जुलाई 1973 में कालेज में ही परिवार के साथ रहने की व्यवस्था कर ली थी। पत्नी मेरे बच्चे और बहिन जावित्री कौड़िया में रहने के लिए आ गई थीं। सितम्बर आते आते लाल बहादुर शास्त्री डिग्री कॉलेज में बीएड की मान्यता मिल गई। अध्यापकों की नियुक्ति के लिए विज्ञापन निकाला गया होगा। मैंने विज्ञापन तो नहीं देखा था पर डिग्री कॉलेज के कुछ अध्यापक और बड़े बाबू सतीश चन्द्र वर्मा ने कहा कि आप आवेदन कर दीजिए। मैंने आवेदन कर दिया और कौड़िया चला गया।
सूचना दी गई कि जिलाधिकारी के आवास पर साक्षात्कार देना है, आप उपस्थित हों। मैने साक्षात्कार दिया। मेरे साथ चयनित लोगों ने दूसरे ही दिन कार्यभार ग्रहण कर लिया। मैं जनता विद्यालय में स्थायी प्राचार्य था, वहाँ से अवैतनिक अवकाश लेकर ही शास्त्री कॉलेज में कार्यभार ग्रहण करना चाहता था। लाल बहादुर शास्त्री महाविद्यालय में मेरे नियुक्ति की सूचना मिलने पर जनता विद्यालय के प्रबन्धक, आम जनमानस, अध्यापक छात्र सभी बहुत दुःखी हुए। मेरी विदाई करते समय लोग फफक पड़े और मेरी आँखों में भी आँसू आ गए। परिवार दशहरे में ही घर चला आया था मैं उसे लाया नहीं था।
अगले दिन सुबह की गाड़ी से जब चलना हुआ तो विद्यालय के बच्चे, अध्यापक और कुछ अभिभावक भी बनगाई स्टेशन पर आ गए। मैंने जैसे ही गाड़ी में अपना स्थान लिया बच्चे भी गाड़ी में बैठ गए। गोण्डा उतरने पर मैंने सीधे शास्त्री महाविद्यालय आकर कार्यभार ग्रहण किया। बच्चे सभी जिलाधिकारी के पास पहुँच गए और कहने लगे कि हमारा प्राचार्य हमें लौटा दो। जिलाधिकारी ने बच्चों से कहा कि प्राचार्य जी कहाँ रहेंगे यह उन्हीं को तय करना है। किसी तरह समझा-बुझा कर बच्चों को वापस किया गया।
जीतेशकान्त पाण्डेय- लाल बहादुर शास्त्री कालेज में आप बारह वर्ष रहे। उस समय कालेज का परिवेश कैसा था और आपने किन क्षेत्रों में अपना योगदान दिया?
डॉ0 सूर्यपाल सिंह- 20 अक्टूबर 1973 को मैंने शास्त्री कॉलेज में प्रवक्ता के रूप में कार्यभार ग्रहण किया। मेरी नियुक्ति बीएड विभाग में हुई थी। यह विभाग अभी नया खुला था और इसकी मान्यता भी अस्थायी थी। इसलिए मेरे पिता जी ने कालेज के सचिव तरुण चन्द्र से बात की तो उन्होंने कहा कि आपका बेटा स्थायी नौकरी को छोड़कर अस्थायी पर क्यों आ रहा है। पिताजी ने मुझे बताया। मैंने उन्हें बताया कि डिग्री कालेज में पहले मान्यता अस्थायी ही मिलती है और बाद में उसका स्थायीकरण होता है। मेरी बात से वे भी सन्तुष्ट हुए। घर के लोग भी प्रसन्न हुए कि अब घर पर ही रहना है क्योंकि मेरे घर से कालेज की दूरी मात्र तीन किमी0 थी।
