⭐ एपिसोड 58 — "खून की वह निशानी"
कहानी — अधूरी किताब
हवेली के अँधेरे गलियारे में निहारिका तेज़ कदमों से चल रही थी।
उसके दिल में जैसे किसी ने आग लगा दी हो।
हर कदम के साथ उसका विश्वास टूट रहा था—
पर उसी टूटे विश्वास में एक नई सच्चाई जन्म ले रही थी।
उसकी उंगलियाँ काँप रही थीं, लेकिन सांसें तेज़ थीं।
उसे लग रहा था जैसे हवेली की हर दीवार उससे कुछ कहना चाहती हो।
कुछ… जिसे उसने अब तक सुना नहीं था।
पीछे से सिया की आवाज गूँजी—
“निहारिका! प्लीज़ रुक जाओ!”
लेकिन निहारिका ने सिर तक नहीं घुमाया।
आज वह सिर्फ एक चीज चाहती थी—
सच।
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🌑 सीढ़ियों का मोड़ — पुराने कमरे की ओर
जैसे ही वह पुराने कमरे की ओर बढ़ी—
जहाँ सालों से कोई नहीं गया था—
दरवाज़ा खुद-ब-खुद “खर्र…” की आवाज़ से खुल गया।
निहारिका रुक गई।
उसने दरवाज़े के भीतर झाँका—
घना अंधेरा।
दीवारों से झूलती मकड़ी जालियाँ।
एक कोने में पुराना दर्पण, जो आधा टूटा हुआ था।
पर दर्पण में कुछ अजीब दिखा—
दर्पण में उसकी परछाई…
उससे अलग दिखाई दे रही थी।
उसकी परछाई के माथे पर लाल खून जैसा एक निशान था—
जिसे देखकर उसका दिल जोर से धड़का।
“ये… क्या…?”
उसने माथा छुआ।
कोई निशान नहीं।
फिर दर्पण में देखा—
वहाँ निशान था।
निहारिका ने फुसफुसाया—
“क्या तुम मुझे कुछ दिखाना चाहती हो?”
उसकी आवाज़ कमरे में गूँज गई।
अचानक दर्पण में एक हल्की सी आकृति उभरी—
जैसे कोई और रूप…
कोई और लड़की…
वही चेहरा, वही नज़रें, वही आँखे—
लेकिन माथे पर वही लाल निशान।
निहारिका सदमे में थी।
“ये मैं नहीं हूँ… फिर ये कौन है?”
आकृति ने होंठ हिलाए।
आवाज़ नहीं आई—
पर शब्द साफ दिखाई दिए—
“खून का रिश्ता… अधूरा नहीं।”
एक झटका जैसे कमरे में दौड़ गया।
दर्पण हिलने लगा।
काँच की सतह पर दरारें फैलने लगीं।
निहारिका घबराकर पीछे हट गई।
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🌪 इसी समय — अभिराज, सिया और आर्यन
अभिराज दीवार पर बने खून के निशान के पास खड़ा था।
उसकी आँखें किसी गहरी सोच में खोई थीं।
सिया ने उसके कंधे को हिलाया—
“हमें निहारिका को ढूँढना होगा! वह अकेली है और हवेली—”
अभिराज ने बात काटी—
“हवेली उसे रोकेगी नहीं।”
आर्यन चौंक गया।
“मतलब?”
अभिराज ने धीमे, भारी स्वर में कहा—
“हवेली… उसी की है।”
सिया और आर्यन दोनों स्तब्ध।
“तुम्हें ये कैसे पता?” — सिया ने पूछा।
अभिराज ने एक गहरी साँस ली।
“क्योंकि अधूरी किताब का पहला संकेत… हमेशा वारिस को ही मिलता है।”
सिया और आर्यन एक-दूसरे को देखते रह गए।
अभिराज तुरंत कमरे से बाहर भागा—
“वह पुराने हिस्से में गई होगी!”
और बाकी दोनों उसके पीछे।
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🩸 पुराना कमरा — दर्पण का सच
दर्पण से अब एक रोशनी फैल रही थी,
मानो किसी ने उसमें से एक दरवाजा खोल दिया हो।
निहारिका ने काँपते हुए हाथ बढ़ाया—
उसका दिल कह रहा था कि यही सच है…
यही जवाब है।
उसी पल कमरे में एक ठंडी हवा चली और उसके पीछे अभिराज आवाज़ लगाता हुआ आया—
“निहारिका!! पीछे हटो!”
