शीर्षक: वल्चर – अँधेरे की उड़ान
विशेष एपिसोड: “रक्तपंख बनाम नरकवीर”
[दृश्य 1 – महानगर का बाहरी इलाका, संध्या]
लाल सूरज डूब रहा है। धुएँ से भरी हवा में सायरनों की आवाज़ गूँजती है। पुल के नीचे झुग्गियाँ हैं। अर्जुन ऊँची इमारत की छत पर खड़ा है। उसकी पीठ पर काले, अस्थि-जैसे पंख सिमटे हुए हैं। नीचे भीड़ में अफ़रा-तफ़री है।
अर्जुन (स्वगत):
“जिस शहर ने मुझे कूड़े की तरह फेंका… आज उसी शहर की साँसें मेरी पीठ पर टिकी हैं।”
दूर क्षितिज पर एक कारख़ाने की चिमनियों से काला धुआँ उठता है।
[दृश्य 2 – कारख़ाना परिसर, रात्रि]
लोहे के विशाल द्वार खुलते हैं। अंदर लाल रोशनी में डूबा प्रयोगशाला-सा कक्ष। बीचोंबीच एक लंबा-चौड़ा पुरुष—नरकवीर—भारी कवच पहने खड़ा है। उसकी त्वचा धातु जैसी कठोर, आँखें दहकते अंगारों-सी।
नरकवीर:
“आज रात शहर मेरी शक्ति की परीक्षा देगा। जो बचेगा, वही शासन करेगा।”
वह ज़मीन पर मुक्का मारता है। धरती काँप उठती है। दीवारों से चिंगारियाँ गिरती हैं।
[दृश्य 3 – नगर का चौक, रात्रि]
भीड़ में भगदड़ मचती है। नरकवीर सड़क पर उतरता है। बस को एक हाथ से उठाकर किनारे फेंक देता है। वाहन टकराकर जल उठता है। लोग चीखते हुए भागते हैं।
नरकवीर (गरजते हुए):
“डरो! तुम्हारा रक्षक आज तुम्हें बचाने नहीं आएगा।”
आकाश में तेज़ हवा बहती है। ऊपर से परों की फड़फड़ाहट सुनाई देती है।
[दृश्य 4 – आकाश से अवतरण]
अर्जुन ऊँचाई से उतरता है। पंख फैलाकर सड़क पर उतरते ही धूल का गुबार उठता है। लोग उसे देखकर ठिठक जाते हैं।
अर्जुन:
“रक्षक नहीं हूँ… पर आज अत्याचार रुकेगा।”
नरकवीर हँसता है और आगे बढ़ता है।
नरकवीर:
“तू पक्षी है या भ्रम? तेरे पंख मेरी मुट्ठी में टूटेंगे।”
[दृश्य 5 – प्रथम टकराव]
नरकवीर बिजली-सी गति से घूँसा चलाता है। अर्जुन पंखों से ढाल बनाकर वार रोकता है। धातु और अस्थि टकराते हैं। चिंगारियाँ उड़ती हैं। अर्जुन पीछे खिसकता है।
अर्जुन (दाँत भींचकर):
“तेरी शक्ति भारी है… पर मेरी उड़ान भारी पड़ेगी।”
अर्जुन उछलकर ऊपर उठता है, आकाश से नीचे गोता लगाता है। उसका वार नरकवीर की छाती पर पड़ता है। कवच में दरार पड़ती है, पर नरकवीर अडिग रहता है।
नरकवीर (हँसते हुए):
“बस इतना?”
[दृश्य 6 – विनाश का नृत्य]
नरकवीर सड़क उखाड़कर अर्जुन पर फेंकता है। अर्जुन हवा में घूमकर बच निकलता है। पत्थर भीड़ की ओर उड़ते हैं। अर्जुन पंख फैलाकर पत्थरों को मोड़ देता है, टुकड़े बिखर जाते हैं।
अर्जुन:
“निर्दोषों को ढाल मत बना!”
