Khamoshi ka Ikraar - 2 in Hindi Thriller by Dragon Heart books and stories PDF | खामोशी का इकरार - CH-2 - कैद

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खामोशी का इकरार - CH-2 - कैद

छह महीने बाद

हरिद्वार सेंट्रल जेल की दीवारें सफेद हैं, लेकिन मुझे हमेशा लगता है कि वो खून के छींटों से सनी हुई हैं। शायद ये मेरे दिमाग का खेल है। या शायद ये सच है, और इन दीवारों ने इतने अपराधियों को देखा है कि उनकी यादें यहाँ चिपक गई हैं।

मैं यहाँ पिछले छह महीने से हूँ। हत्या के आरोप में। विक्रांत सिन्हा की हत्या।

मायरा गायब है। उस रात जब पुलिस आई थी, वो धुएँ की तरह हवा में घुल गई थी। मैं वहाँ खड़ा था, उसकी दी हुई डायरी हाथ में, और कोई सफाई नहीं थी। सिर्फ सच - एक ऐसा सच जो किसी को यकीन नहीं आया।

मेरे वकील, अदिति सेठ, एक तेज़ और समझदार महिला है। उसने मेरे केस को हाथ में लिया है, हालाँकि सबूत मेरे खिलाफ हैं। बंदूक पर मेरे फिंगरप्रिंट्स, विक्रांत के घर के पास से मेरी कार के टायर के निशान, और सबसे बुरा - मेरा और मायरा का अफेयर, जो किसी तरह मीडिया तक पहुँच गया।

"तुम्हें मायरा के बारे में सच बताना होगा," अदिति ने कल मुझसे कहा था, जेल की मुलाकात के कमरे में बैठकर। "वो डायरी, उसकी योजना, सब कुछ।"

"कोई यकीन नहीं करेगा," मैंने जवाब दिया। "वो सोचेंगे मैं एक डेस्परेट मुजरिम हूँ जो अपने अपराध से बचने के लिए एक गायब औरत पर इलज़ाम लगा रहा हूँ।"

"तो हम क्या करें? हार मान लें?"

मैंने खिड़की से बाहर देखा, जहाँ जेल का मैदान था। कैदी बाहर घूम रहे थे, कुछ बात कर रहे थे, कुछ अकेले बैठे थे।

"नहीं," मैंने कहा। "हम मायरा को ढूँढेंगे। और सच सामने लाएँगे।"

लेकिन मायरा को ढूँढना आसान नहीं था। पुलिस ने उसे खोजने की कोशिश की, लेकिन वो हवा हो गई थी। कोई निशान नहीं, कोई सुराग नहीं।

जब तक कि आज सुबह कुछ हुआ।

मुझे एक चिट्ठी मिली। जेल की मेल सिस्टम के ज़रिए। कोई रिटर्न एड्रेस नहीं था, सिर्फ मेरा नाम लिफाफे पर लिखा था।

अंदर एक तस्वीर थी।

मायरा की। लेकिन वो अकेली नहीं थी। उसके साथ एक आदमी था, जिसका चेहरा धुंधला था। वो किसी बीच पर खड़े थे, हाथ में हाथ डाले, मुस्कुराते हुए।

तस्वीर के पीछे एक लाइन लिखी थी, मायरा की हैंडराइटिंग में:

"तुमने सही चुनाव किया, आरव। लेकिन खेल अभी खत्म नहीं हुआ।"

मेरे हाथ काँपने लगे। वो कहाँ थी? वो क्या चाहती थी?

और सबसे ज़रूरी सवाल - वो मर्द कौन था?

मैंने तस्वीर को फाड़ने का सोचा, लेकिन नहीं किया। ये एक सबूत था। एक सुराग।

मैंने तुरंत अदिति को बुलवाया।

"ये देखो," मैंने उसे तस्वीर दिखाई। "मायरा ज़िंदा है। और वो कहीं बाहर है।"

अदिति ने तस्वीर को ध्यान से देखा। "ये कहाँ की है?"

