Nehru Files in Hindi Anything by Rachel Abraham books and stories PDF | नेहरू फाइल्स - भूल-124-125

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नेहरू फाइल्स - भूल-124-125

भूल-124 
बोरदोलोई के प्रति दुर्व्यवहार 

गोपीनाथ बोरदोलोई और बोरदोलोई-नेहरू मन-मुटाव के बारे में अधिक जानने के लिए कृपया उपर्युक्त भूल#5, भूल#59 और भूल#111 पढ़ें। 

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बहुत से लोगों को इस बात का पता ही नहीं है कि अगर असम आज उस रूप में भारत का हिस्सा है, तो इसका श्रेय जाता है असम के पहले मुख्यमंत्री गोपीनाथ बोरदोलोई के साहसिक प्रयासों को, जिन्होंने मुसलिम लीग के असम और उत्तर-पूर्वी भारत के अन्य हिस्सों को पूर्वी पाकिस्तान (अब बँगलादेश) में मिलाने के प्रयासों के खिलाफ लड़ाई लड़ी। अगर बोरदोलोई कांग्रेस पार्टी की असम इकाई और महात्मा गांधी तथा असम की जनता के साथ मिलकर विद्रोह नहीं करते तो नेहरू के नेतृत्ववाली कांग्रेस ने तो राष्ट्रीय स्तर पर मुसलिम लीग की माँगों के आगे घुटने टेक ही दिए थे।
—संजय हजारिका ‘राइटिंग अ‍ॉन द वॉल’ (एस.एच/11) 
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असम की महान् शख्सियत गोपीनाथ बोरदोलोई को उनकी उपलब्धियों के बावजूद, जो अधिकांश भारतीय नेताओं के मुकाबले कहीं अधिक हैं, साथ ही उनके पास सरदार पटेल जैसी एक दूरदर्शिता भी थी, जिन्होंने विभिन्न भारतीय रियासती राज्यों का विलय कर भारतीय क्षेत्र को 40 प्रतिशत तक बढ़ा दिया था, बोरदोलोई ने भी असम और पूर्वोत्तर में भारत की भौगोलिक सीमा के विस्तार में मदद की और नेहरू तथा उनके राजवंश ने उन्हें ‘भारत रत्न’ से सम्मानित भी नहीं किया, जबकि उनसे बेहद कम योग्यतावालों को किया गया। क्यों? उन्होंने स्वतंत्रता से पहले नेहरू का विरोध किया और वह भी अच्छे कारण के लिए (असम को भारत में मिलाने के लिए) और इसी वजह से नेहरू तथा उनके राजवंश ने उन्हें ‘भारत रत्न’ से वंचित रखा। सन् 1999 में जब एक गैर- कांग्रेसी सरकार (वाजपेयी सरकार) ने देश की सत्ता सँभाली तो एक दिग्गज कांग्रेसी बोरदोलोई को वर्ष 1999 में मरणोपरांत ‘भारत रत्न’ से सम्मानित किया गया। 
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भूल-125 
जनरल थिमय्या के प्रति दुर्व्यवहार 

जनरल थिमय्या एक बेहद कुशल सैन्य अधिकारी थे। उनकी कई उपलब्धियों में से एक यह रही कि 1940 के दशक के अंत में हुए जम्मू-कश्मीर युद्ध में मेजर जनरल के रूप में थिमय्या अपने टैंकों को करीब 12,000 फीट की ऊँचाई पर बर्फ से ढके जोजिला दर्रे तक ले गए (इतिहास में बिल्कुल अनोखा, क्योंकि कोई भी दुर्गम परिस्थितियों और इतनी अधिक ऊँचाई तक टैंकों को लेकर नहीं गया था) और दुश्मन के बंकरों को तबाह करते हुए उन्हें खदेड़ दिया। (कृपया भूल#23 देखें) 

नेहरू राज में एक पेशेवर द्वारा सैन्य मामलों को एक नागरिक द्वारा सँभाले जाने को लेकर आपत्तियाँ उठाना उचित नहीं था। किसी भी स्वाभिमानी सैन्य अधिकारी ने भारतीय सेना से संबंधित मामलों में नेहरू या कृष्‍णा मेनन को सावधान करने का प्रयास ही नहीं किया—एक पेशेवर, स्पष्टवादी और ईमानदार होने का कोई फायदा नहीं था। आप जुबानी हमले और शिकार होने के डर के बिना सच नहीं बोल सकते। थल सेनाध्यक्ष जनरल थिमय्या ने यही गलती की और नतीजा भुगता। उन्होंने नेहरू के रक्षा मंत्री कृष्णा मेनन के अभद्र व्यवहार और बेहतर सैन्य तैयारियों को लेकर उनके द्वारा उठाई गई चिंताओं पर ध्यान न देने से आहत होकर 1 मई, 1959 को इस्तीफा दे दिया। हालाँकि, नेहरू किसी तरह से उन्हें इस शर्त पर अपना इस्तीफा वापस लेने के लिए मनाने में सफल रहे कि वे उनकी शिकायतों पर ध्यान देंगे। लेकिन थिमय्या द्वारा इस्तीफा वापस ले लिये जाने के बाद मेनन को सजा देने के या फिर थिमय्या द्वारा उठाए गए मुद्दों पर ध्यान देने के बजाय नेहरू ने संसद् में झूठ बोला कि थिमय्या ने ‘मामूली मुद्दों और बिना नतीजे वाले मुद्दों पर इस्तीफा दिया था, जो स्वभावगत संघर्ष का परिणाम थे।’ यह वजह हो ही नहीं सकती थी, क्योंकि थिमय्या एक पूर्ण अनुभवी पेशेवर, एक अनुशासित सिपाही तथा एक महान् देशभक्त थे। और यह कोई आश्चर्य की बात नहीं है कि जनरल थिमय्या का त्यागपत्र आज तक भी गोपनीय और रहस्यमय बना हुआ है। (ए.के.वी./एल-707) उस अपमान और दोहरे निरादर के बाद थिमय्या को नेहरू और मेनन को सबक सिखाने के लिए एक बार फिर अपने पद से इस्तीफा दे देना चाहिए था। 

