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सोमवार की शाम को फिर से हाज़िर थे दोनों बंदे !
पता नहीं क्या है इन दोनों में कि चेहरे के हाव-भाव से कुछ पता ही नहीं चलता !आगे बढ़कर पूछना पड़ता है तब भी उत्तर आसानी से कहाँ मिल पाता है !करते रहो प्रतीक्षा !
‘गुड इवनिंग’ करके दोनों चुप्पी साधे बैठे थे;
“क्या हुआ ?कैसा रहा ट्रिप और हाँ, तुम्हारी मुलाक़ात शीनोदा ----?”विवेक ने ही आगे बढ़कर पूछा
“ अच्चा है सब ?” शीनोदा के मुख से अभी भी कुछ शब्द फिसल जाते थे लेकिन इतना भी कुछ नहीं था कि समझ में न आता हो |
“तो अनिल ---क्या रहा मम्मी-पापा का रिएक्शन ?”
“उनको तो कोई प्रोबलम नहीं है, लेकिन थोड़ी चिंता होनी तो नेचरल है न, अपनी बेटी को वैसे ही किसी अजनबी के साथ भेजना मुश्किल होता है फिर ये तो –मतलब अगर इनकी सैटिंग हो जाती है तो उन्हें अपनी बेटी को अपनी नज़रों से दूर विदेश भेजना होगा –वैसे ज़्यादा तो इन दोनों को ही सोचना है | इनको ही एडजस्ट करना है|” अनिल ने अपनी आदत के अनुसार धीमे से किन्तु इतना बड़ा उत्तर दिया |
आना को आश्चर्य था कि अनिल इतना बोल सकता है ---एक साथ !!उसने विवेक को और विवेक ने उसे देखा और दोनों आँखों आँखों में मुस्कुरा दिए |
“हाँ, रंजु को ज़्यादा परेशानी होगी, आखिर दूसरे देश की कल्चर में एडजस्ट करने में टाइम लगता है –” मुश्किल तो था, विवेक का कहना ठीक ही था |
“जी, ये मैं समझता हूँ –” शीनोदा ने समझदारी से गर्दन हिलाई |
“इसीलिए, जो भी निर्णय लेना है, सोच-समझकर लेना है|हमें सबके बारे में सोचना होगा न खास तौर से रंजु के बारे में !उसको अपने देश से जाकर एकदम नए परिवेश में जमना है |”
“यस, यू आर राइट मि.गौड –”
शीनोदा काफ़ी समझदार व विवेकी था | केवल अपने बारे में ही सोचना उसका लक्ष्य नहीं रहता था | अपने से जुड़े हुए सबके बारे में वह कंसर्न रहता था फिर यहाँ तो सवाल उसकी भावी पत्नी का था | उसने अपने हाव-भाव से सबको आश्वस्त किया |
उसके हृदय में खलबली थी, न जाने क्यों अंदर ही अंदर वह कुछ उद्विग्न दिख रहा था |
“तुमने बात की बहन से ?उसे कैसा लग रहा है ?कम्फ़र्टेबल है वह ?”अनामिका ने अनिल से पूछा |
“ठीक है दीदी, वह भी कुछ ऐसी ही लग रही थी, अभी शायद समझ नहीं पा रहे हैं-- ये दोनों ही –”
इतना आसान नहीं होता जीवन का फैसला लेना ! वो भी देश से बाहर और वो भी एक विदेशी के साथ जीवन भर का साथ निभाने का फैसला! भाषा से लेकर संस्कार, संस्कृति, जीवन-मूल्य—सब अलग ! भारतीय परिवेश में जन्म लेकर उसमें पलना, उन्हीं संस्कारों के बीच बड़े होना ! विदेशों की बातें सुनकर उन पर प्रश्न चिन्ह लगाना ?आश्चर्य चकित हो वहाँ के रोज़ाना की जीवन-शैली को कान खोल, आँखे फाड़कर महसूसने का प्रयास ! यद्धपि शीनोदा में एक नफ़ासत थी, एक डीसैंसी –फिर भी वह एक विदेशी था और उसके लिए शायद रिश्तों के जुड़ने व टूटने की घटना इतनी असहज करने वाली भी नहीं होने वाली थी | लेकिन रंजु को अपना सब-कुछ दाव पर लगाना था |अपनी ज़मीन, अपना देश, अपने रिश्ते –मित्र, संबंधी –सभी कुछ --
“हाँ ! मुश्किल तो है, बहुत सोच-समझकर फैसला लेना पड़ेगा |”विवेक बोले |
“अभी मैं रंजना से मिलना चाहता हूँ |आई मस्ट क्लेरीफ़ाई सम ऑफ द थिंग्स|”
“बोथ ऑफ़ यू शुड टॉक एंड डिस्कस अगेन --इन फ़ैक्ट मैनी टाइम्स इफ़ यू फील बोथ ऑफ़ यू मे बी कंफ़ेर्टेबल विद ईच-अदर -----” विवेक ने सुझाव दिया |
“यस, यू अंडरस्टेंड मी ---आई मस्ट मीट हर ---अगेन एंड अगेन इफ़ नैसेसरी---” शीनोदा जैसे एक बच्चे की तरह बोल उठा जैसे किसी बच्चे की बात कोई बड़ा समझ ले और वह अपनी अपेक्षित वस्तु पाने के लिए आशान्वित हो जाए ---|
“तो मिल आओ, तसल्ली पहली बात है ---” विवेक ने उसे समझाते हुए कहा फिर शरारती भरे लहज़े में बोले ;
“वैसे यह ज़रूरी नहीं कि कई बार मिलने से एक-दूसरे को पूरी तरह समझा जा सके, ठीक कह रहा हूँ न माना ?”और एक लंबी शरारती मुस्कान कानों तक खींच ली |
“यस, शीनोदा !”
“ये चला जाएगा, अब सब इसको पहचानते हैं, मेरे जाने की ज़रूरत नहीं है |”अनिल ने कहा |
“हाँ ---यह भी ठीक है | शीनोदा ! तुम जाकर बात कर लो, तुम लोगों को ही एक-दूसरे के विचारों को जानना है न ?”आना ने कहा |
“हाँ जी ---मुझको जाना चाहिए, मैं चला जाएगा –जाऊँगा ”शीनोदा के वाक्य-सुधार ने हवा में खिलखिलाहट भर दी और उस दिन की बैठक समाप्त हो गई |
‘बड़ा हम पर अहसान करेगा !!’आना ने सोचा