"पता नहीं। लेकिन इस बीच को पहचाना जा सकता है। देखो, पीछे वो रॉक फॉर्मेशन। ये गोवा हो सकता है। या केरला।"

"मैं इसे एक प्राइवेट इन्वेस्टिगेटर को दूँगी," अदिति ने कहा। "शायद वो इस जगह को ट्रेस कर पाए।"

लेकिन मुझे पता था कि मायरा इतनी आसानी से नहीं मिलेगी। वो बहुत चालाक थी। हर कदम सोच-समझकर उठाती थी।

फिर मुझे वो डायरी याद आई। वो डायरी जो उसने मुझे दी थी उस रात। पुलिस ने उसे सबूत के तौर पर ज़ब्त कर लिया था, लेकिन मैंने कुछ पन्ने पढ़े थे।

उसमें उसने अपनी पूरी योजना लिखी थी। कैसे उसने मुझे चुना, कैसे उसने मुझे अपने जाल में फँसाया, कैसे उसने विक्रांत को मरवाने का प्लान बनाया।

लेकिन एक चीज़ अधूरी थी। आखिरी पन्ना। वो फटा हुआ था, जैसे किसी ने जान-बूझकर उसे निकाल दिया हो।

उस पन्ने पर क्या लिखा था?

शाम को, जब मैं अपनी सेल में वापस आया, तो मुझे एक और सरप्राइज़ मिला।

मेरा सेलमेट, राकेश, एक चोर जो मुझसे पहले यहाँ था, मेरा इंतज़ार कर रहा था। लेकिन उसकी आँखों में डर था।

"क्या हुआ?" मैंने पूछा।

"कोई... कोई आया था," उसने फुसफुसाया। "एक औरत। उसने मुझसे पूछा तुम्हारे बारे में।"

मेरा दिल रुक गया। "कैसी दिखती थी वो?"

"लंबे काले बाल, काली साड़ी, खूबसूरत लेकिन... डरावनी भी। उसकी आँखें... मैंने कभी ऐसी आँखें नहीं देखीं।"

मायरा।

"उसने क्या कहा?"

"उसने पूछा कि तुम कैसे हो, तुम किससे बात करते हो, क्या तुमने उसका नाम लिया। मैंने कहा मैं कुछ नहीं जानता। फिर उसने ये दिया।"

राकेश ने अपनी जेब से एक छोटा कागज़ निकाला और मुझे दिया।

मैंने उसे खोला। उसमें सिर्फ एक लाइन लिखी थी:

"अगली मुलाकात जल्द होगी। तब तक, याद रखना - हर दीवार के दो रुख होते हैं।"

मुझे समझ नहीं आया। हर दीवार के दो रुख? इसका क्या मतलब था?

फिर मैंने अपनी सेल की दीवारों को देखा। वो सादी, सफेद दीवारें।

लेकिन एक दीवार पर, ऊपर की तरफ, कुछ लिखा था। बहुत हल्का, जैसे किसी ने पेंसिल से बहुत धीरे से लिखा हो।

मैं कुर्सी पर चढ़ा और पास से देखा।

वहाँ एक एड्रेस लिखा था:

"104, महावीर नगर, पुणे। बेसमेंट में देखना।"

मेरे दिमाग में सवालों का तूफान आया। ये एड्रेस किसका था? वहाँ क्या था? और मायरा ने ये इतने पेचीदे तरीके से क्यों भेजा?

फिर मुझे एहसास हुआ - वो नहीं चाहती थी कि कोई और ये देखे। ये सिर्फ मेरे लिए था। एक राज़, जो सिर्फ मैं जान सकता था।

लेकिन मैं जेल में था। मैं वहाँ नहीं जा सकता था।

या मैं जा सकता था?

