गांव का नाम था सरसौली। नाम में मिठास थी, पर ज़मीन में जहर भरा था। बाहर से यह गांव शांत, हरा-भरा और संस्कारी लगता था, लेकिन भीतर से यह एक खोखला समाज था—जहां इंसान की कीमत उसकी जाति से तय होती थी, उसके कर्म से नहीं।सरसौली में मंदिर सबके लिए था, पर भगवान सबके नहीं। कुआं सबके सामने था, पर पानी सबका नहीं। स्कूल की घंटी सबके लिए बजती थी, पर सपने सबके लिए नहीं।इसी गांव में रहती थी सावित्री—एक दलित परिवार की बेटी। उसके पिता रामदीन चमड़े का काम करते थे, मां खेतों में मजदूरी। मिट्टी की झोपड़ी, फटी चादर, और पेट में हमेशा अधूरी भूख—यही उनकी दुनिया थी।सावित्री पढ़ना चाहती थी। किताबें उसके लिए काग़ज़ नहीं थीं, वे उसके लिए सांस थीं। वह जानती थी—अगर इस समाज से बाहर निकलना है, तो पढ़ाई ही एकमात्र रास्ता है।लेकिन सरसौली का समाज उसे पढ़ा-लिखा नहीं, चुप देखना चाहता था।स्कूल में सावित्री को आख़िरी बेंच पर बैठाया जाता। पानी पीने के लिए अलग गिलास। अगर गलती से वह ऊंची जाति की लड़की के पास बैठ जाती, तो टीचर की आवाज़ गूंजती— “अपनी औकात में रहो!”यह औकात शब्द नहीं था, यह सदियों का ज़हर था।एक दिन सावित्री ने स्कूल के हैंडपंप से पानी पी लिया। बस इतना ही। गांव में भूचाल आ गया। पंचायत बैठी। फैसले सुनाए गए— “दलित लड़की ने नियम तोड़ा है। इसके पिता माफ़ी मांगेंगे।”रामदीन झुके। आंखों में अपमान था, लेकिन बेटी की पढ़ाई बचाने के लिए वह झुक गए। समाज जीत गया, इंसान हार गया।गांव का मुखिया हरिचरण ठाकुर इस खोखले समाज का सबसे मजबूत खंभा था। बाहर से धर्म और मर्यादा की बातें, भीतर से सत्ता और अत्याचार। उसके लिए जाति व्यवस्था भगवान की बनाई हुई थी—क्योंकि वही उसे ताकत देती थी।जब सावित्री आठवीं में आई, तो उसने सवाल पूछने शुरू किए— “अगर हम सब इंसान हैं, तो छूआछूत क्यों?” “भगवान सबको बराबर क्यों नहीं बनाता?”सवाल समाज को नहीं, सत्ता को डराते हैं।एक दिन खेत से लौटते समय सावित्री के साथ बदसलूकी हुई। गांव के ही कुछ ऊंची जाति के लड़कों ने। वह रोती हुई घर पहुंची। मां चुप रही। पिता ने दीवार की तरफ देखा।क्योंकि इस समाज में इज्जत और न्याय गरीब के लिए नहीं होते।पुलिस थाने गए तो उल्टा सवाल— “लड़की ही कुछ कर रही होगी।”सावित्री उस दिन समझ गई—यह समाज सिर्फ खोखला नहीं, निर्दयी भी है।लेकिन उसी रात उसने फैसला किया—अब वह चुप नहीं रहेगी।उसने पढ़ाई और तेज कर दी। खेतों में काम, रात में किताबें। दिया जलता, आंखें जागतीं। मां डरती थी— “बेटी, ज्यादा मत पढ़, समाज मार डालेगा।”सावित्री मुस्कुराई— “मां, यह समाज रोज मारता है। अब मैं उसे जवाब दूंगी।”समय बदला। सावित्री शहर गई। कॉलेज पहुंची। वहां भी भेदभाव था, लेकिन खुला नहीं, छिपा हुआ। वहां उसने संविधान पढ़ा। बाबा साहब अंबेडकर को जाना। पहली बार उसे लगा—वह अकेली नहीं है।सालों बाद जब सावित्री गांव लौटी, तो वह सिर्फ बेटी नहीं थी—वह एक आवाज़ थी। उसने गांव में स्कूल खोला। बच्चों को बराबरी सिखाई। पंचायत से सवाल पूछे। कानून की बात की।हरिचरण ठाकुर बौखला गया। “यह लड़की समाज बिगाड़ रही है!”लेकिन समाज पहले ही सड़ा हुआ था।एक दिन गांव में प्रशासन आया। जांच हुई। वर्षों के अत्याचार बाहर आए। कुएं, मंदिर, स्कूल—सबके नियम बदले।सरसौली पहली बार आईने में खुद को देख रहा था—और उसे अपनी सच्चाई से डर लग रहा था।सावित्री ने गांव छोड़ा नहीं, उसने गांव को छोड़ा नहीं जाने दिया।क्योंकि खोखला समाज तभी टूटता है,जब कोई डर के बावजूद खड़ा हो जाता है।
✦ संदेश ✦यह उपन्यास किसी एक गांव की कहानी नहीं,यह हर उस समाज का सच हैजो परंपरा के नाम पर इंसानियत को कुचलता है।जब तक सवाल जिंदा हैं,खोखला समाज एक दिन जरूर ढहेगा।