शीर्षक: वल्चर – अँधेरे की उड़ान
भाग 3: “राख से उठता शहर”
[दृश्य 1 – युद्ध के बाद की सुबह]
जली हुई इमारतें, टूटी सड़कें, धुएँ के बादल। दमकल की गाड़ियाँ अभी भी पानी छिड़क रही हैं। लोग मलबे में अपने अपनों को ढूँढ रहे हैं। अर्जुन एक ऊँची छत पर खड़ा शहर को देख रहा है। उसके पंख थके हुए सिमटे हैं।
अर्जुन (स्वगत):
“नरकवीर गिर गया… पर यह शहर अब भी ज़ख़्मी है।
शत्रु को हराना आसान है… विनाश को भरना कठिन।”
नीचे एक बच्चा जली हुई दुकान के सामने रो रहा है। अर्जुन की आँखें नम हो जाती हैं।
[दृश्य 2 – शून्य का जन्म]
अंधेरी गली में टूटे दर्पणों के बीच एक काला धुआँ इकट्ठा होता है। धुएँ से एक आकृति उभरती है—शून्यक। उसकी देह धुएँ और छायाओं से बनी है, आँखों में नील आग।
शून्यक (मंद, ठंडा स्वर):
“नरकवीर हार गया… पर भय नहीं मरा।
भय अब मेरा शरीर है।”
वह अपना हाथ फैलाता है। गली की छायाएँ उसके भीतर समा जाती हैं।
[दृश्य 3 – चुनौती का संदेश]
शहर की बिजली अचानक गुल हो जाती है। विशाल स्क्रीन पर धुएँ से बना चेहरा उभरता है।
शून्यक (घोषणा):
“रक्तपंख! तूने विनाश को हराया…
अब भय से लड़।
आज रात, परित्यक्त पुल पर।”
लोगों में दहशत फैल जाती है। अर्जुन छत पर मुट्ठियाँ भींच लेता है।
अर्जुन:
“डर से जन्मा राक्षस…
डर से ही मिटेगा।”
[दृश्य 4 – पुल पर आमना-सामना]
टूटा हुआ पुल। नीचे उफनती नदी। चारों ओर अँधेरा और धुआँ। अर्जुन ऊपर से उतरता है। सामने शून्यक धुएँ की लहरों में खड़ा है।
शून्यक:
“तेरे पंख रक्त से बने हैं…
मेरी देह भय से।
देखें किसका आकाश भारी है।”
अर्जुन:
“भय को उड़ान नहीं मिलती…
वह बस दूसरों की पीठ पर बैठता है।”
[दृश्य 5 – आरंभिक टकराव]
शून्यक हाथ उठाता है। छायाएँ भाले की तरह अर्जुन की ओर दौड़ती हैं। अर्जुन पंख फैलाकर ढाल बनाता है। छायाएँ पंखों से टकराकर चूर हो जाती हैं। अर्जुन गोता लगाकर नीचे से वार करता है। शून्यक धुएँ में बिखरकर पीछे हटता है।
शून्यक (हँसता हुआ):
“मैं रूप बदलता हूँ…
तू थकता है।”
[दृश्य 6 – भय का आक्रमण]
शून्यक शहर के दृश्य रच देता है—जली झुग्गियाँ, रोती माँ, कूड़े का मैदान। अर्जुन क्षण भर के लिए ठिठक जाता है।
शून्यक (कान में फुसफुसाते हुए):
“तेरी जड़ें कूड़े में हैं…
तू आकाश का नहीं।”
अर्जुन (दाँत भींचकर):
“मेरी जड़ें दर्द में हैं…
और दर्द से ही पंख उगते हैं!”
वह भ्रम तोड़कर तेज़ी से ऊपर उड़ता है।
[दृश्य 7 – आकाशीय महायुद्ध]
अर्जुन बादलों को चीरते हुए गोता लगाता है। हवा की धाराएँ उसके साथ घूमती हैं। वह शून्यक पर बिजली-सी टक्कर मारता है। पुल काँप उठता है। शून्यक धुएँ के भंवर में बदलकर चारों ओर फैल जाता है और फिर पीछे से वार करता है। अर्जुन घूमकर उसकी धारा को चीर देता है। टकराव से आकाश में गर्जना गूँजती है।
अर्जुन:
“आज तू छाया नहीं रहेगा…
आज तू ठोस होकर गिरेगा!”
[दृश्य 8 – निर्णायक प्रहार]
अर्जुन पुल के टूटे केबल पकड़कर हवा में वृत्त बनाता है। वह वेग के साथ शून्यक के केंद्र पर प्रहार करता है। धुआँ सिमटकर ठोस रूप लेता है। अर्जुन दोनों पंखों से एक साथ प्रहार करता है। भय की देह में दरारें पड़ती हैं।
शून्यक (चीखते हुए):
“भय अमर है!”
अर्जुन:
“भय अमर नहीं…
हिम्मत से बड़ा कोई हथियार नहीं!”
वह अंतिम प्रहार करता है। धुआँ बिखरकर नदी में विलीन हो जाता है। पुल पर शांति छा जाती है।
[दृश्य 9 – बाद की शांति]
बिजली लौट आती है। लोग पुल के पास इकट्ठा होते हैं। दूर से दमकल की रोशनी चमकती है। अर्जुन पुल की रेलिंग पर बैठकर साँसें सम्हालता है।
अर्जुन (स्वगत):
“नरकवीर गिरा… भय भी बिखरा…
पर हर दिन कोई नया अँधेरा जन्म लेता है।”
[दृश्य 10 – विदाई और व्रत]
अर्जुन लोगों की ओर देखता है। कोई उसे पहचान नहीं पाता, पर आँखों में राहत है।
अर्जुन (धीमे स्वर में):
“जब तक आकाश है…
मेरी उड़ान रहेगी।”
वह पंख फैलाता है और रात के आकाश में विलीन हो जाता है।