UJJAIN EXPRESS - 4 in Hindi Moral Stories by Lakhan Nagar books and stories PDF | उज्जैन एक्सप्रेस - 4

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उज्जैन एक्सप्रेस - 4

"कुछ लोग मौत से डरते हैं... और कुछ लोग हर रोज़ उसी से मिलने की तैयारी करते हैं।"

 

 

रात 11:49 PM — उज्जैन जंक्शन।

 

प्लेटफॉर्म की आखिरी बेंच पर एक साया बैठा था। अंधेरे में धुंधली-सी आकृति, जिसे देखकर कोई राहगीर भी डर जाए। लेकिन वो डर किसी और का नहीं था — खुद उस इंसान का था, जो हर रोज़ खुद से लड़ता था, और हर बार हार जाता था।

उसके चेहरे पर थकान नहीं, खालीपन था। वो खालीपन जो तब आता है जब इंसान सब कुछ खो चुका होता है — प्यार, इज्ज़त, और अपनी पहचान। कपड़े मैले, आँखें लाल, और नाक से टपकती सफ़ेद सूखी लकीर बता रही थी कि ये लड़का नशे की गिरफ़्त में है।

 

सौरभ हमेशा से ही शांत लड़का रहा था। अपने गाँव के सरकारी स्कूल में उसने पढ़ाई की थी। उसके पिता, गोपाल सिंह एक क्लर्क थे जिला परिषद में, और माँ सीमा देवी  गृहिणी। छोटा परिवार, लेकिन खुशहाल। घर में किताबों का कोना था, माँ की रसोई से हर शाम घी की खुशबू आती थी और पिताजी की सायकल की घंटी सुनकर सौरभ दौड़ कर दरवाज़ा खोलता था।

बचपन साधारण था, लेकिन स्नेह से भरा हुआ। माँ अकसर कहती थीं, “सौरभ, जितनी ऊँचाई पर उड़ना है, पराई हवा में नहीं, अपने पंखों पर उड़ना।”पर वही पंख, आगे चलकर नशे के धुएं में जल जाएंगे, ये किसी ने नहीं सोचा था।

 

कॉलेज के लिए सौरभ इंदौर चला गया। कॉमर्स की पढ़ाई शुरू की और शुरू हुआ एक नया अध्याय। नए दोस्त, नया माहौल, नई आज़ादी। हॉस्टल में पहले कुछ हफ़्ते पढ़ाई में ही बीते, लेकिन फिर वह मिला—धीरज और समीर से। दोनों अमीर बापों के बेटे। शाम होते ही कमरे में ‘मूड’ बनने लगता। “सिर्फ एक कश, बस ट्राय करने के लिए” — यही कहते थे।

पहले सिगरेट, फिर गांजा, फिर एक पार्टी में नशे की गोलियाँ। सौरभ का दिमाग तेज़ था, लेकिन अंदर से वह बहुत भावुक और दबाव में आ जाने वाला लड़का था। ‘ना’ कहना उसके स्वभाव में नहीं था। धीरे-धीरे, शाम की चाय की जगह जॉइंट ने ले ली। पढ़ाई पीछे छूटती गई, लेकिन बाहर से सब सामान्य दिखता रहा।

 

महीने दर महीने, उसकी लत गहराती गई। अब वह अकेले में भी नशा करने लगा था। घर फोन करता, तो माँ कहतीं—“बेटा, बहुत दुबला लग रहा है तू, ठीक से खाना खा?” और वह हँस कर कहता, “हां माँ, सब ठीक है।” झूठ बोलने की आदत बन गई थी।

 

कॉलेज खत्म हुआ। पास भी हो गया, लेकिन नौकरी कोई नहीं मिली। नशा अब आदत नहीं, ज़रूरत बन चुका था। वापस घर आ गया—“थोड़े दिन घर रहूँगा, फिर जॉब ढूंढ लूंगा,” उसने पिताजी से कहा।

पर घर आकर उसकी हालत और बिगड़ने लगी। दिन में सोता, रात को गायब रहता। जेब में पैसे नहीं, लेकिन नशा जारी। माँ के पर्स से पैसे गायब होने लगे। बाथरूम में बंद होकर घंटों बैठे रहना, खाना छोड़ देना, आँखें सुर्ख़ और बोलचाल में चिड़चिड़ापन — सब कुछ माँ-बाप की चिंता का कारण बनने लगा।

एक दिन पिताजी ने धीरे से पूछा, “सौरभ, तुझे कुछ चाहिए क्या?”
सौरभ ने चिढ़कर कहा, “हाँ, 2000 रुपए चाहिए।”
“क्यों?”
“पढ़ाई की किताबें हैं।”
गोपाल जी जान गए थे कि किताबें नहीं खरीदी जा रहीं। लेकिन उन्होंने चुपचाप पैसे दे दिए।

वो समझते थे कि बेटा भटक गया है। हर माँ-बाप की तरह उन्होंने भी सोचा — "कहने से सुधर जाएगा… समझाने से संभल जाएगा…"

 