टॉमसन कॉलेज में रहते हुए मैंने खेती में कुछ नवीन प्रजातियाँ लगायी जिससे गाँव के अन्य लोग भी लाभान्वित हुए थे। मेरे घर पर आ जाने से वे लोग भी प्रसन्न हुए। इस सत्र में आठ अध्यापकों का चयन हुआ था। जिसमें से चार- मुरारी कृष्ण श्रीवास्तव, जयपाल सिंह, मनोहर लाल शर्मा और मैं ही आगे के वर्षो में कार्यरत रहे। जिस समय बीएड विभाग खुला था कॉलेज में बीए व बीएससी की कक्षाएँ चलती थीं। बीए में पढ़ाने वाले अध्यापक चाहते थे कि परास्नातक की मान्यता प्राप्त कर ली जाए। प्रबंघतंत्र ने बीएड की मान्यता ले ली थी। इसलिए स्नातक स्तर पर अध्यापन करने वाले अध्यापक इस सत्र में बीएड के लोगों से थोड़ा उदासीन रहते थे। लेकिन यह स्थिति बहुत दिनों तक नहीं रही। धीरे-धीरे उनकी उदासीनता सकारात्मकता में बदल गयी।
बीएड के सभी अध्यापकों ने अपना कार्य सुचारु रूप से शुरू किया। पहले सत्र में बीएड की कक्षाएँ एक बजे से लगती थी। उस समय तक बीए व बीएससी की कक्षाएँ प्रायः समाप्त हो जाती थी। बीएड में जो प्रशिक्षु थे वे सभी स्नातक और परा स्नातक थे। उसमें कुछ ऐसे लोगों ने भी प्रवेश लिया था जो इण्टर कालेजों में कई वर्षो से अध्यापन कर रहे थे। पहला वर्ष था और सभी अध्यापक अपना सर्वोत्तम देने का प्रयास कर रहे थे। थोड़े दिन सिद्धान्त की कक्षाएँ चलाकर अध्यापन के लिए उन्हें माध्यमिक विद्यालयों में भेज दिया गया और सभी आठों अध्यापक उनके पर्यवेक्षण में लग गये। इसमें दस बजे से चार बजे तक सभी अध्यापकों को व्यस्त रहना पड़ता था। चार बजे के बाद भी कॉलेज में रुककर पाठ-योजनाओं का सुधार करना पड़ता था। यह कार्य लगभग एक महीने तक चलता रहा।
प्रयोगात्मक कार्य के बाद फिर सिद्धान्त की कक्षाएँ चलती रहीं। मुझे पश्चिमी शिक्षा शास्त्रियों को पढ़ाने का दायित्व दिया गया। बीएड में साल भर में एक बार सांस्कृतिक कार्यक्रम आयोजित किया जाता रहा जिसमें बच्चे प्रसन्नतापूर्वक भाग लेते। उसमें कम समय वाले एकांकी का मंचन किया जाता। कार्यक्रम लड़के-लड़कियाँ सभी मिलकर आयोजित करते। कौड़िया में रहते हुए मैंने 18 मिनट का एक नाटक लिखा था। बच्चों ने उसका प्रदर्शन जनपदीय रैली में किया और प्रथम स्थान प्राप्त किया था। इसी सत्र में मैंने उस नाटक को थोड़ा और परिवर्तित कर तीन अंकां का बना दिया। मैं कविताएँ भी लिख रहा था और यह नाटक भी ‘परतों के बीच’ के नाम से 1975 में प्रकाशित हुआ। सत्र 1973-74 में छात्र-संघ के सुभाषचन्द्र पाण्डेय अध्यक्ष एवं गंगोत्री प्रसाद मंत्री थे। इन लोगों ने कॉलेज की व्यवस्था को सुचारु रूप से चलाने में मदद की। वर्ष में एक बार छात्रसंघ का कार्यक्रम आयोजित किया जाता। अगले स़त्र में भी नियमित कक्षाएँ शुरू हुईं और छात्र संघ के लड़कों ने मुझसे कहा कि आप एक नाटक करा दीजिए। व्यवस्था हम लोग कर लेंगे।
