Tere Mere Darmiyaan - 72 in Hindi Love Stories by CHIRANJIT TEWARY books and stories PDF | तेरे मेरे दरमियान - 72

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तेरे मेरे दरमियान - 72

कुछ देर बाद पापा ने नरमी से कहा—

अशोक :- "बेटा, तू पहले अपने आपसे साफ-साफ कह—क्या तू उसे खोने से डरती है?"

जानवी ठहर गई। दिल का जवाब बिना सोचे आया:

जानवी :- "हाँ, पापा… बहुत डर लगता है।"

अशोक :- "तो प्यार है ये बेटा , तु जा और जाके उसे बोल दे ।

ये शब्द जैसे उसके पूरे अस्तित्व को चुप करा गए।
सच्चाई, जिसे वह आजतक नकारती रही, आज उसी की आंखों के सामने खड़ी थी—

वह आदित्य से प्यार करती है।

जानवी ने गहरी सांस ली। चेहरा साफ किया। खुद को संभाला।

जानवी :- "पापा… अब मुझे वापस जाना होगा। पापा आदित्य की जान को खतरा है ।

ये सुनकर अशोक चोंक जाता है और कहता है --

अशोक :- क्या ! आदित्य की जान को खतरा पर किससे ?

जानवी विक्रम और आदित्य के बीच हूई बात को अशोक को बोलकर सुनाती है --

अशोक :- क्या , तो ये सब विकास का किया धरा है । 

जानवी :- हां पापा , ये बात मुझे इंस्पेक्टर ने पहले ही बताया था । पर मुझे लगा के ये भी आदित्य का कोई चाल है विकास को फसाने का ।

अशोक :- ये तु क्या बोल रही है बेटी ।

जानवी अशोक के कंधे पर अपना सर रखती है और जानवी के आंखो से आदित्य के लिए पानी भर आता है और फिर जानवी कहती है ---

जानवी :- पापा , मैने आदित्य को पहले ही बहोत दुख दिया है पर अब आदित्य की जान भी मेरी वजह से खतरे मे है , मैं उसके साथ कुछ भी गलत होने नही दे सकती । पापा मुझे जाना होगा , मुझे आदित्य के पास जाना होगा ।

पापा ने मुस्कुराकर कहा—

अशोक :- " हां बेटा जाओ और इस बार अपने दिल की सुनकर जाना।"

जानवी उठी और दरवाज़े तक पहुंचकर एक बार फिर रुक गई।

उसकी आंखों में डर भी था, उम्मीद भी…और सबसे ज़्यादा, एक स्वीकारोक्ति—

जानवी :- "शायद… सच में… मैं उससे प्यार करती हूँ।"

वह बाहर चली गई—लेकिन इस बार वो भाग नहीं रही थी…
बल्कि अपने दिल की तरफ लौट रही थी।

उसी रात करिब 10 बजे बारिश की बूंदें खिड़की पर पड़ रही थीं, पर आदित्य के दिमाग में पहले से ही बहुत शोर था। रागिनी की बातो को लेकर , आदित्य सौच रहा था --

>" क्या रागिनी को सच मे जानवी के आंखो मे ऐसा कुछ लगा होगा ? नही नही , जानवी ने तो साफ - साफ मुझसे कह दिया था के वो मुझसे कभी प्यार नही करेगी और वैसे भी जानवी तो विकास से प्यार करती है ।

ये सब सौचकर आदित्य रसोई में चाय बना रहा था तभी डोरबेल बजी।

आदित्य ने दरवाज़ा खोला तो सामने मोनिका खड़ी थी।

एकदम वही चेहरा…वही सुडौल अंदाज़…लेकिन आँखों में वही झूठ की चमक।

आदित्य एक पल के लिए ठहरा—वो लड़की जिसने उसे तोड़ कर छोड़ दिया था, फरेब देकर गायब हो गई थी…वो मोनिका फिर से अचानक उसके सामने थी।

आदित्य :- “मोनिका?” तुम इस वक्त यहां !
 आदित्य ने हैरानी से पूछा।

मोनिका ने हल्की नशीली मुस्कान दी, जिसके पिछे कही ना कहीं चाल छिपी थी।

मोनिका :- “अंदर आऊँ? भीग रही हूँ।”

