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पता चला अगले दिन ही शीनोदा साहब बस से कोटा के लिए निकल गए | दो दिन वहाँ रहकर वह वापिस आया |
तीसरे दिन दोनों लड़के फिर आना व विवेक के सामने थे |
“कहिए, क्या रहा बरखुदार !”विवेक ने शीनोदा से पूछा |
“क्या बार ---बार ---” बेचारा सकपका गया |
“कुछ नहीं शीनोदा ----ये तो ऐसे ही ---“आना चाहती थी कि वह अपनी कोटा की बात सुनाए वरना इसी सब में उलझकर रह जाएगा |
“बट –क्या बोले मि.गौड?” बड़ा उलझन में पड़ गया था एक शब्द से---
“बोर मत कर शीनोदा, बताओ वहाँ क्या हुआ ?” आना कुछ पल रुकी, उसकी समझ में आ गया कि अपनी आदत के अनुसार शीनोदा तब तक नहीं बोलेगा जब तक उसे उस शब्द का अर्थ पता नहीं चलेगा | ‘ये विवेक भी ---’उसने मन में सोचा फिर बोली ;
“इनका मतलब था –बरखुरदार मतलब ‘सर’ ---चलो बताओ अब ।क्या हुआ ?”आना इतनी उत्साहित हो रही थी और ये पौंगू एक शब्द में उलझकर रह गया था | अनिल सामने बैठा धीरे-धीरे मुस्काता रहा, ये नहीं कि उसे एक्सप्लेन ही कर दे, उसे तो बता ही दिया होगा शीनोदा ने !
“मई ---क्या बताऊँगा ---?और मि. विवेक मुजको सर क्यों बोलते हैं ?”शीनोदा तो ऐसे शरमा रहा था जैसे उन्नीसवीं सदी की कोई भारतीय कन्या अपने रिश्ते की बात सुनकर शर्माती होगी|
“अरे! वैसे ही बोल दिया, यार ! तुम ही बताओ अनिल”विवेक अनिल की ओर मुखातिब हुए |
“मुझको भी कुछ नहीं बताया इसने, बस बोला, नैक्सट संडे को मम्मी, पापा, रंजु –सब आ रहे हैं |”
“ओह ! दिस इज़ गुड –यानि बात आगे बढ़ रही है ?”आना शीनोदा की ओर मुखातिब
“क्यों शीनोदा ? डिसीज़न ले लिया ---?”
“नो—नो—नो—अभी डिसीज़न नहीं | मैंने उनको बोला कि आप लोग डिसाइड करेंगे | इसीलिए वो लोग सब आ रहे हैं न !”
‘बच्चों जैसी बात नहीं है ?’ आना ने सोचा ‘शादी इसको करनी है, डिसाइड हम लोग करेंगे, ये क्या बात हुई भला ?’अनिल अभी भी मुँह में दही जमाए बैठा था |शायद वह भी सोच रहा था कि कैसा बंदा है, शादी इसे करनी है, बंदूक मिसेज़, मि.गौड के कंधे पर टिका रहा है ! वैसे उसे तो दोनों ही टिपिकल लगते थे | इन दोनों की गुपचुप तोड़ने के लिए किसी माध्यम की ज़रूरत तो होगी ही और वो माध्यम और कौन था उनके सिवा ? बाबा ! कैसे नमूने हैं दोनों !
“एक बात है दीदी ---”अनिल का मुँह खुला |
“बोलो ---”
“ये तीनों आएँगे, हो सकता है बॉबी, छोटा भाई भी आ जाए –देखता हूँ, इंस्टीट्यूट के गैस्ट –हाऊस में शायद इंतज़ाम हो जाए---भाई और पापा का तो हो जाएगा | मम्मी और रंजु के लिए दिक्कत होगी –“उसने बहुत झिझकते हुए कहा|न जाने कैसे उसका मुँह खुला था उस दिन –लंबे-लंबे वाक्य बोल रहा था|
‘हाँ।ज़रूरत सब करवा लेती है !’आना ने सोचा |
“अरे ! घर तो है न, क्यों चिंता करते हो ?”विवेक जी ने बहादुर बनकर कहा |
हो सकता था आना भी यही कहती लेकिन क्योंकि विवेक ने कहा, वो भी बिना उसकी कंसैंट !कैसे कहा ? ---चेहरे पर तो उसके मुस्कान बनी रही लेकिन मन में मंथन होने लगा |’कैसे होते हैं ये पति लोग भी---! पता चलता है किसी मेहमान के आने पर कितना लोड पडता है ! ये तो कहकर अच्छे बन गए लेकिन सब अरेंजमेंट्स तो मुझे करने हैं न ! इनको क्या तकलीफ़ ? गप्पें मारेंगे बैठे –बैठे’ ऊपर से विवेक का यह पूछना उसे और कुढ़ा गया –
“ठीक है न आना ?”
