एक साल बाद
मैं गोवा में एक छोटे से क्लिनिक में काम करता था। मुंबई से दूर, अपनी पुरानी ज़िंदगी से दूर, उन यादों से दूर जो मुझे रात में जगाती थीं।
यहाँ कोई मुझे नहीं जानता था। मैं बस एक और डॉक्टर था, जो अपना काम करता था और शाम को समुद्र के किनारे बैठकर सूरज को डूबते देखता था।
ज़िंदगी सरल हो गई थी। उबाऊ। लेकिन सुरक्षित।
उस शाम भी मैं बीच पर बैठा था, लहरों की आवाज़ सुनते हुए, जब किसी ने मेरे बगल में आकर बैठा।
मैंने मुड़कर देखा।
एक औरत थी। सफेद कुर्ते में, बाल खुले, चेहरे पर धूप के चश्मे।
"सुंदर शाम है, है ना?" उसने कहा।
मैंने सिर हिलाया। "हाँ।"
"मैं यहाँ नई हूँ," उसने कहा। "अभी दो दिन पहले ही आई हूँ। आप यहाँ के रहने वाले हैं?"
"हाँ। करीब एक साल से।"
"अच्छी जगह है। शांत। जिंदगी शुरू करने के लिए परफेक्ट।"
कुछ था उसकी आवाज़ में। कुछ परिचित।
मैंने उसे ध्यान से देखा, लेकिन धूप के चश्मे की वजह से उसकी आँखें नहीं दिख रही थीं।
"आप यहाँ छुट्टियाँ मनाने आई हैं?" मैंने पूछा।
"कुछ वैसा ही। मैं... मैं अपनी पुरानी ज़िंदगी से भाग रही हूँ।" उसने हँसी, लेकिन वो हँसी खोखली लगी।
मेरे दिल की धड़कन तेज़ हो गई। "क्या नाम है आपका?"
वो एक पल के लिए रुकी। फिर बोली, "नव्या।"
नव्या। एक नया नाम। एक नई शुरुआत।
लेकिन मुझे पक्का था।
"धूप का चश्मा उतारोगी?" मैंने पूछा।
"क्यों?"
"बस। मुझे लोगों की आँखें देखना पसंद है। वो बहुत कुछ बता देती हैं।"
वो हिचकिचाई। फिर धीरे-धीरे उसने अपना चश्मा उतारा।
और मेरी साँस रुक गई।
वो आँखें। वही गहरी, रहस्यमय, दर्द से भरी आँखें।
मायरा की आँखें।
या मीरा की।
"तुम..." मेरी आवाज़ फँस गई।
"हाँ," उसने कहा, अब मुस्कुराते हुए। "मैं।"
"लेकिन... लेकिन तुम जेल में हो। उम्रकैद।"
"थी," उसने सुधारा। "छह महीने पहले मुझे रिहा कर दिया गया। अच्छे व्यवहार के लिए। और कुछ... कनेक्शन के लिए।"
मैं उठ खड़ा हुआ। "मुझसे दूर रहो। तुम मेरी ज़िंदगी में वापस नहीं आ सकती।"
"मैं तुम्हारी ज़िंदगी में वापस नहीं आई हूँ, आरव," उसने शांति से कहा। "मैं सिर्फ... मैं सिर्फ तुमसे एक आखिरी बात कहना चाहती थी।"
"मुझे कुछ नहीं सुनना।"
"लेकिन तुम्हें सुनना होगा। क्योंकि ये तुम्हारे बारे में है। तुम्हारी सुरक्षा के बारे में।"
मैं रुक गया। "क्या मतलब?"
उसने गहरी साँस ली। "आरव, जो मैंने तुम्हें बताया था, वो सब सच नहीं था। कोर्ट में भी नहीं, चिट्ठी में भी नहीं।"
"फिर से?" मैं हँसा, लेकिन वो हँसी कड़वी थी। "कितने सच हैं तुम्हारे पास?"
