Lalit - The Master of Thikri - 1 in Hindi Thriller by salman khatik books and stories PDF | ललित - The Master of Thikri - 1

Featured Books
Categories
Share

ललित - The Master of Thikri - 1

पाठकों के लिए एक संदेश

         "कभी-कभी, जो काम सबसे मामूली लगता है, वही सबसे गहरी साजिशों से घिरा होता है।"

          आपके हाथों में जो किताब है, वह सिर्फ एक कहानी नहीं, बल्कि हकीकत के कड़वे और रोमांचक अनुभवों का दस्तावेज़ है। "ललित – द मास्टर ऑफ ठिकरी" सिर्फ एक नाम नहीं, बल्कि एक सफर है—एक ऐसे व्यक्ति का सफर, जिसने अपनी बुद्धिमत्ता, साहस और जज़्बे से खुद को अंधेरे के चंगुल से बाहर निकाला।

          यह कहानी ठिकरी नामक छोटे से शहर में बसे एक कोल्ड स्टोरेज की है। एक साधारण जगह, जहाँ हर सुबह मजदूरों की चहल-पहल होती, ट्रकों के हॉर्न गूंजते, और हर दिन का कारोबार एक तयशुदा नियमों के तहत चलता। लेकिन जब ललित वहाँ बतौर मैनेजर आया, तो उसे धीरे-धीरे एहसास हुआ कि यह जगह सिर्फ व्यापार का केंद्र नहीं थी—बल्कि यह रहस्यों की एक भूलभुलैया थी, जहाँ हर कोने में कोई न कोई साजिश पनप रही थी।

          ललित ने इस जगह में न सिर्फ प्रबंधन किया, बल्कि ऐसे-ऐसे अनुभवों से गुजरा, जिन्होंने उसकी ज़िंदगी हमेशा के लिए बदल दी। धोखे, चालबाज़ी, डर, और एक ऐसा सच जिसे जानने के बाद ज़िंदगी पहले जैसी नहीं रह सकती थी—यह सब उसने अपनी आँखों से देखा और झेला।

          यह किताब उन्हीं घटनाओं का एक दस्तावेज़ है।

          इसमें जो कुछ लिखा गया है, वह वास्तविक घटनाओं पर आधारित है। कुछ प्रसंगों को थोड़ा नाटकीय बनाया गया है ताकि रोमांच बना रहे, लेकिन सच यही है कि वे घटनाएँ घटी थीं। यह सिर्फ एक कहानी नहीं, बल्कि उन सच्चाइयों की परछाईं है, जिन्हें जानकर आप भी सोचने पर मजबूर हो जाएंगे कि हमारी दुनिया के परदे के पीछे क्या-क्या छिपा है।

          ललित की इस रोमांचक यात्रा में आपका स्वागत है। यह सिर्फ अतीत की दास्तान नहीं, बल्कि एक सबक भी है—क्योंकि कभी-कभी, जो बीत चुका होता है, वही हमें भविष्य की चुनौतियों का सामना करने की ताकत देता है।

          तो, क्या आप तैयार हैं इस रहस्यमयी सफर के लिए? दरवाजा खुल चुका है... अब भीतर झांकने की हिम्मत आपको खुद करनी होगी। 🚪🔥

लेखक- "सलमान"

◆◆◆◆◆◆◆◆◆◆◆◆◆◆◆◆◆◆◆◆◆◆

एपिसोड की शुरुआत.....

          कोल्ड स्टोरेज का माहौल हमेशा की तरह हलचल से भरा हुआ था। सुबह का समय था, और सभी हमाल (Carrier) अपने-अपने काम की शुरुआत करने के लिए तैयार खड़े थे। काम में तेजी लाने वाले ठेकेदार वीरेन भाई ने इधर-उधर देखा और अपनी चिंता जाहिर की, "नौ बज गए, ये ललित भाई अब तक आए नहीं क्या?" उनकी आवाज में अधीरता थी, लेकिन स्वभाव हमेशा की तरह मधुर और संयमित।

          वीरेन भाई की बातों से कामगारों को हमेशा हौसला मिलता था। वो ऐसे व्यक्ति थे, जो अपनी मुस्कान और मीठी बातों से हर किसी का दिल जीत लेते।

