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भारत आकर शीनोदा ने अनुज की प्रशंसा के पुल बाँध दिए, उसने अनामिका और विवेक को यह भी बताया कि ख्याति उसके लिए लड़की तलाश करेगी |
“लेकिन तुम्हें तो पहले 'कोर्टशिप' करनी होगी न ?”विवेक ने पूछा |
“बिना पहचान के शादी कैसे सक्सेसफुल हो सकती है ?एक-दूसरे को जानना, पहचानना तो ज़रूरी है न ?” शीनोदा ने सरलता से कहा|
“पूरी उम्र में भी पहचान कहाँ पाते हैं, एक छत के नीचे रहकर भी किसीको ?”विवेक शरारत से हँसा |
“खुद को पहचानते हैं क्या हम ?”आना विवेक का रिमार्क समझकर चुप तो रहने वाली थी नहीं |
शीनोदा के साथ अनिल भी था, वह अपने मित्र के द्वंद को खूब समझ रहा था | अब थोड़ी बात भी करने लगा था, मूल रूप से वह चुप प्रकृति का तो था ही|
“कुछ कहो अनिल तुम भी ---अब तो तुम भी परिवार के सदस्य हो गए हो ---”विवेक ने अनिल को बुलवाने का प्रयास किया |
“मैं शीनोदा से बात करना चाहता था लेकिन जानता हूँ आप लोगों के बिना वह कोई उत्तर नहीं देगा इसलिए मैं चुप रहा –”
“ही स्पीक्स वेरी लैस –कबी-कबी तो हम एक-दूसरे को अपनी बात समझा नहीं पाते –”शीनोदा बोला |
“मैं सोच रहा था मि.गौड, मेरे से छोटी एक सिस्टर है, अंजु, टीचिंग में |उसके लिए भी हम लड़का ढूँढ ही रहे हैं |अगर ये दोनों एक-दूसरे को पसंद करें तो बात आगे बढ़ सकती है, इसके लिए मुझे अपने पेरेंट्स से और सिस्टर से बात करनी पड़ेगी –”
“यह तो बहुत अच्छी बात है, तुम दोनों एक-दूसरे को अच्छी तरह पहचानते भी हो|अनिल, तुमने इससे बात क्यों नहीं की --?”
“बगल में छोरा, शहर में ढिंढोरा ---” आना हँस पड़ी|
“अरे दीदी ! मैंने एक-दो बार बताया था मेरे से एक छोटी बहन है जिसकी अभी शादी नहीं हुई लेकिन मुझे कोई रेस्पौंस नहीं मिला तो----”
“कमाल है, अभी कितनी बातें तो इसको खोलकर समझानी पड़ती हैं तुम जानते तो हो –खुलकर पूछ लेते –तुम भी तो --” विवेक ने हँसकर कहा फिर वे शीनोदा की ओर मुड़े |
“शीनोदा, यू नो अनिल हैज़ ए यंगर सिस्टर –”
शीनोदा दृष्टांत के कॉमिक के पन्ने पलट रहा था | उसका स्वभाव था वह किसीके बीच में नहीं बोलता था जब तक कोई उससे सीधा सवाल न करे|
“भाई, तुम्हारी ही बात हो रही है शीनोदा ---”
“यस, मि.गौड ----यस, आइ नो --”
“व्हाइ डोंट यू थिंक अबाउट हर सिस्टर एज़ यू कैन अंडरस्टैंड इच-अदर वैल ?एंड व्हाइ डोंट यू टॉक टू यूअर पेरेंट्स एंड सिस्टर ?अनिल, दिस मे बी गुड मैच !” विवेक ने कहा |
“मि. गौड, अगर मुझे इसकी तरफ़ से कोई ग्रीन सिग्नल मिले तब मैं पेरेंट्स से बात कर सकता हूँ |”अनिल ने धीरे से कहा |
“कमाल है, यार शीनोदा, सोचो न इस बारे में | आइ थिंक दिस मे बी वेरी गुड मैच, यू कैन टॉक टु हिज़ सिस्टर इफ़ शी एंड द फ़ैमिली एग्री ---”
विवेक ने सीधी सी बात दोनों को सुझाई तो उसके दिमाग की बत्ती जली|अनिल के मन में पहले से था लेकिन वह इतना संकोची था कि खासी मित्रता होते हुए भी शीनोदा से खुलकर नहीं बोल पाया था ---और शीनोदा महाराज तो अलग ही अंदाज़ के बंदे ! अनिल के परिवार के बारे में सब कुछ जानते हुए भी ---
दरअसल, उसे समझ में नहीं आया था कि वह कैसे अपने दोस्त की बहन के बारे में बात करे ? कहीं न कहीं उसके विचारों को ऐसा आकार देने में अनामिका की ही घुसपैठ थी जो बार-बार उसे भारतीय संस्कृति के भाषण देती हुई थकती नहीं थी | कितनी भी समीपता हो रिश्तों के मध्य एक सहज दूरी स्वाभाविक रूप से रहती ही है, रहनी भी चाहिए, आना व विवेक कुछ ऐसा ही मानते थे | हर बात या परिस्थिति में हम हर रिश्ते के बीच नहीं कूद सकते | यदि कोई आपसे कुछ पूछे, या अपेक्षा करे तो ठीक है किन्तु अपने आप सलाह देते रहने से कभी-कभी रिश्तों में खरोंच भी आने लगती है |
“ठीक है, अगर शीनोदा ठीक समझे तो मैं पेरेंट्स और बहन से पूछ लेता हूँ ---आगे फिर जैसा वो कहेंगे |” अनिल ने आँखें नीची करके कहा |
“मि. गौड, आपको लगता है, यह ठीक बात है ?”शीनोदा के दिमाग की बत्ती जल तो गई थी लेकिन अभी भी वह असमंजस में था | उसके मन का तराज़ू डावांडोल था कि दोस्त की बहन
को प्रपोज़ किया जा सकता है या नहीं ?जब वह अपने लिए कोई ‘गर्ल-फ्रेंड’ नहीं ढूँढ सका तो क्या भारत में दोस्त की बहन को प्रपोज़ किया जा सकता है ?बेचारा ! पशोपेश में डूबता-उतरता रहा था |
“अरे क्यों नहीं ? अनिल, परिवार और बहन से बात करनी ज़रूरी है ---क्यों अनिल ?”
