा जी अपनी आदत के अनुसार हो--हो करके हँसने लगे थे लेकिन उनके अलावा कोई भी उस बात पर हँस नहीं सका था |

"डोंट बी सो सीरियस, आई जस्ट रिमेंबर्ड ---सो --" जीजा जी जब कोई बात सुनाने पर आते थे तो उन्हें ध्यान नहीं रहता था कि उनकी बात का दूसरों पर क्या प्रभाव पड़ेगा ? वे ये भी भूल गए कि बाहर के लोगों के सामने वह बात करनी ठीक नहीं थी | उन्हें याद आ गया और उन्होंने अपनी आदत के मुताबिक कहानी सुनानी शुरू कर दी | 

“एनी हाऊ, प्लीज़ फ़ौरगेट ---“ कहकर वे तो रिलेक्स हो गए लेकिन वहाँ उपस्थित लोगों के मन पर उसकी छाप पड़नी स्वाभाविक थी |       

थोड़ी देर में गाने शुरू होने वाले थे और सबकी ज़िद थी कि जीजा जी गाना गाएँगे | जीजा जी भला कहाँ शरमाने वाले थे ! वे अपने बेसुरे सुर में अलापने लगे और सब लोग पेट पकड़कर दाँत फाड़ने के लिए मज़बूर हो गए | 

‘कितनी जल्दी बदलता है आदमी अपना रंग--!’आना ने सोचा जो काम में मशगूल होते हुए भी कान जीजा जी की ओर लगाए हुए थी | उसने कई बार देखा था कि विवेक की बड़ी बहन जिन्हें सब बीबी कहते थे, उन्होंने पति की ओर आँखें तरेरीं लेकिन जीजाजी को कहाँ होश होता था जब वे गप्पें मारने बैठते थे | खैर –जीजा जी ने ही माहौल बिगाड़ा था, उन्होंने ही सुधार भी किया | उनका गाना सुनकर सब लोग पेट पकड़कर बुरी तरह हँसने लगे थे | वे अपने बेसुरे सुर में पुरानी फ़िल्म का गाना खूब ज़ोर-शोर से गा रहे थे;

“राजा की आएगी बरात, रंगीली होगी रात |मगन मैं नाचूँगी ---” वे पैरों से ज़रा अशक्त थे इसीलिए  कुर्सी पर बैठे-बैठे ही हाथों से नाचने की मुद्रा बना रहे थे | मोटे, थुलथुले पेट के जीजा जी का पेट भी उनके साथ ताल दे रहा था | ढोलक बजाने वाली भी मुस्कुराते, शरमाते हुए उनके बेसुरे सुरों पर ढोलक पीटने लगी थी | लाल होते चेहरों के बीच जीजा जी का बड़ा गंभीर नृत्य-संगीत चालू था | जीजा जी जहाँ पर हों और शांति रहे, ऐसा तो हो ही नहीं सकता था |जीजा जी यानि—आनंदोत्सव के महाराजाधिराज ! रंजु  को चिढ़ाते हुए जीजा जी अपनी भवें मटकाना नहीं छोड़ रहे थे और बेचारी रंजु शर्म से लाल हुई जा रही 

थी|          

       साची ने खुशी-खुशी मेंहदी लगवाई थी, अपने हाथों पर डिज़ाइन देखकर वह बहुत खुश हो रही थी लेकिन मेंहदी सूखने से पहले उसे वॉशरूम जाने की ज़रूरत महसूस हुई | आना ने देखा और उसे इशारे और कुछ अंग्रेज़ी के टूटे-फूटे शब्दों से समझाया कि वह अभी अपने हाथों पर पानी न डाले वरना उसकी मेंहदी का रंग नहीं आएगा |कमाल था, लड़की घंटे भर तक बिना बाथरूम जाए बैठी रही | साथ–साथ ढोलकी, गीत और डांस चलता रहा | कैसा त्योहार सा मन हो गया था सबका !इन विदेशियों को कुछ समझ में नहीं आ रहा था लेकिन इनके चेहरों की गुलाबी रंगत और गाढ़ी हो गई थी |   

शादी का दिन भी आ ही गया| शीनोदा के लिए इतनी सुंदर शेरवानी  दिलवाकर लाई थी आना कि सब उसके दूल्हे के रूप पर मोहित हो उठे  |गुलाबी रंगत लिए गोरे रंग में जैसे किसी ने गुलाब घोल दिया था, ऐसा खूबसूरत लग रहा था वह ! पड़ौसियों  ने कहा ;

"इसके काला टीका लगा दो, नज़र उतार दो!" आना ने शीनोदा की भाभी से कहा कि वह शीनोदा की नज़र उतार दे |वह भला  क्या, कैसे जाने कि नज़र होती क्या बला है ? और उसे उतारा कैसे जा सकता है ? वह कोई ऊपर रखी हुई चीज़ होगी जिसे उसे उतारना होगा, कोई और तो कुछ नहीं समझा, हाँ, शीनोदा ने यही समझा | साची ने दो/तीन दिनों में छोटी-छोटी बातें, कुछ शब्द सीखे तो थे लेकिन उन  शब्दों के सहारे पूरी बात समझना तो स्वाभाविक रूप से मुश्किल था उसके लिए ! उसे समझाया कुछ जाता, वह समझती कुछ ! इशारे कर-करके उसे पड़ौसी  ही  धीरे-धीरे समझाते रहते थे |दरअसल, उन सबको साची के साथ मज़ा भी खूब आ रहा था| शादी वाले दिन के लिए वह खूब सुनहरे काम का चटक लाल रंग का बनारसी लहंगा खरीदकर लाई थी जो उसके  गोरे रंग पर वह खूब फब रहा था कितनी  सुंदर लग रही थी वह !  