अगले दिन, मैंने अदिति को वो एड्रेस दिया।

"मुझे नहीं पता ये क्या है," मैंने कहा, "लेकिन मुझे लग रहा है कि ये ज़रूरी है। तुम वहाँ जा सकती हो?"

अदिति ने मुझे शक भरी नज़रों से देखा। "आरव, ये तुम्हें कैसे मिला?"

"तुम्हें मुझ पर भरोसा करना होगा," मैंने कहा। "प्लीज़।"

उसने सोचा, फिर सिर हिलाया। "ठीक है। मैं कल पुणे जाऊँगी।"

लेकिन अदिति पुणे नहीं पहुँच पाई।

अगली सुबह, मुझे खबर मिली कि उसकी कार का एक्सीडेंट हो गया। वो बच गई, लेकिन गंभीर रूप से घायल थी। अस्पताल में थी।

और उसकी कार में जो फाइलें थीं - मेरे केस की सारी फाइलें - वो गायब थीं।

अब मुझे यकीन हो गया।

मायरा ने ये किया था। या उसने किसी से करवाया था।

वो मुझे एक संदेश दे रही थी - अगर मैं उसके खेल में शामिल होना चाहता हूँ, तो मुझे कीमत चुकानी होगी।

लेकिन मैंने हार नहीं मानी। मैंने एक और तरीका ढूँढा।

जेल में एक गार्ड था, सुरेश। वो मुझसे अच्छा व्यवहार करता था क्योंकि मैंने एक बार उसकी बेटी को फ्री काउंसलिंग दी थी।

मैंने उससे मदद माँगी।

"सुरेश भाई," मैंने कहा, "मुझे एक छोटी सी मदद चाहिए। बस एक एड्रेस चेक करवाना है। कोई गैरकानूनी काम नहीं।"

सुरेश ने हिचकिचाते हुए सिर हिलाया। "आरव साहब, मैं जेल की नौकरी नहीं गँवा सकता।"

"मैं जानता हूँ। लेकिन ये मेरी ज़िंदगी और मौत का सवाल है। प्लीज़।"

आखिरकार, उसने मान लिया।

दो दिन बाद, वो मेरे पास आया, उसके चेहरे पर घबराहट थी।

"साहब, मैं वहाँ गया था। उस एड्रेस पर।"

"और? क्या मिला?"

"कुछ नहीं। घर खाली था। लेकिन... बेसमेंट में एक अलमारी थी। उसमें..."

"क्या था?"

सुरेश ने अपनी जेब से कुछ निकाला और मेरे हाथ में रखा।

एक पुरानी तस्वीर। काले-सफेद।

तस्वीर में एक छोटी बच्ची थी, शायद सात-आठ साल की। उसके हाथ में एक गुड़िया थी। लेकिन सबसे डरावनी बात ये थी कि उसकी आँखें - बिल्कुल वैसी ही जैसी मायरा की थीं।

तस्वीर के पीछे एक नाम लिखा था:

"मीरा सिन्हा। 1995।"

मीरा? मायरा नहीं?

"और कुछ?" मैंने पूछा, मेरा गला सूख रहा था।

"हाँ," सुरेश ने कहा। "एक डायरी भी थी। बहुत पुरानी। लेकिन मैं उसे नहीं ला सका। पुलिस वहाँ पहुँच गई। किसी ने उन्हें टिप दी थी।"

"डायरी में क्या लिखा था? तुमने पढ़ा?"

"बस एक पन्ना। उसमें लिखा था..."

सुरेश रुका, जैसे उसे बोलने में डर लग रहा हो।

"क्या लिखा था?" मैंने ज़ोर देकर पूछा।

"उसमें लिखा था - 'आज मैंने अपनी बहन को मारा। अब मैं वो बन जाऊँगी।'"

मेरा खून ठंडा पड़ गया।

मायरा की एक बहन थी? और उसने उसे मारा?