          तभी पीछे से मानसिंग अन्ना की आवाज गूंजी। "अरे सब लोग तैयार हो जाओ... ललित भाई आ रहे हैं!" मानसिंग अन्ना, जिनकी उम्र लगभग सत्तावन साल के आसपास थी, का व्यक्तित्व बेहद शांत और प्यारा था। हर कोई उन्हें स्नेहपूर्वक अन्ना कहकर पुकारता।

          कुछ ही पलों में सन्नाटा एक गूंज में बदल गया। ग्रे रंग की स्प्लेंडर बाइक पर एक दुबला-पतला व्यक्ति एंट्री करता है। उसकी आंखों पर काले फ्रेम का चश्मा, चेहरे पर गंभीरता और माथे पर चिंता की लकीरें साफ दिख रही थीं। यही थे ललित भाई, कोल्ड स्टोरेज के मैनेजर।

          ललित की कद-काठी बेहद साधारण थी—पांच फुट की ऊंचाई, हल्का गोरा रंग, और वजन मुश्किल से पचास किलो। लेकिन उनकी तेज-तर्रार जुबान का वजन ऐसा था कि बड़े से बड़े दबंग भी शांत हो जाएं। उनका चेहरा हमेशा तनाव से भरा रहता, और उनके मुंह से अक्सर यही निकलता—"सब बावन बावन हो गया!"

          बाइक रुकते ही उन्होंने चश्मा उतारा और ऑफिस की ओर बढ़ गए। पीछे से कामगारों में हलचल तेज हो गई।

          "चलो, अब ललित भाई आ गए हैं। जल्दी-जल्दी काम शुरू करो," अन्ना ने कहा।

          ललित भाई ने ऑफिस के अंदर कदम रखा, टेबल पर पड़ी फाइलों का ढेर देखा और गहरी सांस ली। उनकी आंखों में हर बार की तरह आज भी वही चिंता झलक रही थी।

          तभी बाहर से एक हमाल ने झिझकते हुए सवाल किया, "ललित भाई, अब कौन सा लॉट है?"

          ललित ने गुस्से से उसकी तरफ देखा और तीखी आवाज में कहा, "थोड़ा सब्र करो। कल वाला लॉट गाड़ी में ठीक से भरा या नहीं? पहले वो पूरा करो, फिर मैं दूसरे लॉट की पर्ची दूंगा। समझा?"

          उनकी बात सुनकर वह हमाल सिर हिलाता हुआ चुपचाप चला गया।

          कुछ देर बाद, वीरेन भाई ने पास आकर धीमे स्वर में कहा, "अरे ललित भाई, मैंने दो सौ कट्टे गाड़ी में डाल दिए हैं। अब कितने कट्टे और डालने हैं?"

          ललित ने झुंझलाते हुए कहा, "ये लो पर्ची। सौ कट्टे और डालो, फिर गाड़ी को काटा करने भेज देना। बाकी जब मैं कहूं, तभी दूसरा लॉट डालना। अब जाओ, मुझे काम करने दो।"

          वीरेन भाई उनकी झुंझलाहट को समझते हुए चुपचाप वहां से चले गए।

          ललित वापस ऑफिस में गए और अपनी टेबल पर रखे कंप्यूटर के पास बैठे। उनके माथे पर पसीने की बूंदें साफ दिख रही थीं। "सब बावन बावन हो गया। पता नहीं इस बिल की अमाउंट को कैसे मैच करू?" वो बड़बड़ाए। कुछ सोचकर उन्होंने अपने बॉस सोनू भाई को कॉल लगाया।

          फोन की घंटी बजते ही दूसरी तरफ से सोनू भाई की कड़क आवाज आई, "क्या है? अब क्या गड़बड़ कर दी?"

          ललित ने धीमे स्वर में कहा, "सोनू भाऊ, ये बिल का अमाउंट मैच नहीं हो रहा। क्या करूं?"