बताओ भला –शादी ये बंदा कर रहा है, डिसाइड और अरेंजमेंट करें हम लोग !!
कभी –कभी आना को पता ही नहीं लगता था कि वह ख़ुश है या नहीं ?आख़िर वह ख़ुद भी तो यही बात कहती | अगर विवेक उसके मित्रों से अच्छी तरह बर्ताव न करते तब भी उसे बुरा लगते हुए देर न लगती ! सोचकर उसके चेहरे पर कुढ़न की जगह सच्ची मुस्कान फैल गई |उसने पति की ओर मुस्कुराकर देखा |
“नो—नो--वी कैन अरेंज ए होटल –” जब शीनोदा की समझ में बात आई, उसने कहा |उसका दोष नहीं था, वह बेचारा तो समझने की बहुत कोशिश करता था लेकिन उसके लिए चीज़ें कठिन हो ही जाती थीं | समय लगता था उसको समझने में !
“क्या ज़रूरत है होटल की ? अनिल की मम्मी और रंजना यहाँ पर रह जाएँगे और पापा और भाई तुम्हारे साथ हॉस्टल में रह सकते हैं ---”आना ने बड़प्पन दिखाने का नाटक किया | सच, उसे भी तो लग रहा था कि वह कहाँ कम है, जब मौका मिलता है, कुछ न कुछ नाटक तो कर ही डालती है |अभी विवेक ने यही कहा तो उसे मिर्चें क्यों लग गईं भला ??अपनी सोच पर वह स्वयं ही मुस्कुरा दी और एक झटके से उस बेकार से विचार को भी झटककर फेंक भी दिया |
और वह दिन आ ही गया जब अनिल का परिवार आना के घर पर था |आना ने गाजर-मूली, नीबू, हरी मिर्च –इतने सारे आचार तैयार करवा लिए थे, ख़ास तौर पर चटनी जो वैसे तो अधिकतर उसके रेफ्रीजेरेटर में तैयार रहती ही थी, शीनोदा को इतनी पसंद थी कि एयरपोर्ट से ही फ़ोन करके बोल देता था कि उसके लिए चटनी बनवाकर रख ले |इस बार ख़त्म हो रही थी, उसने वह भी बनवा ली |वैसे भी मेहमान अधिक थे और ज़्यादातर उसके घर पर ही कहना-पीना होने वाला था | जिस दिन उन्हें पहुँचना था, आना ने उन सबका लंच भी तैयार करवा लिया था |
सब समय पर पहुँच गए थे | आना और विवेक का परिचय हुआ और फ़्रेश होकर लंच पर बातें करते हुए कार्यक्रम की रूपरेखा पर चर्चा होने लगी | अनिल अपनी बहन व मम्मी को भी अपना हॉस्टल दिखाना चाहता था इसलिए विवेक से व आना से भी साथ चलने को पूछा गया लेकिन दोनों ने मना कर दिया | आना को तो डिनर की तैयारी भी करवानी थी | पता नहीं इस परिवार को क्यों किसी को पकड़कर लाने की आदत थी | कोई न कोई इस परिवार में अतिथि बनकर आता ही रहता और वो अतिथि कोई एक-दो दिन का न होता, वो बेशक रात में कहीं और सोता रहा हो, भोजन तो उसका आना के परिवार के साथ ही होता | वो तो अच्छा था रामी उसके साथ बरसों से थी वरना उसकी मुसीबत में कोई संशय नहीं था |
“तुम्हें कैसी लगी लड़की ?” विवेक ने उन लोगों के जाते ही पूछा |
“लड़की, लड़की जैसी है, और क्या ---शादी शीनोदा को करनी है ”
“अभी तक मुँह सूजा हुआ है क्या ?” विवेक ने आना को छेड़ते हुए कहा |
“विवेक ! आपको कुछ पता भी चलता है, कैसे मेहमाननवाज़ी में हालत पतली हो जाती है !” माना ने रूठने का नाटक किया |
“अच्छा ! और दोस्त किसके हैं ये सब ?”
“अब तो आपके बन गए हैं !” फिर वह खिलखिलाकर हँस पड़ी |
“अच्छा, छोड़ो, बताओ आपको कैसी लगी कन्या ---?”
“डिट्टो----जो बात तुमने कही, वही ठीक है न !शादी तो उन दोनों को करनी है, हम तो ठहरे बस –बराती -- ”
“अरे !बराती-घराती---दोनों ---”
और दोनों के बीच की उदासी दूर हो गई |
ऐसे ही छुटर-पुटर होता रहता था दोनों के बीच लेकिन ज़िंदगी में संगीत था, लय थी, राग था !!