आदित्य कुछ समझ नहीं पाया, पर इंसानियत में दरवाज़ा खोल दिया।

मोनिका बारिश मे पुरी तरह से भींग चुकी थी । जैसे ही मोनिका अंदर आई, कमरे में एक खामोश तनाव फैल गया।

आदित्य चुप था। आदित्य एक जगह पर खड़ा होकर मोनिका को दैखकर उस वक्त को याद कर रहा था जब मोनिका उसकी जिंदगी का सबसे खूबसूरत हिस्सा हुआ करती थी—

लंबी-लंबी बातें, साथ के सपने, प्लान…और फिर एक दिन अचानक सब खत्म।

वही मोनिका आज, महीनों बाद, बारिश में पुरी तरह भींगी हूई आदित्य के सामने खड़ी थी। मोनिका का भींगा जिस्म जिसमे उसके कपड़े उसको बदन से चिपके हूए थे , आदित्य की नजर अब भी मोनिका पर थी ।

मोनिका ये दैखकर हल्की मुस्कान देकर मन ही मन सौच रही थी --

मोनिका :- लगता है मेरा भीगा जिस्म दैखकर आज आदित्य पिघल जाएगा ।

तभी आदित्य मोनिका से पुछता है --

आदित्य :- “क्यों आई हो?”

 आदित्य ने सख़्त आवाज़ में पूछा।

मोनिका ने सीधे उसकी आँखों में देखा—

मोनिका :- वो बाहर बारिश हो रही है ना इसिलिए मैं यहां पर आ गई ।

मोनिका ठंड से कांप रही थी , उसके दांत किटकिटा रहे थे ।

ये दैखकर आदित्य इंसानियत के नाते उससो कहता है --

आदित्य उसकी हालत देखकर परेशान हुआ था।

आदित्य :- “तुम्हें सर्दी लग जाएगी… मैं बाहर से कोई सूखे कपड़े ले आता हूँ,”

वो इतना कहकर मुड़ गया। रुको मैं तुम्हारे लिए कपड़े लेकर आता हूँ ।

आदित्य अंदर मोनिका के लिए कपड़ा लाने चला जाता है । मोनिका अपने आप से कहती है --

मोनिका :- आज कैसे भी करके मुझे आदित्य के साथ वो सब करना है , तभी मेरे बच्चे को उसका नाम मिलेगा । 

इतना बोलतर मोनिका अपना ओड़नी को अपने कंधे से निचे कर देती है , तभी वहीं पर आदित्य मोनिका के लिए कपड़ा लेकर आ जाता है ।

मोनिका पूरी तरह भीग चुकी थी। बारिश का पानी उसके कपड़ों को उसके शरीर से चिपका चुका था। कमरे में हल्की-सी ठंडक थी और उसके काँपते हाथ बताते थे कि वो सिर्फ ठंड से नहीं, बल्कि अपने भीतर उठ रहे डर और आदित्य के साथ रात बिताने की लालच की वजह से भी कांप रही थी।


मोनिका जानती थी कि यह मौका दोबारा नहीं मिलेगा। अगर आदित्य उसके करीब नहीं आया, तो वह अपने बच्चे को उसका नाम नहीं दे पाएगी… और विक्की तो उसे पहले ही छोड़ चुका था।

जैसे ही आदित्य बाहर गया, मोनिका की आँखों में एक खतरनाक चमक उभर आई—

“आज नहीं तो कभी नहीं…”

उसने जल्दी से अपनी ओढ़नी नीचे गिरा दी, ताकि जब आदित्य लौटे तो उसके दिमाग में वही तस्वीर बैठे, जो मोनिका आदित्य को दिखाना चाहती है , जिससे उसकी प्लानिंग सफल हो सके।

दरवाज़ा खुलने की आवाज़ हुई।

आदित्य अंदर आया—हाथ में सफेद कलर की टी-शर्ट और एक सलवार सूट का सेट था, जो उसने गेस्ट रूम से लाकर दिया था।

लेकिन जैसे ही उसकी नज़र मोनिका पर पड़ी…
वह एक पल के लिए ठिठक गया। आदित्य वही दैख रहा था जिसे मोनिका दिखाना चाहती थी , तभी आदित्य मोनिका को ऐसै दैखकर अपने आपको असहज महसूस करने लगा और मोनिका को कपड़ा दैकर कहता है --

आदित्य :- अंदर जाकर बदल लो , वरना तुम्हें सर्दी लग जाएगी ।

मोनिका बड़े प्यार से आदित्य से कहती है --

मोनिका :- अंदर क्यों , क्या मैं यहां तुम्हारे सामने नही बदल सकती?