माँ ने मन्नतें मांगीं, बाबा की चौखट पर सिर रखा। पिताजी ने दोस्त के बेटे के लिए सरकारी नशा मुक्ति केंद्र का पता लगवाया। एक बार सौरभ को ज़बरदस्ती वहाँ ले जाया गया। लेकिन वहाँ की दीवारें, उसके अंदर की दीवारें नहीं तोड़ सकीं।

तीन दिन में ही वह वहाँ से भाग आया। “मैं पागल नहीं हूँ,” वो चिल्लाया था।

 

घर का माहौल जहरीला हो गया। बहसें, चुप्पियाँ, ग़ुस्सा, आँसू… और हर रात के बाद अगली सुबह और भारी।

एक दिन माँ की आँखों में बहुत थकावट थी। उन्होंने पिताजी से कहा —
“मैं अब नहीं सह पा रही। सौरभ को कुछ हो गया तो? या हमें कुछ हो गया तो?”
पिताजी ने सिर झुका लिया था। उनकी आँखों में कोई जवाब नहीं था ।

 

सौरभ उस दिन भी रात भर बाहर था। शायद कहीं कोई अंधेरे कोना ढूंढा होगा जहाँ अपने भीतर के शोर को और थोड़ी देर के लिए चुप करा सके। माँ, पूरी रात जागती रहीं। छत की ओर देखती हुई सोचती रहीं—“क्या ये वही बच्चा है जिसे मैंने नौ महीने कोख में रखा था? जो मेरे सीने से चिपक कर सोता था? जिसकी पहली तबियत खराब होने पर मैं तीन दिन तक भूखी रही थी?”

 

सीमा देवी की आँखें सूज चुकी थीं, लेकिन अब आँसू भी सूखने लगे थे।

पिताजी, गोपाल सिंह, खामोशी से चुप बैठे थे। कमरे की एक दीवार पर सौरभ की पांचवी कक्षा की फोटो टंगी थी—जिसमें वह मेडल पहने मुस्कुरा रहा था। और दूसरी ओर, वही सौरभ अब नशे के कारण पहचान से बाहर हो गया था—अपनी माँ के पैसे चुराने वाला, पिताजी को गाली देने वाला, घर की चुप्पी का कारण बनने वाला।

 

"कहाँ चूक हो गई, गोपाल?"
सीमा ने फुसफुसाकर पूछा।

 

“हमने तो सिर्फ अच्छे भविष्य का सपना देखा था। कहाँ गलती हो गई?” गोपाल ने अपनी हथेली मुँह पर रखी।
“वो हर रात नशे में लड़खड़ाता है… किसी दिन कहीं मर ना जाए… अब वो हमारा नहीं रहा…”
सीमा की आवाज़ टूटी नहीं थी, पर साँस रुक-रुक कर चल रही थी।

कुर्सी पर बैठते हुए गोपाल बोले—
“अब हम उसकी मदद नहीं कर सकते। शायद हम खुद एक बोझ बन गए हैं।”

 

वे दोनों धीरे-धीरे खेत की तरफ़ निकले। रास्ते में एक बच्चा गुब्बारा बेच रहा था। सीमा एक पल के लिए रुक गईं। वो सोच रही थीं, “कभी सौरभ को ऐसा ही एक नीला गुब्बारा बहुत पसंद था…”

गोपाल ने हल्के से उसका हाथ थामा और सिर झुका कर बोला,
“चलो, अब देर ना करें…”

 

कुएँ के किनारे खड़े होकर दोनों ने एक-दूसरे की आँखों में देखा। न कोई शिकायत थी, न गुस्सा।
सिर्फ़ थकान थी। एक ऐसी थकान जो किसी माँ-बाप को अपने ज़िंदा बेटे के होते हुए मरने पर मजबूर करती है।

सीमा ने धीमे से कहा—
“अगर अगला जन्म हो, तो फिर से सौरभ को ही बेटा बनाऊँ… पर इस बार बचा लूँगी उसे।”

और फिर…
वो दोनों एक साथ…
इस दुनिया से ख़ामोशी से चले गए ....

जब अगली सुबह सौरभ लौटा, तब घर पर भीड़ थी। लोग रो रहे थे। पुलिस आई हुई थी।

सीढ़ियों पर रखी माँ की पुरानी चप्पलें थीं—जैसे अब भी वो रसोई में जाकर उसके लिए खाना बनाने वाली हों।
पिताजी की छड़ी वहीं दरवाजे के पास खड़ी थी—जैसे कह रही हो, “बेटा, अब संभाल ले खुद को…”

लेकिन सौरभ अब भी नशे में था।

 

जब उसे बताया गया—"तेरे माँ-बाप कुएँ में कूद गए…”
तो पहले वो हँसा—“क्या मज़ाक है ये…”
लेकिन जब उसे कुएँ पर ले जाया गया और माँ का आँचल वहाँ पड़ा मिला…

… तो वो वहीं गिर पड़ा।

“मैंने मार डाला उन्हें… मैंने… माँ… बाबूजी… माफ़ करो…”
वो ज़मीन पर सिर पटकता रहा, लेकिन अब कोई नहीं था, जो उसका सिर गोद में रखकर कहे—"सब ठीक हो जाएगा बेटा…"

 

अब वो सिर्फ जिंदा था, जी नहीं रहा था। हर रात वही बेंच, वही प्लेटफॉर्म और वही सवाल — "आज कूदूँ या कल?”