वह चौंककर मुड़ी—
“अभिराज… ये देखो! ये दर्पण मुझे कुछ दिखा रहा है—”
अभिराज उसके पास पहुँचते हुए बोला—
“यह दर्पण नहीं…
यह तुम्हारी वंश परंपरा का पहला दरवाज़ा है।”
निहारिका के पैरों तले ज़मीन खिसक गई।
सिया और आर्यन भी अंदर आ चुके थे।
सिया ने डरते हुए कहा—
“अभिराज… उसमे कौन है? वह लड़की कौन है जो निहारिका जैसी दिखती है?”
अभिराज ने गंभीर आँखों से दर्पण की ओर देखा—
“वह… इस हवेली की पहली वारिस है।
और उसके खून से ही इस हवेली का श्राप शुरू हुआ था।”
निहारिका की रगों में ठंड उतर गई।
“मतलब… मेरा उससे क्या रिश्ता है?”
उससे पहले दर्पण में आकृति ने एक और शब्द लिखा—
“सच्चा वारिस वही…
जिसके माथे पर निरंतर खून का निशान लौटे।”
अगले ही पल—
दर्पण चमक उठा और रोशनी की एक तेज़ लहर निहारिका की ओर बढ़ी।
“नहीं!” — अभिराज चिल्लाया और उसे अपनी ओर खींच लिया।
लेकिन रोशनी ने उसका कंधा छू लिया।
एक तीखी जलन…
जैसे किसी ने आग से चिह्न बना दिया हो।
निहारिका ने दर्द से कराहते हुए कंधा पकड़ा—
और सबकी आंखें चौड़ी हो गईं…
क्योंकि उसके कंधे पर—
धीरे-धीरे वही लाल निशान उभर रहा था।
वही निशान… जो दर्पण में था।
सिया ने अविश्वास में कदम पीछे खींचे—
“हे भगवान… ये तो वही चिन्ह है!”
आर्यन बमुश्किल बोला—
“तो इसका मतलब… निहारिका ही… असली वारिस है।
और उसी के भीतर… वो वंश का खून है।”
निहारिका की आँखें आँसुओं से भर गईं—
“और यह निशान… क्यों दे रहा है मुझे?”
अभिराज की आवाज़ भारी हो गई—
“क्योंकि यह हवेली…
अब तुम्हें चुन चुकी है।”
कमरे की दीवारें ज़ोर से हिलने लगीं।
दर्पण में पूरी आकृति दिखाई देने लगी—
और उसकी आँखों से खून बह रहा था।
वह दरारों के बीच फँसी हुई थी,
मानो बाहर निकलने की कोशिश कर रही हो।
दर्पण पर शब्द उभरे—
**“वारिस का खून जाग चुका है।
अब पुराना पाप सामने आएगा…”**
कमरा ठंडा हो गया।
अंधेरा फैलने लगा।
अभिराज निहारिका का हाथ पकड़कर बोला—
“हवेली का सच… अब कोई नहीं रोक सकता।”
निहारिका की आवाज़ काँपते हुए निकली—
“और वह सच…
मेरे खून से ही शुरू क्यों होता है?”
दर्पण धीरे-धीरे लाल चमकने लगा—
लगा जैसे उसी से जवाब आए—
**“क्योंकि सबसे पहला पाप…
तुम्हारी ही नसों में बहता है।”**
सभी के चेहरे सफेद पड़ गए।
निहारिका की साँसें रुक-सी गईं।
और तभी—
दर्पण जोरदा
र आवाज़ से टूट गया।
काँच बिखरकर जमीन पर गिरा—
और उसके भीतर से एक पुरानी किताब बाहर गिरी।
अधूरी किताब।
जिसके पन्ने अब स्वयं खुलने लगे।
और पहला शब्द जिसने उभरकर कहानी को हिला दिया—
**“खून का वारिस…
कातिल भी वही होगा।”**
सबकी रूह काँप गई।