हिमालय की गोद में बसे एक छोटे से गाँव में आदित्य नाम का एक युवक रहता था। आदित्य बहुत जिज्ञासु स्वभाव का था। उसे हमेशा जीवन का रहस्य जानने की तलाश रहती थी। वह सोचता, “मैं कौन हूँ? जीवन का उद्देश्य क्या है?” इन प्रश्नों के उत्तर उसे कहीं नहीं मिलते थे।
गाँव के लोग उसे समझाते, “जीवन का उद्देश्य तो परिवार पालना, खेती करना और भगवान का नाम लेना है।” लेकिन आदित्य का मन इन उत्तरों से तृप्त नहीं होता था। उसका मन हमेशा बेचैन रहता।
एक दिन गाँव में खबर आई कि पास के जंगल में एक महान संत आए हैं। लोग कहते थे कि वे ध्यान के बड़े ज्ञानी हैं और उनकी वाणी से अंधेरे मन में भी प्रकाश हो जाता है। यह सुनकर आदित्य का मन उत्साह से भर गया। उसने तय किया कि वह उस संत से अवश्य मिलेगा।
अगले दिन सुबह-सुबह वह जंगल की ओर निकल पड़ा। लंबे पेड़ों, पक्षियों की मधुर आवाज़ और ठंडी हवा के बीच आदित्य चलता जा रहा था। काफी दूर जाने के बाद उसने एक विशाल वटवृक्ष के नीचे एक संत को ध्यान में लीन देखा। उनके चेहरे पर अद्भुत शांति थी, मानो पूरी प्रकृति उनकी मौन उपस्थिति को प्रणाम कर रही हो।
आदित्य ने धीरे से जाकर उनके चरणों में प्रणाम किया। संत ने अपनी आँखें खोलीं और मुस्कुराते हुए बोले,“आओ पुत्र, किसलिए आए हो?”
आदित्य ने कहा,“गुरुदेव! मैं जीवन के रहस्य जानना चाहता हूँ। मैं जानना चाहता हूँ कि मैं कौन हूँ और मेरा उद्देश्य क्या है। मैं कितना भी प्रयास करता हूँ, मन में शांति नहीं मिलती। कृपया मुझे मार्ग दिखाइए।”
संत ने उसे ध्यान से देखा और बोले,“पुत्र, तुम वही खोज रहे हो जो हर आत्मा खोजती है। लेकिन उत्तर पाने के लिए पहले मन को स्थिर करना होगा। जब तक मन बाहर दौड़ता रहेगा, तब तक सत्य की झलक भी नहीं मिलेगी।"
उन्होंने आगे कहा,“सत्य का अनुभव शब्दों से नहीं, मौन से होता है। आओ, मैं तुम्हें एक अभ्यास देता हूँ।"
संत ने आदित्य को पास के नदी तट पर ले जाकर कहा,“देखो यह नदी कैसे बह रही है। यह रुकती नहीं, किसी से लड़ती नहीं, बस बहती जाती है। जीवन भी इसी नदी जैसा है। अगर तुम इसे रोकने की कोशिश करोगे, तो यह गंदा हो जाएगा। उसी तरह अगर मन को पकड़ने की कोशिश करोगे, तो वह और अशांत होगा। उसे बस देखने की आदत डालो।"
फिर संत ने उसे श्वास पर ध्यान देने का तरीका बताया और कहा,“हर सुबह और हर शाम इसे करो। विचार आएँगे, जाने दो। सिर्फ देखने वाले बनो। जब तुम देखने वाले बन जाओगे, तब जानोगे कि तुम विचार नहीं हो, तुम शरीर नहीं हो, तुम शुद्ध चेतना हो।”
आदित्य ने श्रद्धा से यह अभ्यास शुरू किया। पहले कुछ दिनों तक उसे बहुत कठिनाई हुई। मन बार-बार भाग जाता, कभी भविष्य में, कभी अतीत में। लेकिन वह हार नहीं माना। रोज़ नदी किनारे बैठकर संत के बताए अनुसार अभ्यास करता रहा।
कुछ हफ्तों बाद उसने अपने भीतर हल्का सा परिवर्तन महसूस किया। पहले जो विचारों का तूफ़ान रहता था, वह धीरे-धीरे शांत होने लगा। अब कभी-कभी उसके मन में गहरा मौन उतर आता था। उस मौन में उसे एक ऐसी शांति का अनुभव हुआ, जो उसने पहले कभी नहीं किया था।
एक दिन, जब वह ध्यान में बैठा था, अचानक उसे लगा कि उसके भीतर और बाहर का अंतर मिट गया है। हवा, पानी, पेड़, पक्षी—सब उसी का हिस्सा हैं। उसका ‘मैं’ जैसे पिघल गया और बस एक गहरी शांति, आनंद और प्रेम रह गया।
जब उसने आँखें खोलीं, तो पूरा जगत उसे नया-सा लगा। वही पेड़, वही नदी, वही आकाश—लेकिन अब वे उसे अलग नहीं लग रहे थे। मानो सबमें वही एक चेतना धड़क रही थी।
वह दौड़कर संत के पास गया और बोला,“गुरुदेव! मैंने आज कुछ अद्भुत अनुभव किया। मुझे लगा कि मैं सबमें हूँ और सब मुझमें। मुझे ऐसा लगा कि मैं यह शरीर नहीं, मैं तो बस साक्षी हूँ।"
संत मुस्कुराए और बोले,“पुत्र, यही सत्य है। तुम वही हो जो कभी न जन्म लेता है और न मरता है। शरीर मिट जाएगा, विचार मिट जाएँगे, लेकिन जो देख रहा है, जो अनुभव कर रहा है, वह सदा है। वही तुम्हारा वास्तविक स्वरूप है। उसी को आत्मा कहते हैं। और जब आत्मा को जान लिया, तब सृष्टि के हर कण में वही परमात्मा दिखता है।"
आदित्य की आँखों में आँसू थे, लेकिन ये आँसू खुशी के थे। उसे अपने प्रश्नों का उत्तर मिल गया था। उसने संत के चरणों में सिर झुका दिया और कहा,“गुरुदेव, आज से मेरा जीवन आपका है। आपने मुझे अमूल्य रत्न दे दिया।”
संत ने उसका आशीर्वाद देते हुए कहा,“पुत्र, यह रत्न तो हमेशा तुम्हारे पास था। मैंने तो बस धूल हटाई है। अब जाओ, और इस प्रकाश को अपने जीवन में फैलाओ। लोगों को प्रेम, करुणा और शांति का संदेश दो। यही तुम्हारा उद्देश्य है।”
उस दिन के बाद आदित्य गाँव लौटा, लेकिन अब वह पहले जैसा नहीं था। उसकी आँखों में गहरा संतोष था। उसने दूसरों को ध्यान और आत्मज्ञान का मार्ग दिखाना शुरू किया। लोग उसकी वाणी से प्रेरित होते और उसके पास बैठकर शांति का अनुभव करते।
वह जान चुका था कि जीवन का सबसे बड़ा रहस्य बाहर नहीं, भीतर छिपा है। और जब भीतर का दीपक जल उठता है, तो बाहर का अंधेरा अपने आप मिट जाता है।