साहित्य और उसकी विधाओं में मेरी रुचि थी, इसलिए मैंने बच्चों का प्रस्ताव स्वीकार कर लिया। कॉलेज में भूगोल विभाग की भी मान्यता मिल गयी थी और प्राचार्य जी ने मुझे भूगोल विभाग का काम संभालने के लिए लगा दिया था। मैं भूगोल की कक्षाएँ भी लेता और बीएड की भी। छात्रसंघ के कार्यक्रम में मैंने ‘परतो के बीच’ को ही मंचित करने का निर्णय लिया। जो बच्चियाँ नाटक में भाग लेने के लिए तैयार हुइंर्, वे चाहती थीं कि लड़कों की भूमिका भी लड़कियाँ ही करें। मैंने स्वीकृति दे दी और अभ्यास शुरू हुआ। लगभग दो सप्ताह बच्चों ने अभ्यास किया। छात्र संघ के बच्चों ने ही मंचन की तिथि तय की। निश्चित तिथि को मंचन के लिए सभी बच्चे इकट्ठा हुए। यथासंभव छात्र संघ के बच्चों ने भी सहयोग किया। अब तक शास्त्री कालेज में दो ढाई घंटे का एक भी नाटक कभी नहीं हुआ था।
कुछ लोग आशंका व्यक्त कर रहे थे कि दो ढाई घंटे तक नाटक कौन देखेगा ? मैं लोगों को बराबर आश्वस्त करता रहा कि आप निश्चिन्त रहें। शास्त्री कॉलेज में यह पहला नाटक का कार्यक्रम था। इसलिए बहुत से बच्चे इकट्ठा हुए। छात्र संघ के पदाधिकारियों ने भी कुछ लोगों को आमंत्रित कर रखा था, नाटक में वे लोग भी आए। कार्यक्रम शाम के छह बजे से ही आयोजित था। नाटक शुरू होते ही निस्तब्धता छा गयी। कहीं से कोई आवाज़ नहीं केवल बच्चों के संवाद ही सुनाई पड़ते। अध्यापकों में मेरे अलावा वहाँ कोई उपस्थित नहीं था।
अतिथियों और बच्चों के बीच दो ढाई घंटे तक नाटक चला। नाटक समाप्ति पर जब मैंने बच्चों का परिचय कराना प्रारम्भ किया तो तालियाँ लगातार बजती रहीं। अतिथियों और बच्चों ने कहा कि ऐसा नाटक उन्होंने जीवन में पहले कभी नहीं देखा था। छात्रसंघ के बच्चे पूरी तरह से गद्गद् थे। जिन बच्चों ने नाटक में भाग लिया था वे भी प्रशंसा पाकर बहुत प्रभावित हुए। अगले दिन जिसने भी सुना, वह आश्चर्य प्रकट करता रहा।
‘परतो के बीच’ नाटक का प्रकाशन 1975 में हुआ। नाट्य-मंचन की प्रशंसा सब लोग कर रहे थे तो एक दिन प्राचार्य डा. जगदीश प्रताप सिंह ने मुझसे कहा कि मैंने आपका नाटक पढ़ा। यह नाटक वर्तमान समाज की विसंगतियों पर सार्थक प्रश्न खड़े करता है। 1975-76 में मनोहर लाल शर्मा ने भूगोल विभाग संभाल लिया और मुझे मुक्ति मिल गई। प्राचार्य जी ने कहा कि ‘परतों के बीच’ नाटक मैं फिर से कराना चाहता हूँ और यह नाटक तीन दिनों तक लगातार होना चाहिए। मैंने तैयारी शुरू करा दी। बच्चे अब रुचिपूर्वक काम करने लगे । उन्हें लगा कि अब हम ठीक ढंग से मंचन कर पाएँगे। नाटक तैयार हो गया।
प्राचार्य जी ने इसके मंचन की व्यवस्था करायी। अतिथियों के लिए टेन्ट लगाया गया और उसमें कुर्सिया लगाई गई थीं। शहर के संभ्रांत लोगों को नाटक देखने के लिए आमंत्रित किया गया था। इससे गोण्डा में नाट्य-मंचन का परिवेश निर्मित हुआ। बीए और बीएड की लड़कियाँ और लड़के पूरे मनोयोग से काम करते। फिर प्राचार्य जी ने प्रतिवर्ष शास्त्री सप्ताह आयोजित करने का निर्णय लिया और उसमें मेरे निर्देशन में विभिन्न वर्षो में धर्मवीर भारती का ‘अंधा युग’ विष्णु प्रभाकर का ‘टूटते परिवेश’ मोहन राकेश का ‘आषाढ़ का एक दिन’ ब्रेख्त का ‘खड़िया का घेरा’ और मेरा लिखा ‘कलमजीवी निराला’ प्रदर्शित हुए। एक वर्ष में तो 34 लड़के और लड़कियों ने मिलकर काम किया।