Manzile - 42 in Hindi Anything by Neeraj Sharma books and stories PDF | मंजिले - भाग 42

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मंजिले - भाग 42

                         ( 42 )
"पछचाताप कहानी " एक मर्मिक जज्बाती हो कर आपने लवारिस पन के गुमनाम दृश्य की यादगार डलिवरी बॉय की ही बेजोड़ तकसीम से निकली क़लम से सत्य माफिक है। किसी पे ये कहानी लगती हो तो इसमें कोई जिम्मेदारी नहीं ले रहा हूँ।
                            ये दुपहर का वक़्त था। सर्दी थी, महीना फ़रवरी की शुरवात कहिये... चावल  खा रहा मोहन रविवार को छत पे बैठा था। सोच रहा था जो पैकट उसके पास था वो दो दिन के बाद भी खोला नहीं गया था... " काहे किसी झमेले मे ना पड़ जाऊ.. " कलकते की पिछली भीड़ी सी स्ट्रीट मे उसका डवल फ्लोर घर जो किराये पर था। आज दो ही पैकट थे सुबह काम खत्म कर आया था। बालकोनी मे बैठा था.. शादीशुदा था, हाँ पत्नी से बनी नहीं तो वो उसे छोड़ गयी पर तलाक नहीं हुआ था। मोहन दास तीन भाईयों मे छोटा था.. सबके घर आबाद थे मोहन का नहीं... कारण जयादा पढ़े होने के कारण हर बात की नुक्ताचीनी से तंग आ कर पत्नी ने छोड़ दिया था।
                           पर अभी भी प्यार होगा तो मोहन की तरफ से राम राम ही था। वो भी कलकते मे ही रहती थी। सत्य ये था कि वो भी उससे  शयाद प्यार करती हो। कोई पक्का नहीं था। तीन साल से अलग थे। जयादा पढ़े होने का गर्व उसे हर जगह मार रहा था।
जिसे इतनी डिग्री मिली हो, और ज़ीरो डिग्री सरकार ने उम्र और स्वर्ण जात की कर दी  थी। गुस्सा तो फिर कही निकलना ही था या नहीं.... निकला भी कहा पता ही नहीं भरा हुआ रहता था... "फिर कया हुआ मोहन दास मर नहीं गया " यही कहता था।
                                   नसीबो की जंग मे घोड़ा कमबख्त भाग ही नहीं सका।रुक गया बस। कयो ये एक बेबसी थी। आज छुट्टी.... कुछ करू.... कया करू.... कया ना करू.... तभी वो दोनों की फोटो ले कर आँखो के सामने रख रहा था... ये फोटो थी, किसकी, दोनों की... कौन दोनों... पति पत्नी... । फिर उसने पैकट खोलने के लिए आपने को कहा ---- " किसी का होता तो वो लेकर चल ना जाता... पर। " इसी कारण उसने लिफाफा खोला उसमे था एक टाइप किया इंग्लिश मे लेटर... और एक कागज मे घुश मुश किये चद डालर वो इधर दस हज़ार की गिनती मे थे आये कहा से पढ़ना असभव था... मोहन दास काप गया... "ये कया गोल माल और पछतावा है। " मन मे चल रही लड़ाई इतनी जबरदस्त पूछो मत। पछतावा फिर चल पड़ा।
               मन डरा था। लेटर इंग्लिश मे पढ़ रहा था। उसमे ऐसी बात थी कि एक दम से काप गया था। जिसने कभी चींटी तक ना मारी हो, वो कोई बंदा मार गया.... डालर पक्का प्रमाण था.... नो कैसी विडबना थी।
                         " परेशान कर दिया " वो थोड़ा चकरा गया था। "किस सुजीत की बात चल रही थी " उसने मन मे सोचा.... फिर एकाएक उसको आपनी पत्नी याद आयी... इतना पैसा पता नहीं कयो और घर खाली.... पत्नी को याद किया, " आज फोन करू.... मन मे आया। चलो जैसे भी कैसे भी अकेला नहीं दो है हम। " उसका भी ख़ुशी मे हक़ है, बेशक पछतावा। दोनों का ही एक रूप.... एक ही लहजा। पवतावा करेंगे तो दोनों... खुश होंगे तो दोनों। यही सोच कर उसने स्विच वाला मोबाईल आज आपने ससुर को किया.... " गन्नी बोल रहा हूँ.... " तुम कौन हो " वो एक दम से बोला था। " मै आपका ससुर जी..... " तभी ख़ुशी मे बोला गन्नी राम। " ओह मेरा बेटा, मेरा जवाई ओह.... मोहन आज याद कर ही लिया " उच्ची इतनी बोला कि घर मे ख़ुशी का माहौल बन गया। बेटी को फोन पकड़ा दिया। " हांजी... आप ठीक है न... " यही भारतीय नारी की पहचान होती है। मोहन दास जैसे ख़ुशी के मारे रो पड़ा... खूब.... " निर्मला तुम आ जाओ... मै अकेले मर जाऊगा... " 
"---नहीं ऐसे नहीं कहते " निर्मला उछल पड़ी दर्द असीम दर्द से। " आज ही आती हूँ.... आप ठीक है "
"हाँ " निर्मला ख़ुशी और गमी मे बैठ गयी वही।
आप सब इंतज़ार करे। आगे आने वाली कहानी.... पछतावा की अगली कड़ी।
नीरज शर्मा 
शहकोट, जलधर।