नरकवीर उछलकर इमारत पर चढ़ता है और ऊपर से ज़मीन पर प्रहार करता है। लहरदार झटका फैलता है। अर्जुन उछलकर संतुलन साधता है, पर झटका उसे पीछे फेंक देता है। उसका कंधा दीवार से टकराता है, रक्त बहता है।
[दृश्य 7 – अतीत की छाया]
अर्जुन क्षण भर के लिए आँखें बंद करता है। कूड़े के ढेर, बदमाशों की मार, माँ की पुकार—सब स्मृतियाँ एक साथ उमड़ती हैं।
अर्जुन (स्वगत):
“मैं फिर गिरा… तो यह शहर गिरेगा।”
वह उठता है। उसकी आँखों में तीव्र चमक है।
[दृश्य 8 – आकाशीय आक्रमण]
अर्जुन तेज़ी से ऊपर उड़ता है, बादलों को चीरता हुआ। वह ऊँचाई से वृत्ताकार गति में घूमता है। हवा की धाराएँ उसके साथ सर्पिल बनाती हैं। वह वेग के साथ नीचे उतरता है। उसकी पंखों की धार नरकवीर के कवच पर पड़ती है। धातु फटती है। नरकवीर घुटनों पर आ जाता है।
नरकवीर (दहाड़ते हुए):
“मैं टूटूँगा नहीं!”
वह अपने भीतर संचित ऊर्जा मुक्त करता है। लाल तरंग चारों ओर फैलती है। अर्जुन हवा में ही झुलसता हुआ पीछे हटता है। उसकी साँसें भारी हो जाती हैं।
[दृश्य 9 – निकट युद्ध]
दोनों आमने-सामने आते हैं। नरकवीर की पकड़ अर्जुन के पंखों को जकड़ लेती है। धातु की उँगलियाँ अस्थि-जैसे पंखों में धँसती हैं। अर्जुन दर्द से कराहता है।
नरकवीर:
“उड़ान का अंत यहाँ है।”
अर्जुन अपनी चोंच-जैसी दृष्टि से नरकवीर की आँखों में झाँकता है।
अर्जुन:
“उड़ान नहीं… दिशा बदलती है।”
वह अपने शरीर को घुमाकर नरकवीर की पकड़ ढीली करता है और एड़ी से उसकी गर्दन पर प्रहार करता है। नरकवीर पीछे लड़खड़ाता है।
[दृश्य 10 – निर्णायक क्षण]
अर्जुन आसपास पड़े धातु के खंभे को पकड़कर हवा में घुमाता है। वह खंभा भाले की तरह नरकवीर के कवच में धँसता है। नरकवीर ज़मीन पर गिर पड़ता है। उसकी साँसें भारी हैं। आग और धुआँ चारों ओर फैल रहा है।
नरकवीर (कमज़ोर स्वर में):
“शहर… कमज़ोरों का है… तू कब तक बचाएगा?”
अर्जुन:
“जब तक साँस है… तब तक।”
अर्जुन पंख फैलाकर लोगों के सामने ढाल बनकर खड़ा हो जाता है। पीछे जलती हुई कारों की लपटें बुझने लगती हैं। दमकल की आवाज़ें पास आती हैं।
[दृश्य 11 – मौन के बाद]
भीड़ धीरे-धीरे बाहर निकलती है। बच्चों की रोने की आवाज़ें शांत होती हैं। अर्जुन नरकवीर को हथकड़ी जैसी धातु की रस्सी से बाँध देता है।
नरकवीर (धीमे से):
“अँधेरा लौटेगा।”
अर्जुन:
“लौटेगा… पर हर रात के बाद सुबह होती है।”
[दृश्य 12 – विदा]
पुलिस की गाड़ियाँ दूर से आती हैं। अर्जुन छत की ओर उड़ान भरता है। वह ऊँचाई से शहर को देखता है—धुआँ, रोशनी, लोग।
अर्जुन (स्वगत):
“मैं रक्षक नहीं बना… परिस्थितियों ने बना दिया।
आज एक अँधेरा गिरा है… कल कोई और उठेगा।”
वह रात के आकाश में विलीन हो जाता है।