"सिर्फ एक। असली सच। जो मैं अब तक किसी को नहीं बता सकी।"
"तो बोलो।"
उसने समुद्र की ओर देखा, जहाँ सूरज अब डूबने वाला था।
"मायरा कभी नहीं मरी," उसने कहा। "न बीस साल पहले, न अभी।"
"तुम फिर से वही बातें—"
"सुनो!" उसने मुझे बीच में रोका। "मैं सच बता रही हूँ। मायरा और मीरा दोनों ज़िंदा हैं। हमेशा से थीं। वो सीढ़ियों से गिरने वाली कहानी - झूठ। वो जुड़वाँ बहनें होने की कहानी - आधा सच।"
"तो पूरा सच क्या है?"
उसने अपना हाथ बढ़ाया और अपनी कलाई पर की एक छोटी सी गुड़िया का टैटू दिखाया। बिल्कुल वैसी ही जैसी उस पुरानी तस्वीर में बच्ची के हाथ में थी।
"मायरा और मीरा दोनों मैं हूँ," उसने कहा। "लेकिन सिर्फ एक नाम असली है। मीरा। मायरा एक व्यक्तित्व था जो मैंने बनाया, अपने दर्द से बचने के लिए। जब मैं छोटी थी, तो मेरे साथ बुरा हुआ। बहुत बुरा। और बचने के लिए, मैंने मायरा को बनाया - एक परफेक्ट, खुश, निडर लड़की।"
मैं सुन्न था।
"लेकिन ये कोई साधारण डिसोसिएटिव डिसऑर्डर नहीं था। क्योंकि मैंने मायरा को इतना असली बना दिया कि वो मुझसे अलग हो गई। उसकी अपनी यादें थीं, अपनी योजनाएँ, अपने इरादे। और जब विक्रांत से शादी हुई, तो मायरा ने कंट्रोल ले लिया।"
"और फिर मैं तुमसे मिली। मायरा के रूप में। लेकिन तुमसे प्यार... वो असली था, आरव। पहली बार, मायरा और मीरा दोनों एक बात पर सहमत थे।"
"तो विक्रांत की हत्या?" मैंने पूछा।
"वो योजना मायरा ने बनाई थी। लेकिन अंजाम मीरा ने दिया। क्योंकि उस रात, जब तुम और मैं उस घर में थे, मायरा गायब हो गई। और मुझे अकेले फैसला लेना पड़ा।"
"तो तुमने मुझे इस्तेमाल किया।"
"हाँ। लेकिन सिर्फ इसलिए क्योंकि मुझे यकीन नहीं था कि मैं अकेली कर पाऊँगी। मुझे... मुझे तुम्हारी ज़रूरत थी।"
मैं बैठ गया, सिर हाथों में लेकर। "और अब? अब तुम क्यों यहाँ हो?"
"क्योंकि खतरा अभी खत्म नहीं हुआ है।"
मैंने सिर उठाया। "क्या खतरा?"
"विक्रांत का भाई। रोहन सिन्हा। वो तुम्हें ढूँढ रहा है। उसे शक है कि विक्रांत की हत्या के पीछे सिर्फ मैं नहीं थी। वो तुम्हें मारना चाहता है। बदला लेने के लिए।"
मेरा खून ठंडा पड़ गया। "लेकिन... लेकिन कोर्ट ने मुझे बेगुनाह करार दिया।"
"रोहन को कोर्ट की परवाह नहीं है। उसे सिर्फ बदले की परवाह है। और उसके पास साधन हैं, कनेक्शन हैं।"
"तो मैं क्या करूँ?"
मीरा ने मेरी ओर देखा, उसकी आँखों में दृढ़ संकल्प था।
"तुम मेरे साथ आओ। मैं तुम्हें बचा सकती हूँ। मैं जानती हूँ कैसे रोहन से निपटना है।"
"क्यों? तुम मेरी मदद क्यों करोगी?"
"क्योंकि मैं तुमसे प्यार करती हूँ," उसने सीधे कहा। "शायद ये मायरा का प्यार है, शायद मीरा का। शायद दोनों का। लेकिन ये सच है।"
मैंने उसकी आँखों में देखा। क्या मैं उस पर विश्वास कर सकता था? एक औरत जिसने मुझे इतनी बार धोखा दिया था?