और फिर उस रात, जब सौरभ ने तय कर लिया था कि अब नहीं... अब बहुत हो गया। ठीक उसी वक्त, किसी की आवाज़ ने उसे रोक दिया —

 

“अरे बाबा, मरने से पहले तो ज़रा ये समोसे खा लो!”

पीछे देखा — एक लड़की, नीली सलवार में, हाथ में दो समोसे और आँखों में वो चमक, जो खुद भी कुछ झेल चुकी थी। उसने बैठकर सुना, समझा और वो कहा जो शायद सौरभ ने खुद से भी कभी नहीं कहा था — कि "तू खत्म नहीं हुआ है, बस थक गया है। और थक कर रुक जाना, खत्म हो जाना नहीं होता।" 

उसने बस इतना कहा — "मैंने भी किसी अपने को खोया है... हमेशा के लिए। और तब से, हर बार किसी टूटे इंसान को देखती हूँ, तो लगता है... शायद कोई और बच जाए।"

 

 सौरभ लगातार शराब पीते-पीते एक ही बात दोहराता गया - मैंने अपने माँ-बाप  को मारा हैं ,

पायल बोली - क्या माँ-बाप सच में यही चाहते थे कि उनका बेटा ताउम्र खुद को दोषी मानकर घुटता रहे ? नहीं , 

माँ-बाप हर हाल में अपने बच्चे के भले की कामना करते हैं --- EVEN AFTER DEATH.

अगर वे देख पा रहे होते कि सौरभ खुद को  खत्म कर रहा हैं , तो वे चिल्लाते , माफ़ कर देते । और पता हैं क्या कहते ?

 

क्या कहते ? सौरभ ने धीमे से पूछा 

“बेटा, अब ठीक हो जा। हमारे लिए, खुद के लिए।” इसलिए उनकी मौत तो बोझ की तरह मत लो उसे अंतिम इशारे की तरह देखो जो कह रहा हैं कि - बेटा ! अब खुद को बर्बाद मत कर ।

 

सौरभ बस चुपचाप सुनता जा रहा था , और पायल -

 

जीवन रुकता नहीं , और तुम भी नहीं रुक सकते क्यूंकि अगर तुम वहीँ ठहर गये जहाँ गलती हुई हैं तो आगे कैसे जाओगे ; गिल्ट जीवन की पटरी नहीं होता हैं - एक रेड सिग्नल होता हैं ,

तुम देखो , रुककर सोचो , और फिर आगे बढ़ो , हर बार गलती पर रुकने का मतलब होगा कि तुम कभी मंजिल तक पहुंचोगे ही नहीं  ।

 

"क्या तुम पहले इंसान हो जिसने अपने कारण किसी को खोया हैं ?" नहीं ।

दुनिया में करोड़ों लोग हैं जिन्होंने ग़लतियाँ कीं—
किसी ने पिता को गुस्से में छोड़ दिया,
किसी ने माँ को मरते वक्त माफ़ नहीं किया,
किसी ने भाई से बात बंद कर दी और फिर वो चला गया…

लेकिन सभी गिल्ट में फ़से नहीं रह सकते ,

सच्चा प्राश्चित यह नहीं कि तुम रोते हो ,सच्चा प्राश्चित यह हैं कि तुम बदल जाओ ।

पायल के शब्द धीरे-धीरे ही सही सौरभ की चेतना को जाग्रत कर रहे थे , ट्रेन की अवाज तेज होती जा रही थी और पायल अपने अंतिम शब्दों की और बढ़ रही थी -

गिल्ट एक बीज हैं , अगर तुम आंसुओ से उसे गलाओगे तो वो सड़ जायेगा ,

लेकिन अगर तुम उसे आत्मज्ञान  की मिट्टी में बोवोगे तो वो नया इंसान पैदा करेगा -- कहते-कहते पायल के शब्द मौन हो गए ।

 

उस रात, सौरभ ने पहली बार किसी अजनबी से वो सुना जो अपने भी नहीं कह पाए — कि वो अब भी किसी लायक है। उसने समोसे खाए, नज़रें पटरी से हटाकर आसमान की ओर कीं। ट्रेन गुजर गई, और वो लड़की भी चली गई। पर उसके शब्द वहीं रह गए — सीने में गूंजते हुए।

 

चीज़े छोड़ना आसान नहीं होता, लेकिन नामुमकिन भी नहीं। उसका पहला कदम होता है — किसी से बात करना। स्वीकार करना कि मदद चाहिए, और फिर धीरे-धीरे, एक-एक दिन जीतना। सही लोग, सही माहौल और सही दिशा — यही वो चीजें हैं जो किसी को अंधेरे से बाहर निकाल सकती हैं।

और शायद उस रात, सौरभ ने पहला कदम रख दिया था... ज़िंदगी की ओर।