        बंगले के बाहर सजी हुई घोड़ी और बैंड-बाजा आ चुका था | भारतीय रिवाज़ के अनुसार सब लोग दूल्हे के टीके कर रहे थे | शीनोदा के पगड़ी बाँधी थी पड़ौस के गुजराती लड़के ने ! वह बाहर लॉन में कुर्सी पर बैठा टीका लगवा रहा था | सब लोग टीका लगाते और उसे पैसे देते|वह आना की तरफ़ मासूम नज़रों से देखता कि वह उन पैसों का क्या करे ? कुछ ही देर में उसके पास काफ़ी रुपए इक्क्ठे हो चुके थे | आना ने उसे इशारे से समझाया कि अभी अपनी शेरवानी के ऊपर रखे रुमाल पर ही रखे रहने दे, वह बताएगी उन रुपयों का क्या करना है ? 

    बंगले के अंदर और बाहर बराती नाश्ता कर रहे थे | कोई खड़ा, कोई बैठा –पूरा नज़ारा शादी वाले घर का था | बैंड वाले गाना बजाने लगे –‘ये देश है वीर जवानों का, अलबेलों का मस्तानों का ---‘ 

“क्या बजा रहे हो ? कोई बढ़िया सा गाना बजाओ न !”पास वाले घर के सूद साहब ने कहा|जीजा जी ठठाकर हँस दिए ;

“अरे ! सूद साहब, कोई ऐसी बरात न होती होगी जिसमें यह गाना न बजता हो और मज़े की बात कि सब इस पर धमाधम नाचते हैं जैसे किसी युद्ध में जा रहे हों ---“ 

“जीजा जी युद्ध से कम है क्या शादी ! “ सूद साहब ने कहा और फिर एक और ठहाका लग गया | 

“कोई बढ़िया सा बजाओ ---“ जीजा जी की तेज़ आवाज़ बैंड वालों के कानों में पड़ी और 

बैंड वालों के बीच सन्नाटा सा पसर गया फिर कुछ मिनट बाद फुसफुस करके उन्होंने कुछ सलाह की  और बजाने लगे;

“पिया का घर प्यारा लगे, मैं तो भूल चली बाबुल का देश ---” 

“अरे ! अभी कहाँ भूल चली कुछ ऐसा बजाओ न जो पता तो चले कि बरात जा रही है |”सूद साहब ने कहा और फिर से सब ठठाकर हँस पड़े |  

दरसल, यह हँसी एक छूत की बीमारी सी है | किसी एक को हँसी फूटी नहीं कि पास में खड़े  सारे लोग दाँत फाड़ने लगे|ऐसे ही हो रहा था शीनोदा की शादी में ! जीजा जी, मि. बासु या किसी ने भी  कोई बात कही, दाँत फाड़ने शुरु किए नहीं कि जिसके पल्ले  बात न भी पड़ी हो, उसने भी दाँत फाड़ने शुरू कर दिए | 

अचानक मिसेज़ सूद को याद आ गया ;

“अरे ! दूल्हे की आँखों में काजल लगाने की रस्म तो रह ही गई –साची लगाएगी काजल, भाभी है |” उन्होंने कहा | 

अब मुश्किल यह कि उसे कैसे समझाया जाए और शीनोदा कैसे लगवाए काजल ---!! आना रंजू के लिए लक्मे का वैनिटी बैग लेकर आई थी जिसमें सब शृंगार का सामान था | आना ने दृष्टि को बुलाकर वैनिटी बैग से काजल की स्टिक मँगवाई और साची को बुलाकर उसे समझाने लगी कि वह शीनोदा की आँख में काजल लगाए | 

“ओ ! नो—नो—” साची घबराकर ऐसे पीछे हटी जैसे उसके हाथ में कोई साँप पकड़ा रहा हो | उधर दूल्हे के चेहरे पर भी बारह बजने लगे थे | ये लोग मेरी आँखों में आखिर क्या करने वाले हैं ?सोचकर वह परेशान होने लगा था | 

