──────────────────
एक चाय वाला
लेखक : विजय शर्मा ‘एरी’
आड़ा शहर की सबसे टेढ़ी सड़क का नाम है जवाहर मार्ग। सड़क टेढ़ी है, पर फुटपाथ सीधा। उसी फुटपाथ पर पिछले बारह साल से एक ठेला खड़ा होता है। ठेले का मालिक है इंदरजीत। उम्र चालीस। कद पाँच फुट आठ इंच। कंधे चौड़े, पर कमीज ढीली, जैसे कंधे अब भी पुरानी ज़िम्मेदारियों को ढो रहे हों।
सुबह ठीक साढ़े चार बजे इंदरजीत का घर नंबर ४७१, गली नंबर सात, कच्ची बस्ती, खुलता है। पहले वह माँ के कमरे में झाँकता है। बूढ़ी माँ करवट बदलती है, खाँसती है, फिर सो जाती है। फिर कोमल के पास। सात साल की कोमल तकिया गले लगाए सोती है। इंदरजीत उसके माथे पर उँगली रखता है, जैसे बुखार चेक कर रहा हो। फिर चुपके से निकल पड़ता है।
पाँच बजे ठेला पहुँच जाता है। लोहे की केतली, गैस का सिलेंडर, कुल्हड़ों का डलिया, अदरक का टुकड़ा, इलायची का डिब्बा। सबसे पहले वह ठेले के शीशे के नीचे चिपकी एक फोटो को साफ करता है। फोटो में उसकी पत्नी सीमा मुस्कुरा रही है। तीन साल पहले लंबी बीमारी ने उसे छीन लिया था। उस दिन से इंदरजीत चाय में इलायची थोड़ी ज़्यादा डालता है, ताकि कड़वाहट कोई न पकड़ सके।
सात बजे भीड़ शुरू होती है। सबसे पहले आता है मुंशी जी। रिटायर्ड क्लर्क। हर रोज़ एक कुल्हड़ चाय और दस रुपये उधार। पिछले आठ महीने से उधार चल रहा है। इंदरजीत बही में लिखता नहीं। याद रखता है। मुंशी जी कहते हैं, “पेंशन आएगी तो एक साथ चुका दूँगा।” इंदरजीत मुस्कुरा देता है।
फिर आती है राधा। ऑटो रिक्शा चलाती है। सुबह छह बजे से रात दस बजे तक। एक बार उसका बेटा स्कूल की छत से गिर गया था। इंदरजीत ने ठेला छोड़कर उसे अस्पताल पहुँचाया था। आज भी राधा हर रविवार को दस रुपये ज़्यादा देती है। कहती है, “ये ब्याज है भाई।”
आठ बजे कोमल स्कूल जाती हुई आती है। सफेद यूनिफॉर्म, दो चोटी, लाल रिबन। ठेले के पास रुकती है। इंदरजीत आधी चाय, आधा दूध, चीनी कम। कोमल चुपचाप पीती है और पापा को देखती रहती है। कभी-कभी पूछती है, “पापा, आज कितना कमाया?” इंदरजीत कहता है, “आज डॉक्टर बनने लायक।”
कोमल चली जाती है तो इंदरजीत की आँखें उसके पीछे-पीछे जाती हैं। उसे याद आता है सीमा का आखिरी वाक्य, “कोमल को डॉक्टर बनाना… ताकि कोई माँ किसी को न खोए।”
दोपहर बारह बजे एक नया चेहरा आता है। लड़का, बीस-इक्कीस साल का। फटी जींस, आँखें लाल। कहता है, “भाई साहब, बस पचास रुपये… आज इंटरव्यू है।” इंदरजीत बिना कुछ पूछे दे देता है। लड़का चला जाता है। शाम को लौटता है, हाथ में अपॉइंटमेंट लेटर। रोते हुए पैर छूता है। इंदरजीत कहता है, “अब चाय पी और जा, पहला वेतन आए तो अपनी माँ को कुछ लाना।”
शाम सात बजे ठेला बंद करने का वक़्त होता है, पर इंदरजीत नौ तक खड़ा रहता है। रात की ड्यूटी करने वाले आते हैं। नर्सें, पुलिस वाले, फैक्ट्री के मजदूर। वे ज़्यादा पैसे देते हैं। इंदरजीत सोचता है, दस रुपये ज़्यादा यानी माँ की एक गोली।