मोनिका की बात पर आदित्य हैरान था , कभी आदित्य भी मोनिका से प्यार करता था और आदित्य भी मोनिका के साथ ऐसे ही रोमांटिक होना भी चाहता था पर आज बात कुछ और थी । 

आदित्य के माथे से पसीना आने लगा था , आदित्य मोनिका से कहता है --

आदित्य :- ये तुम क्या बोल रही हो मोनिका ।

मोनिका आदित्य के करिब आ जाती है , आदित्य अपना कदम पिछे कर लेता है , मोनिका आदित्य का हाथ पकड़कर कहती है --

मोनिका :- क्यों मुझे ऐसा नही कहना चाहिए ?

आदित्य चुप था , मोनिका फिर अपना कदम आदित्य की और बड़ाती है और इस बार मोनिका आदित्य के करिब थी , दोनो की नजरे अब एक दुसरे से ठकरा रहे थे , मोनिका आदित्य के हाथ को पकड़कर अपने कमर पर रख देती है और मन ही सौचती है -

मोनिका :- बस ऐसै ही आदित्य और कुछ दैर के लिए तुम मेरा साथ दो , उसको बाद तुम और मैं एक हो जाउगीं और उस जानवी को इस घर से और तुम्हारी जिदंगी से बाहर कर दूगीं मैं ।

आदित्य और मोनिका के होट अब आमने - सामने थे , मोनिका आदित्य के और करिब जाने लगती है तो आदित्य उसे कुछ कहना चाहता था पर मोनिका उसके होंट पर अपना हाथ रख देती है और कहती है ---

मोनिका :- स्सस...! कुछ मत कहो , मैं कब से इस पल का इंतेजार कर रही थी ।

तभी वहां पर जानवी आ जाती है , जानवी के आने का उन दोनो को कोई अंदाजा नही था , जानवी जैसे ही अंदर आती है वो दोनो को एक साथ इतने करिब दैखकर चोंक जाती है और उसके कदम वही पर जम जाती है । 

जानवी आदित्य और मोनिका को एक साथ दैखकर गुस्से से लाल हो जाती है , इधर मोनिका आदित्य को वही पर सोफे मे लिटा देती है और उसके उपर आकर उसके सर्च के बटन को खोलने लगती है और फिर आदित्य को चुमने लगती है ।

ये दैखकर जानवी के आंखो से आंशु आ जाती है , जानवी अपना कदम मोनिका की और गुस्से से बड़ाती है ताकी जानवी मोनिका को आदित्य से अलग करके उसे एक जौरदार थप्पड़ मार सके ।

पर जानवी अपना कदम रोक लेती है और मन ही मन कहती है ---

जानवी :- " नही जानवी रुक जा , ये तु क्या करने जा रही है और क्यों , ये दोनो एक दुसरे से प्यार करते है और वैसे भी तु अब इसकी पत्नी तो रही नही , तो फिर किस अधिकार से तु उन्हें रोकने जा रही है। दैख आदित्य भी मोनिका को रोक नही रहा है तो फिर तु कौन होती है जो बार - बार उसकी खुशी छिनना चाहती है । नही जानवी अच्छा तो यही होगा के तु ही यहां से चली जा , चली जा यहां से जानवी ।

जानवी अपनी बहती हूई आंशुओ को पोछती है और वहां से चली जाती है ।

मोनिका आदित्य को पागलो की तरह चुमे जा रही थी , तभी अचानक से आदित्य को जानवी की याद आती है और तभी आदित्य मोनिका को अपने से धक्का देकर दुर कर देता है ।

मोनिका आदित्य के ऐसा करने से बहोत हैरान थी , मोनिका आगित्य को पास जाती है तो आदित्य अपना कदम पिछे कर लेता है और कहता है --

आदित्य :- नही मोनिका , मैं ये नही कर सकता । 

मोनिका :- क्यों आदित्य, क्या हूआ , हम ऐसा क्यों नही कर सकते ।

आदित्य :- क्योंकी ये गलत है ।

मोनिका :- कुछ गलत नही है आदित्य । हम दोनो एक दुसरे से प्यार करते है ना?

To be continue....589