Trishulgadh - 7 in Hindi Fiction Stories by Gxpii books and stories PDF | त्रिशूलगढ़: काल का अभिशाप - 7

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त्रिशूलगढ़: काल का अभिशाप - 7

पिछली बार:
अनिरुद्ध ने संज्ञा वन में अपनी कमज़ोरियों को स्वीकार कर लिया था और पहली बार अपने असली सामर्थ्य को पहचाना।
लेकिन अब उसके सामने दर्पण था  जिसमें कैद वही रहस्यमयी स्त्री दिखाई दी, जो शुरू से उसे पुकार रही थी।
भविष्य की परछाईं ने कहा था  अगर इसे तोड़ोगे तो रास्ता बदल जाएगा।



अब आगे:

जंगल की ठंडी हवा भारी हो गई थी।
अनिरुद्ध के सामने दर्पण चमक रहा था, उसमें उसकी ही परछाईं और उस स्त्री की थकी, डरी हुई आँखें झलक रही थीं।

मैं क्या करूँ उसने तलवार कसकर पकड़ी।
उसके भीतर द्वंद्व था।
दिल कह रहा था  तोड़ दे, उसे बचा ले।
दिमाग चिल्ला रहा था  ये जाल भी हो सकता है।

भविष्य की परछाईं उसके चारों तरफ घूम रही थी, उसकी आवाज़ हवा में गूँज रही थी।
"देख अनिरुद्ध… ये खेल है चुनाव का। अगर तूने दर्पण तोड़ा, तो तू कभी अपनी असली शक्ति तक नहीं पहुँच पाएगा।
और अगर तूने इसे छोड़ा तो शायद वो स्त्री हमेशा के लिए खो जाएगी।




दर्पण के भीतर की पुकार

अचानक दर्पण की सतह कांपी।
स्त्री ने अपने दोनों हाथ कांच पर रख दिए, जैसे उसे छूने की कोशिश कर रही हो।
उसकी आँखों से आँसू बह रहे थे।

अनिरुद्ध ने खुद से बुदबुदाया
तुम कौन हो क्यों मुझे पुकारती हो?

और तभी, चमत्कार हुआ।
दर्पण के भीतर से उसकी आवाज़ सुनाई दी 
मैं तेरी वंश की रक्षक हूँ। तेरा खून मुझे पुकारता है, अनिरुद्ध।
अगर तूने मुझे यहाँ से मुक्त न किया तो तेरा रास्ता अधूरा रह जाएगा।

अनिरुद्ध का दिल धड़क उठा।
वंश की रक्षक? तो ये मेरी माँ से जुड़ा कोई राज़ जानती है!"




निर्णय का क्षण

उसने तलवार उठाई।
भविष्य की परछाईं गरजी,
रुक एक बार दर्पण टूट गया, तो वापसी नहीं होगी।
तू उस रास्ते पर जाएगा, जहाँ हर कदम पर दर्द है। क्या तू इतना साहसी है?

अनिरुद्ध ने तलवार दर्पण पर तान दी।
उसकी साँसें भारी थीं।
शायद मैं साहसी नहीं हूँ।
पर अगर मैंने कोशिश ही न की, तो जीने का मतलब ही क्या है

उसने पूरी ताकत से तलवार दर्पण पर दे मारी।



दर्पण का टूटना

काँच चटकते ही पूरी ज़मीन हिल गई।
तेज़ रोशनी फैली, और हवा में हजारों चीखें गूँजने लगीं — मानो दर्पण के साथ कई आत्माएँ भी बंधी थीं।

अनिरुद्ध पीछे गिर पड़ा।
आँखें खोलीं तो देखा — वो स्त्री अब उसके सामने खड़ी थी।
उसकी देह से नीली आभा निकल रही थी, जैसे कोई देवी धरती पर उतरी हो।

उसने मुस्कुराकर कहा,
अनिरुद्ध तूने सही चुनाव किया।

अनिरुद्ध हक्का-बक्का रह गया।
आप कौन हैं?

वो बोली,
मैं अद्रिका हूँ — तेरे वंश की संरक्षिका। तेरी माँ की सबसे करीबी साथी।
तेरी माँ ने तुझे बचाने के लिए अपनी जान दी और मुझे यहाँ कैद कर दिया गया।
तुझे ढूँढते-ढूँढते, मैं इसी दर्पण में फँस गई।

अनिरुद्ध की आँखें भर आईं।
माँ सचमुच?

अद्रिका ने सिर झुकाया।
हाँ। और अब वक्त आ गया है कि तू उस सच्चाई को जाने, जिसे तेरे दुश्मन छुपाना चाहते हैं।




भविष्य की परछाईं की वापसी

लेकिन तभी, हवा फटने जैसी आवाज़ आई।
वो रहस्यमयी परछाईं फिर से प्रकट हो गई।
उसकी लाल आँखें अब और भी प्रचंड थीं।

तो तूने दर्पण तोड़ ही दिया वो गुर्राया।
अब तेरे लिए वापसी का कोई रास्ता नहीं है। तूने खुद ही अपनी बर्बादी चुनी है।

अनिरुद्ध ने तलवार संभाली।
शायद। लेकिन अब मैं अकेला नहीं हूँ।"

अद्रिका उसके पास खड़ी हो गई।
उसकी हथेली से नीली किरण निकली, जो अनिरुद्ध की अग्निशक्ति से मिल गई।
दोनों शक्तियाँ आपस में मिलते ही आसमान में एक गर्जना हुई — जैसे आकाश खुद गवाह बन गया हो।



Episode 7 Ending Hook

भविष्य की परछाईं ने अपनी चोगा फाड़कर एक असली रूप दिखाया।
उसका चेहरा अनिरुद्ध जैसा ही था बस ज़्यादा क्रूर, ज़्यादा निर्दयी।

अनिरुद्ध की आँखें फैल गईं।
ये ये तो मैं हूँ!

वो परछाईं हँसी।
हाँ। मैं ही तेरा वो रूप हूँ जो अगर अंधकार चुने, तो बनेगा।
अब फैसला तेरे हाथ में है, अनिरुद्ध।
या तो मुझे मिटा
या खुद को।



Hook:

अनिरुद्ध ने दर्पण तोड़कर अद्रिका को मुक्त कर लिया।
उसे अपनी माँ और अपने वंश के बारे में सच्चाई की झलक मिली।
लेकिन अब उसके सामने उसका सबसे बड़ा शत्रु खड़ा है — उसका ही अंधकारमय रूप।

क्या अनिरुद्ध अपने ही सबसे भयानक रूप का सामना कर पाएगा?
या उसकी किस्मत खुद उसके खिलाफ हो जाएगी?