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विचलित मन
लेखक: विजय शर्मा एरी
प्रस्तावना
मनुष्य का मन एक नदी की तरह है—कभी शांत, कभी उफान पर। जब जीवन की परिस्थितियाँ उसे झकझोरती हैं, तो वह विचलित हो जाता है। यह कहानी एक ऐसे युवक की है, जो अपने सपनों और वास्तविकताओं के बीच उलझकर आत्मसंघर्ष करता है।
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कहानी
1. शुरुआत
अमन, दिल्ली विश्वविद्यालय का छात्र, साहित्य का दीवाना था। किताबों में डूबा रहने वाला यह युवक अक्सर अपने दोस्तों से अलग-थलग पड़ जाता। उसके भीतर एक बेचैनी थी—कुछ बड़ा करने की, कुछ ऐसा लिखने की जो समाज को बदल दे। लेकिन घर की आर्थिक स्थिति और पिता की अपेक्षाएँ उसे बार-बार विचलित कर देतीं।
पिता चाहते थे कि अमन सिविल सेवा की तैयारी करे। "लिखने-पढ़ने से पेट नहीं भरता बेटा," वे कहते।
अमन चुप रहता, लेकिन भीतर से टूटता जाता।
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2. संघर्ष
कॉलेज की लाइब्रेरी में बैठकर अमन अक्सर कविताएँ लिखता। उसकी डायरी में दर्ज पंक्तियाँ उसकी आत्मा की आवाज़ थीं:
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मन की उलझनें
जैसे टूटी हुई डोर,
सपनों का भार
और उम्मीदों का शोर।
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उसकी रचनाएँ दोस्तों को पसंद आतीं, लेकिन घर में उन्हें "बेकार की बातें" कहा जाता।
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3. प्रेम और असमंजस
कॉलेज में उसकी मुलाकात राधिका से हुई। राधिका समाजशास्त्र की छात्रा थी और सामाजिक मुद्दों पर काम करती थी। उसने अमन की कविताएँ पढ़ीं और कहा, "तुम्हारे शब्दों में आग है, इन्हें दबाओ मत।"
राधिका का विश्वास अमन को ताक़त देता, लेकिन पिता की डाँट उसे फिर से विचलित कर देती।
वह सोचता—क्या मैं अपने सपनों के लिए परिवार को दुखी करूँ?
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4. मोड़
एक दिन कॉलेज में "युवा साहित्य सम्मेलन" हुआ। अमन ने अपनी कहानी "अधूरी आवाज़ें" वहाँ पढ़ी। कहानी में बेरोज़गार युवाओं की पीड़ा थी। श्रोताओं ने तालियाँ बजाईं, लेकिन अमन के पिता, जो संयोग से वहाँ आ गए थे, गुस्से से बोले—
"ये सब नाटक है। असली ज़िंदगी में नौकरी चाहिए, तालियाँ नहीं।"
अमन का मन टूट गया। वह कई दिनों तक लिखना छोड़ बैठा।
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5. आत्मसंघर्ष
राधिका ने उसे समझाया—"तुम्हें अपने भीतर की आवाज़ सुननी होगी। अगर तुम विचलित रहोगे, तो कभी आगे नहीं बढ़ पाओगे।"
अमन ने डायरी में लिखा:
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विचलित मन
जैसे अंधेरे में दीप,
कहाँ जाऊँ, किसे मानूँ,
सपनों या कर्तव्य की सीप।
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6. निर्णायक क्षण
कॉलेज के अंतिम वर्ष में अमन को एक अवसर मिला। एक पत्रिका ने उसकी कहानी छापी और उसे "सर्वश्रेष्ठ युवा लेखक" का पुरस्कार दिया।
पिता ने पहली बार उसकी रचनाएँ पढ़ीं। वे चुप रहे, लेकिन उनकी आँखों में हल्की चमक थी।
अमन ने समझा—शायद धीरे-धीरे वे भी मान जाएंगे।
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7. अंत और संदेश
अमन ने तय किया कि वह सिविल सेवा की तैयारी भी करेगा और लिखना भी जारी रखेगा। उसने समझा कि जीवन में संतुलन ही सबसे बड़ा उत्तर है।
वह अब भी विचलित था, लेकिन उस विचलन ने उसे और गहरा बना दिया.
