एपिसोड – 10
जब दिल याद रखता है
सुबह की रौशनी धीरे-धीरे वर्कशॉप की खिड़की से अंदर उतर रही थी।
धूल के कण हवा में तैर रहे थे, जैसे किसी बीती रात के राज़ अभी भी कमरे में अटके हों।
आरव फर्श पर बैठा था।
पीठ दीवार से टिकी हुई।
आँखें खुली थीं, लेकिन उनमें कोई मंज़िल नहीं थी।
उसके सामने—
टूटा हुआ कैनवस।
फटे हुए रंग।
जैसे किसी ने यादों को ज़मीन पर बिखेर दिया हो।
वह देर तक उसे देखता रहा।
समझ नहीं पा रहा था कि सीने में उठ रहा यह खालीपन क्यों इतना भारी लग रहा है।
“अजीब है…”
उसने खुद से बुदबुदाया।
“लगता है जैसे कुछ बहुत क़रीबी था…
और अब नहीं है।”
उसने उठने की कोशिश की।
सिर में हल्का-सा दर्द हुआ।
ऐसा दर्द, जो दवा से नहीं—
किसी कमी से होता है।
तभी दरवाज़े की चरमराहट सुनाई दी।
आरव ने पलटकर देखा।
वह लड़की दरवाज़े पर खड़ी थी।
आज वह किसी पेंटिंग का हिस्सा नहीं थी।
कोई धुंध नहीं।
कोई ठंडक नहीं।
साँस लेती हुई।
ज़िंदा।
उसके बाल खुले थे,
चेहरे पर हल्की-सी घबराहट,
और आँखों में वही गहराई—
जिसे देखकर आरव का दिल बिना वजह तेज़ धड़क उठा।
एक पल के लिए
दोनों की नज़रें टकराईं।
कुछ भी याद नहीं था।
फिर भी—
कुछ बहुत जाना-पहचाना था।
लड़की ने धीरे से पूछा,
“मैं… यहाँ क्यों आई हूँ,
मुझे ठीक से याद नहीं।”
उसकी आवाज़ सुनते ही
आरव का दिल जैसे किसी ने कसकर पकड़ लिया हो।
“आप… ठीक हैं?”
आरव ने पूछा।
लड़की ने सिर हिलाया।
“हाँ।
बस… ऐसा लग रहा है
जैसे मैं किसी लंबे अंधेरे से बाहर आई हूँ।”
उसकी नज़र टूटी पेंटिंग पर पड़ी।
वह ठिठक गई।
“यह…”
उसकी उँगलियाँ अनायास काँप गईं।
“इसे देखकर डर क्यों लग रहा है?”
आरव ने कुछ कहना चाहा,
लेकिन शब्द नहीं मिले।
उसे खुद नहीं पता था
कि उस डर का नाम क्या है।
लड़की ने एक कदम आगे बढ़ाया।
जैसे ही उसने ज़मीन पर बिखरे रंगों को छुआ—
एक झटका-सा लगा।
उसके दिमाग़ में एक छवि चमकी।
अंधेरा।
क़ैद।
और एक साया—
जो फुसफुसा रहा था।
वह हड़बड़ाकर पीछे हटी।
“मैंने…
मैंने कुछ बहुत बुरा देखा,”
उसने काँपती आवाज़ में कहा।
आरव अनायास उसकी तरफ़ बढ़ा।
“आप बैठ जाइए।”
उसने लड़की को कुर्सी दी।
जैसे ही उनके हाथ हल्के-से टकराए—
दोनों सिहर उठे।
एक पल के लिए
समय रुक गया।
आरव को लगा
जैसे दिल ने कुछ पहचान लिया हो,
लेकिन दिमाग़ खाली था।
लड़की ने अपना हाथ खींच लिया।
“माफ़ कीजिए…
मुझे नहीं पता ऐसा क्यों लगा।”
आरव हल्का-सा मुस्कुराया।
“अजीब बात है…
मुझे भी।”
कुछ पल खामोशी रही।
फिर लड़की ने पूछा,
“आपका नाम?”
“आरव।”
वह बोला।
“और आपका?”
लड़की रुक गई।
उसका माथा सिकुड़ गया।
“मुझे…”
उसने आँखें बंद कीं।
“मुझे अपना नाम याद नहीं आ रहा।”
आरव का दिल बिना वजह डूब गया।
“कोई बात नहीं,”
उसने नरमी से कहा।
“नाम… फिर मिल जाएगा।”
लड़की ने उसकी तरफ़ देखा।
उस नज़र में पहली बार सुकून था।
“आप अजनबी नहीं लगते,”
उसने कहा।
“ऐसा क्यों?”
आरव ने खिड़की की तरफ़ देखा।
“शायद…
कुछ रिश्ते नाम से नहीं बनते।”
तभी
हवा अचानक भारी हो गई।
कमरे की लाइट हल्की-सी झपकी।
दीवार के एक कोने में
परछाई हिली।
आरव ने उसे देखा।
दिल की धड़कन तेज़ हो गई।
“आपने कुछ देखा?”
लड़की ने पूछा।
“नहीं,”
आरव ने झूठ कहा।
लेकिन उसकी आँखें उस कोने से नहीं हटीं।
परछाई धीरे-धीरे गहरी हुई।
एक फुसफुसाहट गूँजी—
बहुत हल्की।
“मोहब्बत खत्म नहीं होती…”
लड़की ने सिर पकड़ लिया।
“यह आवाज़…”
“यह मेरे अंदर क्यों गूँज रही है?”
आरव ने उसका कंधा थाम लिया।
“आप डरिए मत।”
जैसे ही उसने ऐसा कहा—
परछाई पीछे हट गई।
हवा हल्की हो गई।
लड़की ने गहरी साँस ली।
“आपने मुझे बचाया।”
आरव हैरान हुआ।
“मैंने कुछ नहीं किया।”
वह उसकी आँखों में देखने लगी।
“आपने हाथ पकड़ा।
बस वही काफ़ी था।”
आरव कुछ नहीं बोला।
उसे याद नहीं था—
लेकिन दिल जानता था
कि यह पहली बार नहीं था।
कुछ देर बाद
लड़की उठी।
“मुझे जाना चाहिए,”
उसने कहा।
“शायद अपनी ज़िंदगी ढूँढने।”
आरव का दिल बैठ गया।
“आप…
फिर मिलेंगी?”
यह सवाल उसके मुँह से खुद निकल गया।
लड़की मुस्कुराई।
“अगर किस्मत चाहे।”
वह दरवाज़े तक गई।
रुकी।
पीछे मुड़ी।
“एक बात अजीब है,”
उसने कहा।
“आपके पास खड़े होकर
मुझे डर नहीं लगता।”
आरव की आँखें भर आईं।
बिना वजह।
लड़की चली गई।
दरवाज़ा बंद हो गया।
आरव देर तक वहीं खड़ा रहा।
फिर उसने टूटी पेंटिंग की तरफ़ देखा।
कैनवस के एक टुकड़े पर
हल्की-सी चमक उभरी।
जैसे किसी ने रंगों में लिखा हो—
“तीसरा रास्ता हमेशा खुला रहता है
उनके लिए
जो दिल से याद रखते हैं।”
आरव ने सीने पर हाथ रखा।
दर्द था।
लेकिन अब उसमें
एक उम्मीद भी थी।
कहीं न कहीं—
सायों के बीच
इश्क़
फिर से आकार ले रहा था।