माँ की बीमारी बढ़ती जा रही है। फेफड़े ख़राब। डॉक्टर ने कहा, “ऑपरेशन चाहिए। ढाई लाख।” इंदरजीत ने पूछा था, “किश्तों में?” डॉक्टर ने सिर हिलाया था। ठेले के नीचे लोहे का डिब्बा है। उसमें तीन साल से पैसे जमा कर रहा है। अभी सत्तर हज़ार भी नहीं हुए।
एक रात ग्यारह बजे एक लड़की आती है। साड़ी फटी, आँखें सूजी। कहती है, “मुझे घर छोड़ दो, ऑटो वाले डराते हैं।” इंदरजीत ठेला बंद करता है, पुरानी साइकिल निकालता है, लड़की को पीछे बैठाता है। पंद्रह किलोमीटर दूर बस्ती में छोड़ता है। लौटते वक़्त बारिश शुरू हो जाती है। घर पहुँचता है तो माँ पूछती है, “इतनी देर?” वह कहता है, “केतली साफ कर रहा था।”
एक और दिन। बूढ़ा रिक्शा वाला दिल का दौरा पड़ने से गिर पड़ता है। इंदरजीत उसे गोद में उठाता है, ऑटो रोकता है, अस्पताल पहुँचाता है। डॉक्टर कहते हैं, “दस मिनट और देर होती तो बचता नहीं।” बूढ़े का बेटा बाद में आता है, पैर पकड़ता है। इंदरजीत कहता है, “चाय वाला होने का फ़र्ज़ था।”
लोग अब उसके ठेले को “दुआ का ठेला” कहते हैं। जो उधार लेता है, लौटाते वक़्त ज़्यादा दे जाता है। मदद लेने वाला बाद में खुद पूछने आता है, “इंदर भाई, आज किसी को ज़रूरत तो नहीं?”
फिर भी अपना डिब्बा खाली ही रहता है। कोमल अब दसवीं में है। फीस पंद्रह हज़ार। एक दिन प्रिंसिपल ने कहा, “फीस नहीं तो एग्ज़ाम नहीं।” उस दिन इंदरजीत के पास सिर्फ़ नौ हज़ार थे। वह ठेले पर बैठ गया। केतली ठंडी हो गई। पहली बार जल्दी ठेला बंद किया। घर जाकर माँ के पास बैठा। माँ ने पूछा, “क्या हुआ?” उसने कहा, “कुछ नहीं माँ, चाय कम बिकी।”
रात को सो नहीं सका। सुबह चार बजे उठा। ठेले पर गया। केतली जलाई। फिर फैसला किया। लोहे का डिब्बा खोला। माँ के ऑपरेशन के सारे पैसे निकाले। कोमल की फीस भरी। शाम को कोमल आई तो पहली बार पापा को गले लगाकर खूब रोई।
आज भी इंदरजीत उसी फुटपाथ पर खड़ा है। लोग पूछते हैं, “माँ का ऑपरेशन कब?” वह मुस्कुराता है, “जब कोमल डॉक्टर बनेगी, वही कराएगी।”
कोमल अब कहती है, “पापा, आप पूरे शहर के हीरो हो।”
इंदरजीत हँसता है, “नहीं बेटी, हीरो वही जो आखिरी साँस तक दूसरों के लिए जीए। जब तू डॉक्टर बनेगी, तब मैं एक साँस अपने लिए माँगूँगा। बस एक।”
चाय अभी भी बनती है। भाप अभी भी उड़ती है। इलायची अभी भी ज़्यादा है। और इंदरजीत अभी भी मुस्कुराता है। क्योंकि वह जानता है, जब तक वह दूसरों की जेब भरता रहेगा, ऊपर वाला उसकी जेब कभी खाली नहीं रहने देगा।
शायद एक दिन कोमल सचमुच डॉक्टर बनेगी।
और उसका पहला ऑपरेशन अपनी दादी का होगा।
उस दिन इंदरजीत ठेले के नीचे से अपना लोहे का डिब्बा निकालेगा,
जिसमें अब ढाई लाख से कहीं ज़्यादा होंगे।
सब दुआएँ।
─── समाप्त ───