“मुजको लगा ---मालूम नहीं ऐसे पूछ सकते हैं अतवा नहीं ?” बहुत ही सरल, सहज स्वभाव का बंदा !जो उसके मन में था उसके, वही बाहर !
अनामिका उसकी बातों पर खूब हँस पड़ती थी | इस बार भी वह ज़ोर से हँस पड़ी –
“आप क्यों हँसते हैं ?” शीनोदा बारी-बारी से सबके चेहरे ताक रहा था |
“ये आना का सिखाया –पढ़ाया है ---” विवेक ने पत्नी के कंधे पर बंदूक रख दी |
“अरे ! मैंने किसी को कुछ सिखाया –पढ़ाया नहीं भाई –वो तो जब यह गर्ल-फ्रेंड की बात कर रहा था तब जीजाजी की बात याद आ गई थी मुझे, इसीलिए हँसी आ गई |”
“ओ ! वो जीजा जी, यस ----” कहकर शीनोदा भी मुसका दिया, उसे भी याद आ गया था |
एक अनिल ही नीचे गर्दन झुकाए बैठा रहा |उसे उस घटना के बारे में कोई जानकारी तो थी नहीं, वह बेचारा मुँह में दही जमाए बैठा रहा | वैसे भी उसके मुख में दही जमी ही रहती थी |
दो दिनों बाद फिर अनामिका के परिवार में महत्वपूर्ण बैठक जमी जिसका आधार शीनोदा व अनिल की बहन अंजू का रिश्ता था |
“क्या रहा अनिल ---घर पर बात हुई ?” विवेक ने पूछा | वे जानते थे दोनों चुप्पी ओढ़े बैठे रहेंगे |
“हाँ---बात तो हुई है ---” वही झुका सिर और धीमी आवाज़ |
“कुछ पॉज़िटिव है ?”
“हाँ—जी ।कह तो रहे हैं तुम देख लो ---” उसी धीमी सी आवाज़ में अनिल बोला |
“बात तो शीनोदा और तुम्हारी बहन को करनी है न ! एट लीस्ट, एक-दूसरे से मिल तो लो-" विवेक तो जोड़ी बनाने के ज़बरदस्त मूड में थे |
“जी, वही बात करने आपके पास आए हैं, इस सैटरडे को आप लोक भी साथ चलेंगे ?” शीनोदा ने विवेक के चेहरे पर अपनी आँखें गड़ा दीं |
“हम लोग ---? हम लोग क्या करेंगे ? आप जाइए न दोनों ----”आना एकदम बोल पड़ी|
“आई वॉन्ट यू टू कम विद मी मि. गौड ----” कमाल है, जापानी लड़का लड़कियों की तरह शर्मा रहा था | वैसे भी वह था तो शर्मीला ही, बेहद अपने आप में रहने वाला ! आना की बात कुछ अलग ही थी, वह तो किसीके के भी मुँह में ऊंगली डालकर बुलवा ही देती |
कहाँ अपने लिए गर्ल-फ्रेंड तलाश करने की बात बेबाकी से कहने वाला यही लड़का कैसे इस समय शरमा रहा था ! अनामिका की हँसी चेहरे पर पसर तो गई लेकिन उसने अपने आपको खिलखिलाने से रोक लिया | बेचारा सा हो आता है ये शीनोदा भी कभी-कभी ! या तो इसकी समझ में पूरी बात नहीं आती या फिर यह अपने को पूरी तरह मुखरित नहीं कर पाता | इसलिए बेचारा अनामिका की हँसी सहने के लिए बाध्य हो जाता है |
“तुम भी कमाल हो आना ! ऐसे खिलखिलाकर हँसती हो कि सामने वाला बेचारा सा ताकता ही रह जाता है |” विवेक अक्सर कह बैठते हैं |
“तो हँसना गलत है क्या ? क्यों शीनोदा ! क्या हँसने पर कोई कंट्रोल होना चाहिए ?”
“नो—नो ---”उसे कहना पड़ा | दो पल ठहरकर उसने फिर विवेक की ओर ताका |
“सो, व्हाट डू यू से मि.गौड ---कैन यू कम विद मी –?”इस बार उसने केवल विवेक से पूछा |
“बिलकुल, आ सकता हूँ लेकिन मैं करूँगा क्या ? तुम अनिल के साथ जाकर तो आओ, परिवार से, लड़की से मिलो फिर सोचेंगे क्या, कैसे करना है ?”
ठीक ही तो कहा था विवेक ने, भई !इतना संकोच किस बात का ? सब कुछ पारदर्शी तो था |अनिल का परिवार कोटा में था, दोनों को जाकर आने में कितना समय लगता ? फिर कुछ बात आगे बढ़ती हो तो तब न विवेक व आना बीच में ज़रूरत के अनुसार शामिल हों |
कितनी मुश्किल से समझाया विवेक ने दोनों को ।बच्चों की भाँति व्यवहार कर रहे थे दोनों !कठपुतलियों की भाँति गर्दन हिलाई दोनों ने और आने वाले शनीवार की जाने की और रविवार को वापिस लौटने का रेल का आरक्षण करा लिया गया |