Manzile - 41 in Hindi Anything by Neeraj Sharma books and stories PDF | मंजिले - भाग 41

Featured Books
Categories
Share

मंजिले - भाग 41

 किसी से लगती हो तो मै जिम्मेदारी नहीं लेता हूँ। ये कहानी किसी पर भी लग सकती है।
                           डलिवरी बॉय एक मोहन दास की जिंदगी के कुछ पड़ाव से निकल कर आयी हुई एक सभाधान पूरक एक छोटी कथा है।
सोच कर जिस बात पे रोना आता है, भूख जिस कहानी का मकसद हो पेट की भूख, वो सपने कैसे बड़े देख सकता है। बस बेरोजगार जो एक दम से अच्छा पढ़ा लिखा हो, लेकिन वजीफा सरकार से लेता हुआ फर्स्ट रहने वाला युवक डलिवरी बॉय की जॉब करे। और साथ वाले साथी जो मरके पास भी भीख मे होते हो, वो सुपर नौकरी मे लग गए।
                  इस मे उसकी किस्मत कहोगे, नहीं "आरक्षण बस और कया। "
किस्मत इसमें कहा से आ गयी। वो जरनल केटागिरी मे था। साथ वाले छोटी जात के। वो अच्छी पोस्ट पर, वो पंडित जाती का बेरोजगार......
" कया उनकी पोस्ट ही तीन या दस से आगे कभी गयी ही नहीं "  कयो स्वर्ण जाती बेशक नकली झाल वाला गोल्ड उसकी किस्मत कह के फाइल बंद कर दो। " सोचता था, हे रब्बा तूने मुझे जन्म भी स्वर्ण जाती के घर कयो दिया, मै भी छोटी जाती का होता.... कमजोर पड़ गया था वह। और कया वो जन्म जात अमीर सोचता था... हमें कया मिला रुसवाई के बिना कुछ नहीं।
आज वो डलिवरी बॉय था। पढ़ा लिखा युवक..... जिंदगी भर पश्चाताप ब्राह्मण स्वर्ण जाती। मोहन दास की उम्र उम्मीद से जयादा हो गयी थी.. कितना पढ़ा होगा... सोचो, सोचने से भी जयादा। मुक़म्मल किसी को जहां नहीं मिलता।
                              थक हार कर टूट गया। कही भी नंबरों की गिनती नहीं, पैसो की गिनती बहुत थी... पर वो किसी मुकाम पे नहीं पंहुचा। दुखी था। थक सा गया था।---" किस्मत सोने की नहीं थी... कमबख्त लोहे की तकदीर.... "
मोहन दास अब खत्म हो चूका था, आँखो मे विद्रोह रहता था। अब हैसियत से जयादा ख़यालो को नहीं सुनता था। सोचता था, ज़ब मैंने काम सड़क पर ही करना था, किसी के ऑडर को ही सुनना था तो इतना पढ़ा किसलिए... आड़े आ गई, बस कास्ट जात पात।वैसे देश प्रेमी हमारे लीडर महोदय जात पात खत्म करने की बाते बहुत लम्बी करते है ? पर हुई एक बात भी सत्य नहीं । एक भयंकर सत्य जो सरासर झूठ था ?
                            उसने यही काम करना था... डिलवरी बॉय... आर्डर लेता टाइमपे डलिवर करता था।
कितना टुटा हुआ था, हर ख़याल परेशान करता था...
एक ऑडर अजीब सा था, कालकते मे... घुमा पर कपनी को ना करने पर भी उसको झड़के सुननी पड़ी।
फिर वही ऑडर ने पुरानी कालकते की मार्किट मे घुमा।
पता किया, खूब माथा पच्ची की। 
                             एक सुनीयरनाम के आदमी से मिला, बात हुई... जनाब ये जो डलिवर हुआ है । "ये जनाब आदमी मर चूका है " डलिवरी बॉय को कुछ अटपटा सा लगा। कहने का मतलब ये पारसल की डेट निकल चुकी थी। ये चार सौ पचिस का था। अब वो कया करे। वापस करता तो टाटा ज़ेटो वाले उसे निकाल देंगे। अब कोई चारा नहीं था, जैसे कैसे उसने आपने पास ही रख लिया। और सिग्नेचर आपने कर दिये। पैसे ऑन लाइन जमा हो चुके थे। देखा जाएगा। शाम घिर गयी थी.... मोहन थोड़ा अटपटा सा था, कभी आपनी सुस्ती को लिफाफे को देखता, कभी आपने आप को गाली मंदा बोलता... कयो उसने काम ढंग से नहीं किया। वो लोगों को आते जाते देखता था, पास ही एक ठेले वाला मछली बना कर वेच रहा था उसकी महक वातावरण को मदहोश कर रही थी... कितने मसालो से तैयार मशली... मोहन दास आपने मोटरसाइकिल पर चल निकला था, हताश था, जैसे उसका मुखड़ा सुजा हुआ हो।
कहानी नबर 42 मे आगे कया होता है साथ बने रहे।
नीरज शर्मा की ओर से...... चलदा