लेकिन क्या मेरे पास कोई और विकल्प था?
"ठीक है," मैंने कहा। "लेकिन एक शर्त पर।"
"कौन सी?"
"अब से कोई झूठ नहीं। कोई राज़ नहीं। पूरा सच।"
उसने मुस्कुराते हुए सिर हिलाया। "वादा।"
हम दोनों उठे और बीच से चल पड़े। सूरज अब पूरी तरह डूब चुका था, और आसमान में तारे दिखने लगे थे।
मैं नहीं जानता था कि आगे क्या होगा। मैं नहीं जानता था कि मीरा पर विश्वास करना सही था या गलत।
लेकिन मैं जानता था कि मेरी कहानी अभी खत्म नहीं हुई थी।
ये बस एक नया अध्याय था।
और शायद, बस शायद, इस बार अंत खुश होगा।
***
तीन महीने बाद
मैं और मीरा थाईलैंड में एक छोटे से द्वीप पर थे। दुनिया से कटे हुए, रोहन की पहुँच से दूर।
या कम से कम हमें ऐसा लगता था।
एक रात, जब मैं सो रहा था, मुझे एक आवाज़ ने जगाया।
मीरा बाहर बालकनी में खड़ी थी, फोन पर किसी से बात कर रही थी।
"हाँ, सब प्लान के मुताबिक है," वो कह रही थी। "वो मुझ पर पूरी तरह से विश्वास करने लगा है।"
मेरा दिल डूब गया।
"नहीं, उसे कुछ शक नहीं है। बस एक महीना और। फिर हम आगे बढ़ सकते हैं।"
मैं उठ खड़ा हुआ और बालकनी में गया।
मीरा ने मुझे देखा और फोन काट दिया।
"तुम किससे बात कर रही थी?" मैंने पूछा, मेरी आवाज़ काँप रही थी।
"आरव, मैं—"
"मत बोलो। मैंने सब सुन लिया। तुम... तुमने फिर से मुझे बेवकूफ बनाया।"
उसकी आँखों में आँसू आ गए। "नहीं, आरव। ये वो नहीं है जो तुम सोच रहे हो।"
"तो क्या है? क्या तुम रोहन के साथ मिल गई हो? क्या ये सब एक जाल था?"
"नहीं!" वो चीखी। "रोहन नहीं। वो... वो मेरा थेरेपिस्ट है। मैं उससे इलाज करवा रही हूँ। अपने डिसॉर्डर का।"
मैं रुक गया। "थेरेपिस्ट?"
"हाँ। मैं... मैं बदलना चाहती हूँ, आरव। मायरा और मीरा को एक साथ लाना चाहती हूँ। ताकि मैं तुम्हारे लिए सिर्फ एक इंसान बन सकूँ। एक सामान्य, सच्ची इंसान।"
"तो जो तुमने कहा 'सब प्लान के मुताबिक है' - उसका क्या मतलब था?"
"इलाज प्लान के मुताबिक है। मैं बेहतर हो रही हूँ, आरव। और तुम... तुम मुझे ठीक होने में मदद कर रहे हो।"
मैं नहीं जानता था कि मुझे उस पर विश्वास करना चाहिए या नहीं। लेकिन जब मैंने उसकी आँखों में देखा, तो मुझे कुछ दिखा जो मैंने पहले कभी नहीं देखा था।
ईमानदारी।
शायद ये सच था। शायद वो वाकई बदल रही थी।
या शायद ये एक और धोखा था।
लेकिन मैंने फैसला किया कि मैं एक और मौका दूँगा।
आखिरी मौका।
"ठीक है," मैंने कहा। "लेकिन अगर तुम फिर से झूठ बोली—"
"नहीं बोलूँगी," उसने मेरे हाथ पकड़ते हुए कहा। "वादा।"
हम दोनों बालकनी में खड़े रहे, समुद्र की लहरों की आवाज़ सुनते हुए, तारों को देखते हुए।
और पहली बार, मुझे लगा कि शायद हम दोनों के लिए एक खुशहाल अंत संभव है।
शायद।