आर.एन.पी. सिंह ने अपनी पुस्तक ‘नेहरू : ए ट्रबल्ड लीगेसी’ में लिखा— “नेहरू ने जनरल थिमय्या के इस्तीफे के मामले को जिस तरीके से सँभाला, उसने सशस्त्र बलों के अनुशासन और उनके आत्मसम्मान पर बेहद बुरा प्रभाव डाला।” (आर.एन.पी.एस.) 

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दुर्गा दास ने लिखा— “अगर प्रधानमंत्री थलसेनाध्यक्ष को नीचा दिखा रहे थे और उनका अपमान कर रहे थे तो वे शायद यह बात भूल रहे थे कि जनरल थिमय्या का इस्तीफा पूरी तरह से वैध कारणों पर टिका था, जो एक ऐसे समय में सेना के अनुशासन और दक्षता को देखते हुए पूरी तरह से प्रासंगिक था, जब देश की सीमाएँ खतरों का सामना कर रही थीं।” (डी.डी.) (यू.आर.एल.69) 
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“नेहरू सार्वजनिक तौर पर तो टिम्मी के प्रशंसक थे; हालाँकि, उनकी पीठ पीछे प्रधानमंत्री ऐसी रणनीति अपनाते थे, जो यह साबित करती थी कि वे थिमय्या को एक ऐसे प्रतिद्वंद्वी के रूप में देखते थे, जो उन्हें भारतीय गणराज्य के निर्विवाद प्रमुख के रूप में चुनौती दे सकते थे। द्वितीय विश्व युद्ध में जनरल थिमय्या के कारनामों को देखते हुए वे पहले और इकलौते ऐसे भारतीय अधिकारी थे, जिन्होंने अराकान में ब्रिगेड की कमान सँभाली तथा उन्हें ‘विशिष्ट सेवा सम्मान’ (डी.एस.ओ.) से सम्मानित किया गया। उनके द्वारा जम्मूव कश्मीर में निभाई गई भूमिका के चलते नेहरू इस बात से भलीभाँति परिचित थे कि वे उन्हें दबाव में नहीं ले सकते।” (एस.के.वी./एल-670) “थिमय्या के प्रति प्रधानमंत्री का रवैया सेना के साथ-साथ सेना प्रमुख के लिए भी हानिकारक था।” (एस.के.वी./एल-712) 

एम.के.के. नायर ने लिखा—
 “कृष्णा मेनन ने सैन्य परंपराओं का सम्मान नहीं किया। थलसेना प्रमुख जनरल थिमय्या एक बेहद सक्षम और बहुमुखी प्रतिभा के धनी थे। वे कश्मीर और दक्षिण कोरिया में शानदार सेवाओं के बाद जनरल बने थे। सेना में अनुशासन को बेहद सख्ती से अपनाने के बाद ही घनिष्ठता बन पाती है। आदेश जनरल के स्तर से जारी किए जाते हैं और पदानुक्रम के स्तरों द्वारा उनका पालन किया जाता है। किसी ने भी अनुचित तरीके से रैंक को नहीं तोड़ा। थिमय्या की अभिमानी प्रकृति ने उन्हें तानाशाह कृष्णा मेनन के साथ संघर्ष की स्थिति में ला खड़ा किया। उन दोनों के बीच की स्थितियाँ और अधिक तब बिगड़ गईं, जब कृष्णा मेनन ने सैन्य अनुशासन को तोड़ते हुए अपने पसंदीदा अधिकारियों से सीधे संपर्क करना शुरू कर दिया। आखिरकार, थिमय्या संयुक्त राष्ट्र की शांति सेना की कमान सँभालने को यूरोप चले गए और जनरल थापर, जिनके बारे में कृष्णा मेनन का मानना था कि वे उनके वफादार हैं, को जनरल बना दिया गया। मेनन ने ऐसा करने के लिए प्रतिभाशाली जनरल थोराट की वरिष्ठता को भी नजरअंदाज कर दिया, जिन्होंने विरोध- स्वरूप इस्तीफा दे दिया।” (एम.के.एन.) 

थिमय्या के सेवानिवृत्त होने पर मेनन और बी.एम. कौल-जूनियर के इशारे पर थापर को थलसेनाध्यक्ष (सी.ओ.ए.एस.) बनाया गया। लेकिन नेहरू और कृष्‍णा मेनन ने कौल की नहीं सुनी और न ही थोराट की, जिनके नाम की अनुशंसा थिमय्या ने की थी और जिनका कॅरियर कहीं अधिक शानदार रहा था। बाद में थापर ने बी.एम. कौल को चीफ अ‍ॉफ जनरल स्टाफ (सी.जी.एस.) बनाकर उनके इस अहसान का बदला चुकाया और ऐसा करने के क्रम में कई सक्षम अधिकारियों को नजरअंदाज किया गया। सैन्य पदानुक्रम में सी.जी.एस. का पद सी.ओ.ए.एस. के बिल्कुल बाद में आता है। सन् 1962 के भारत-चीन युद्ध में भारत का सिर झुकवाने में अन्यों के अलावा सबसे बड़ा हाथ थापर और बी.एम. कौल का ही था।