या... या मायरा खुद नहीं मरी थी?

क्या मीरा ने मायरा को मारा था और उसकी जगह ले ली थी?

या इससे भी ज़्यादा पेचीदा था सच?

मेरे दिमाग में हज़ार सवाल घूम रहे थे। लेकिन एक बात साफ थी।

मैं जिस औरत को जानता था, वो शायद कभी अस्तित्व में थी ही नहीं।

और असली सच... असली सच मुझे अभी भी नहीं पता था।


***

उस रात, मुझे नींद नहीं आई। मैं तस्वीर को देखता रहा, उस छोटी बच्ची को, जो शायद मायरा थी, या मीरा थी, या दोनों थीं।

तभी मुझे याद आया - मायरा ने एक बार मुझसे कहा था कि उसका कोई भाई-बहन नहीं है। वो अकेली संतान थी।

तो वो झूठ बोली थी। फिर से।

लेकिन क्यों?

और इस सबका विक्रांत की हत्या से क्या लेना-देना था?

सुबह होते ही, मुझे एक और झटका लगा।

मेरे ट्रायल की तारीख आ गई थी। अगले हफ्ते।

और अदिति अब भी अस्पताल में थी, होश में आने के लिए संघर्ष कर रही थी।

मुझे एक नया वकील मिला - राजीव खन्ना। अनुभवी, लेकिन मेरे केस के बारे में कुछ नहीं जानते थे।

"मैं पूरी कोशिश करूँगा," उन्होंने कहा, "लेकिन सबूत आपके खिलाफ हैं। अगर आप प्ली बार्गेन कर लें, तो शायद सज़ा कम हो जाए।"

"नहीं," मैंने कहा। "मैं बेगुनाह हूँ। और मैं ये साबित करूँगा।"

लेकिन कैसे? मेरे पास कोई सबूत नहीं था। कोई गवाह नहीं था। सिर्फ एक पुरानी तस्वीर और एक गुमशुदा औरत की कहानी।

ट्रायल शुरू हुआ। कोर्टरूम भरा हुआ था - मीडिया, जनता, सब वहाँ थे। सबको ये "डॉक्टर और उनकी खूनी प्रेमिका" की कहानी में दिलचस्पी थी।

प्रोसिक्यूशन का केस मज़बूत था। उन्होंने बंदूक पर मेरे फिंगरप्रिंट्स दिखाए, मेरी कार के निशान, और सबसे बुरा - CCTV फुटेज, जिसमें मैं उस रात विक्रांत के घर के पास दिख रहा था।

मुझे याद नहीं था कि मैं वहाँ गया था। बिल्कुल भी नहीं।

लेकिन फुटेज झूठ नहीं बोलती।

राजीव ने अपनी पूरी कोशिश की। उन्होंने तर्क दिया कि मैं ड्रग के प्रभाव में था, कि मुझे बरगलाया गया था। लेकिन जज को मनाना आसान नहीं था।

फिर, ट्रायल के तीसरे दिन, कुछ हुआ जिसने सब कुछ बदल दिया।

एक गवाह आया। एक औरत।

वो काली साड़ी में थी, घूँघट से चेहरा ढका हुआ।

जज ने उससे पूछा, "आपका नाम?"

"मीरा सिन्हा," उसने कहा।

कोर्टरूम में सन्नाटा छा गया।

मैं अपनी जगह से उठा खड़ा हुआ। "ये... ये असंभव है!"

"मिस्टर मल्होत्रा, बैठ जाइए," जज ने कड़क आवाज़ में कहा।

मीरा ने अपना घूँघट हटाया।

और मेरे होश उड़ गए।

वो मायरा नहीं थी। लेकिन उससे बिल्कुल मिलती-जुलती थी। जैसे उसकी जुड़वाँ हो।

"मैं मायरा सिन्हा की बहन हूँ," उसने कहा। "और मैं यहाँ सच बताने आई हूँ।"