          सोनू ने गुस्से में कहा, "तुम्हें इतनी सी बात समझ नहीं आती? पुराने डेटा को डिलीट करो और नए सिरे से बिल बनाओ। इतनी छोटी-सी बात के लिए फोन किया?"

          "ठीक है, सोनू भाऊ। मैं वैसे ही करता हूं," कहकर ललित ने फोन रख दिया।

          उन्होंने कंप्यूटर स्क्रीन पर झुककर तेजी से काम करना शुरू किया। थोड़ी ही देर में बिल तैयार हो गया। उन्होंने उसका एक फोटो खींचकर सोनू भाई को भेज दिया।

          इस बीच, कोल्ड स्टोरेज का माहौल बेहद व्यस्त था। गाड़ियां लदी जा रही थीं, कामगार अपने-अपने काम में जुटे थे, और ललित अपने काम में तल्लीन थे। लेकिन उनके चेहरे की गंभीरता और उनके बड़बड़ाने का सिलसिला थमा नहीं।

          "सब बावन बावन हो गया।" यह वाक्य उनके साथ-साथ पूरे कोल्ड स्टोरेज का पर्याय बन गया था।

          ललित ने जैसे ही बिल का फोटो भेजा, उनकी आंखों में थोड़ी राहत झलकी। लेकिन तभी, ऑफिस के दरवाजे पर ज़ोरदार दस्तक हुई। ललित ने चौंककर सिर उठाया। दरवाजा धीरे-धीरे खुला और सामने एक अजनबी खड़ा था। लंबा कद, काले कपड़े, और चेहरे पर अजीब सी गंभीरता।

          "आप ललित हैं?" उस व्यक्ति ने शांत लेकिन डरावनी आवाज़ में पूछा।

          ललित ने हिचकिचाते हुए जवाब दिया, "हां... बोलिए, कौन हैं आप?"

          अजनबी ने एक पुरानी सी फाइल उनकी तरफ बढ़ाई और कहा, "ये देखिए... इसमें आपकी गलती की पूरी रिपोर्ट है।"

         ललित ने फाइल हाथ में ली और जैसे ही उसे खोला, उनके चेहरे का रंग उड़ गया। पन्नों पर कुछ ऐसी जानकारी थी, जो केवल उनके और सोनू भाई के बीच की थी।

          ललित ने कांपते हुए पूछा, "तुम... ये सब कैसे जानते हो?"

          अजनबी ने धीरे से मुस्कुराते हुए कहा, "ये तो सिर्फ शुरुआत है। असली खेल अभी बाकी है।"

          इसके पहले कि ललित कुछ और पूछ पाते, वह अजनबी बिना कुछ कहे मुड़कर चला गया। ललित ने बाहर झांककर देखने की कोशिश की, लेकिन वो व्यक्ति गायब हो चुका था।

          ललित का दिमाग घुमने लगा। उन्होंने फाइल को फिर से देखा। फाइल के आखिरी पन्ने पर लाल स्याही से लिखा था:

          "तुम्हारी हर चाल पर नजर है। तुम्हारा समय खत्म हो रहा है।"

          ललित ने पसीने से तर-बतर होते हुए अपनी कुर्सी का सहारा लिया और बड़बड़ाने लगे, "ये... ये सब क्या है? कौन कर रहा है ये सब? सब बावन बावन हो गया..."

          और तभी उनके फोन की घंटी बज उठी। स्क्रीन पर सोनू भाई का नाम चमक रहा था। लेकिन इस बार, ललित को फोन उठाने में डर लग रहा था।

          आखिर ये खेल कौन खेल रहा है, और ललित की जिंदगी में ये नया तूफान क्या लेकर आएगा?

◆◆◆◆◆◆◆◆◆◆◆◆◆◆

👉🏻"बावन बावन हो गया" तकिए कलाम का अर्थ होता है कि कोई चीज या स्थिति पूरी तरह से नियंत्रण से बाहर हो गई है, उलझनें इतनी बढ़ गई हैं कि उन्हें सुलझाना मुश्किल हो गया है। यह कहावत उस समय इस्तेमाल की जाती है जब हालात बेकाबू हो जाएं और समझ न आए कि किस दिशा में जाना सही होगा।

To be continue.....