    आना हाथ पकड़कर साची को शीनोदा के पास लाई ।काजल की स्टिक उसके हाथ में पकड़ाई और उसका हाथ पकड़कर शीनोदा के कान और आँख के बीच में एक काला टीका  लगवा दिया |काजल की स्टिक पकड़े साची का हाथ काँप रहा था, उसे समझ में नहीं आ रहा था कि उस स्टिक को शीनोदा की आँख के पास क्यों ले जाया जा रहा था ? बड़ा मजेदार दृश्य था |आना ने शीनोदा के हाथ के रूपए साची को दिलवा दिए | मज़े की बात कि न यह बात शीनोदा के पल्ले पड़ी, न ही साची के! ऐसी शादी कभी किसी ने देखी ही नहीं थी और शीनोदा को सब रस्में करवानी थीं जो आना और विवेक की शादी में हुई होंगी | सबने खूब एंजॉय किया और सब ताम-झाम के बाद घुड़चढ़ी शुरू हुई | 

अब घोड़ी पर लंबा शीनोदा विराजमान था और पीछे से साची के हाथ में फूलों की टोकरी पकड़ा दी गई थी | उसके साथ और सभी औरतें भी थीं जो शीनोदा पर उचक उचककर फूल बरसा  रही थीं | साची कितनी खुश थी | खूब उछल उछलकर खिलखिलाते हुए फूल फेंकते हुए साची हँसते हँसते लाल हुई जा रही थी, उसका खूब घेरदार लाल सुर्ख लहँगा इधर से उधर लहरा रहा था | अपने सुनहरे बालों में तो साची ने न जाने कितने गजरे टँकवा लिए थे जो उसके सिर के साथ इधर से उधर डोल रहे थे | कितनी खुश थी, उसकी वह सरल, सहज  खुशी उसकी आँखों, चेहरे और मुस्कान से झरी जा रही थी | 

       सजी हुई घोड़ी पर विराजमान शीनोदा दूल्हे के आगे बैंड और बैंड के बीच में धमाधम नाचते हुए आना की कॉलोनी के किशोर लड़के-लड़कियाँ जिनके साथ दृष्टान्त और दृष्टि भी थे जो उस नाचते हुए झुंड में शीनोदा के प्रोफेसर दोस्तों, उसके भाई और विवेक के साथ अन्य सभी को बारी-बारी से नाचने के लिए खींचकर ला रहे थे ! सोसाइटी के तो सभी किशोरों और बच्चों का मामा था शीनोदा ! उसके सभी अपने थे और वह ऐसे मुस्कुराते लेकिन कुछ डरते हुए घोड़े पर विराजमान था जिसके एक कदम चलने पर उसका दिल धड़कने लगता था| घोड़ी के साथ चलने वाला व्यक्ति बार-बार शीनोदा को आश्वस्त करता कि वह उसे गिरने नहीं देगा | लेकिन उसके चेहरे की रंगत बार-बार ऐसे जल-बुझ रही थी जैसे नियोनसाइन के छोटे-छोटे बल्ब–लाल, पीले, नीले!  

      सड़क तक शीनोदा घोड़ी पर सवार रहा, बाद में आना को बुलाकर पूछा कि क्या वह उन कारों में से किसी में बैठ सकता है जो उसके पीछे –पीछे कतार लगाकर चल रही थीं | आना ने उसकी परेशानी समझी और उसे घोड़ी से नीचे उतार लिया गया | वह आगे वाली सजी हुई कार में बैठ गया और उसके आगे खाली ठुमकती हुई घोड़ी चलने लगी जिसकी शानदार मोतियों से सजी, गर्दन  में बंधी हुई रस्सी को उसका मालिक पकड़कर चल रहा था | सभी गाड़ियाँ धीमी गति में चल रही थीं क्योंकि बैंड वालों को किशोर छोड़ ही नहीं रहे थे, उनका नाचना ज़ारी था और वे बैंड वालों से किसी न किसी गाने की डिमांड करते जा रहे थे | कार उसकी दुल्हन को लाने के लिए फूलों से सजाई गई थी जिसमें वह खुद विराजमान हो गया था  | लड़की वाले तो उस दिन कई घंटे पहले ही विवाह-स्थल पर पहुँच गए थे क्योंकि वहीं पार्लर वाली लड़कियाँ आने वाली थीं |              

         ख़ैर, नाचते –कूदते बरात रंगोली रेस्टौरेंट के बाहर पहुँच गई | मि.वाघेला ने क्या शानदार इंतज़ाम कर रखा था ! गेट से लेकर अंदर तक फूलों की इतनी अद्भुत सजावट थी कि सब प्रसन्न हो उठे |  अद्भुत समा था, सबने शीनोदा को चढ़ा दिया था कि वह रंजु को भी लेकर आ गए कि  बैंड की बजती हुई धुन पर डांस करेंगे | 

“अरे भाई शीनोदा ! रंजु के साथ डांस करो तो तुम्हारा जीवन हमेशा हँसते-गाते बीतेगा|”

 “मतलब ?” बेचारा शीनोदा –उसे कहाँ समझ में आती थीं इस प्रकार के मज़ाक की बातें ! वह तो ऐसे देखता रहता जैसे  चिड़िया फुर्र ---और वह उस फुर्र की हवा में कलाबाज़ियाँ खाता रह जाता |