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8. पिता का मौन
पुरस्कार मिलने के बाद अमन के पिता कई दिनों तक चुप रहे। वे न तो बधाई टते। अमन को यह मौन और भी विचलित कर रहा था।
एक रात खाने की मेज़ पर पिता ने अचानक कहा—
"तुम्हारी कहानी में दर्द है, लेकिन क्या तुमने सोचा है कि यह दर्द तुम्हें कहाँ ले जाएगा?"
अमन ने उत्तर दिया—"शायद वहीं, जहाँ से लोग अपनी सच्चाई देख सकें।"
पिता ने गहरी साँस ली। "सच्चाई से पेट नहीं भरता बेटा।"
अमन का मन फिर से उलझ गया।
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9. राधिका का साहस
राधिका ने अमन को समझाया—"तुम्हारे पिता का डर जायज़ है। वे चाहते हैं कि तुम सुरक्षित रहो। लेकिन तुम्हारी आत्मा सुरक्षित तभी होगी जब तुम अपनी राह चुनोगे।"
उसने अमन को एक किताब दी—"अज्ञेय की कविताएँ"।
अमन ने पढ़ा: "मैं अनंत में विचरता हूँ, मैं अनंत हूँ।"
ये पंक्तियाँ उसके भीतर आग की तरह उतर गईं।
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10. समाज की आवाज़
कॉलेज के बाद अमन ने एक एनजीओ में काम करना शुरू किया। वहाँ वह गरीब बच्चों को पढ़ाता और उनकी कहानियाँ सुनता।
एक बच्चा बोला—"भैया, मैं बड़ा होकर डॉक्टर बनूँगा।"
दूसरा बोला—"मैं पुलिस बनूँगा ताकि चोरों को पकड़ सकूँ।"
अमन ने सोचा—ये बच्चे भी सपनों और जिम्मेदारियों के बीच विचलित हैं।
उसने डायरी में लिखा:
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विचलन ही जीवन है,
सपनों और यथार्थ का संगम।
जो इससे भागे,
वह खुद से भागे।
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11. पिता का परिवर्तन
धीरे-धीरे पिता ने देखा कि अमन की कहानियाँ पत्रिकाओं में छप रही हैं। एक दिन मोहल्ले का एक आदमी आया और बोला—
"आपका बेटा तो बड़ा लेखक बन रहा है। उसकी कहानी पढ़कर मेरी आँखें नम हो गईं।"
पिता ने पहली बार गर्व महसूस किया। उन्होंने अमन से कहा—
"शायद मैं गलत था। शायद शब्द भी रोटी बन सकते हैं।"
अमन की आँखों में आँसू आ गए।
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12. प्रेम की परीक्षा
राधिका को विदेश में रिसर्च का अवसर मिला। उसने अमन से पूछा—"क्या तुम चाहोगे कि मैं जाऊँ?"
अमन विचलित हो गया। वह उसे खोना नहीं चाहता था, लेकिन रोकना भी नहीं चाहता था।
उसने कहा—"जाओ, क्योंकि तुम्हारे सपने भी उतने ही ज़रूरी हैं जितने मेरे।"
राधिका मुस्कुराई—"तुम्हारा विचलन ही तुम्हारी ताक़त है।"
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13. आत्मस्वीकृति
अमन ने समझ लिया कि विचलन कोई कमजोरी नहीं, बल्कि आत्मस्वीकृति की प्रक्रिया है।
उसने एक लेख लिखा—"विचलित मनुष्य ही सृजनशील होता है।"
लेख छपा और खूब सराहा गया।
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14. अंतिम दृश्य
एक शाम अमन छत पर बैठा था। हवा में ठंडक थी। उसने आसमान की ओर देखा और सोचा—
"मैं अब भी विचलित हूँ, लेकिन यही विचलन मुझे जीवित रखता है। यही मुझे लिखने की प्रेरणा देता है। यही मुझे मनुष्य बनाता है।"
उसने डायरी में अंतिम पंक्तियाँ लिखीं:
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विचलित हूँ मैं,
पर यही मेरी पहचान है।
सपनों और यथार्थ के बीच
मैं ही वह पुल हूँ।
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