Nehru Files - 113 in Hindi Short Stories by Rachel Abraham books and stories PDF | नेहरू फाइल्स - भूल-113

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नेहरू फाइल्स - भूल-113

भूल-113
 नेहरू और नेताजी का चोरी किया गया युद्ध खजाना 

कोई भी स्वतंत्रता सेनानी नेताजी जितनी धनराशि नहीं इकट्ठा कर सका। उन्होंने पूर्ववर्ती ब्रिटिश उपनिवेशों में अपने जापानी सहयोगियों के कब्जेवाले करीब 20 लाख भारतीयों से देशभक्ति की अपील करते हुए निर्वासन में चल रही अपनी सरकार और आजाद हिंद फौज (आई.एन.ए.) के लिए चंदा माँगा। नेताजी के व्यक्तित्व, उनके भावनात्मक भाषण और भारतीय स्वतंत्रता के लिए उनकी प्रतिबद्धता ने प्रवासियों को झकझोरा। कई महिलाओं ने स्वतंत्रता के काम के लिए अपने सोने के आभूषण तक न्योछावर कर दिए। कहा जाता है कि हबीब साहब ने अपनी 1 करोड़ से भी अधिक मूल्य की संपत्ति भेंट कर दी और रंगून के एक व्यापारी एवं आई.एन.ए. के संग्रहकर्ता वी.के. चेलैया नादर ने आजाद हिंद बैंक में 42 करोड़ रुपए तथा सोने के 2,800 सिक्के जमा करवाए। 

रंगून, जहाँ पर आजाद हिंद बैंक का मुख्यालय स्थित था, के सन् 1945 में मित्र राष्ट्रों के कब्जे में चले जाने के बाद नेताजी 24 अप्रैल, 1945 को बैंकॉक चले गए और उस समय उनके साथ स्टील के बक्सों में मौजूद खजाना भी था, जिसमें सोने की छड़ें और आभूषण भी शामिल थे। जापान ने 15 अगस्त, 1945 को मित्र देशों के आगे हथियार डाल दिए और लगभग 40,000 सैनिकों वाली मजबूत आई.एन.ए. ने भी उनका अनुसरण किया। नेताजी 18 अगस्त, 1945 को अपने सहयोगी हबीबुर रहमान और आई.एन.ए. के खजाने के साथ साईगॉन से मंचूरिया जानेवाले बमवर्षक विमान में दाखिल हुए। विमान तथाकथित तौर पर ताइवान में दुर्घटनाग्रस्त हो गया। जापानी सेना ने दुर्घटना-स्थल पर मिले खजाने को आई.आई.एल. (इंडियन इंडिपेंडेंस लीग, जो नेताजी के अधीन आया था) के एस.ए. अय्यर और एम. राममूर्ति को सौंप दिया था। 

टोक्यो में बसे स्थानीय भारतीयों को इस बात का शक था कि एम. राममूर्ति और एम.एस. अय्यर ने मिलकर आई.एन.ए. के खजाने को हड़प लिया और इस बात के पर्याप्त परिस्थितिजन्य साक्ष्य मौजूद थे। पता नहीं क्यों, भारत ने उस खजाने को वापस पाने की दिशा में कोई प्रयास नहीं किया और एक जाँच आयोग नियुक्त करने या मूर्ति या अय्यर से पूछताछ करने के बजाय सरकार ने अय्यर को बॉॅम्बे राज्य में विज्ञापन निदेशक के रूप में स्थापित कर दिया, जबकि राममूर्ति टोक्यो में ही एक विलासिता भरा जीवन जीता रहा—चारों ओर फैली तबाही के बिल्कुल विपरीत। 

टोक्यो में भारतीय संपर्क मिशन के पहले प्रमुख सर बेनेगल रामाराव ने 4 दिसंबर, 1947 को भारत में प्रधानमंत्री नेहरू की अध्यक्षता वाले विदेश मंत्रालय को लिखा था कि राममूर्ति ने आई.एन.ए. के खजाने का गबन किया है। विदेश मंत्रालय ने असाधारण रूप से यह जवाब दिया कि आई.एन.ए. के खजाने में उसकी कोई दिलचस्पी नहीं है! ऐसा लगता है कि यह सिर्फ लापरवाही का मामला नहीं था, बल्कि इसके पीछे कुछ और था। 

वर्ष 1951-52 के दौरान टोक्यो मिशन/दूतावास का नेतृत्व करनेवाले के.के. चेत्तूर ने आई.एन.ए. के खजाने के दुरुपयोग के मामले को बेहद सख्ती से उठाया। (संयोग से जया जेटली चेत्तूर की बेटी हैं। उन्होंने इस संबंध में एक उत्कृष्ट, पढ़ने योग्य लेख ‘नेहरू स्नूप्ड : ट्रूथ बिहाइंड नेताजी फाइल्स’ लिखा है। (यू.आर.एल.67) सरकार ने इसके जवाब में एस.ए. अय्यर को एक गुप्त मिशन पर टोक्यो भेज दिया। उन्होंने यह कहते हुए राममूर्ति से कब्जा किए गए खजाने को लेने का सुझाव दिया कि वह उनके सुरक्षित कब्जे में है। चेत्तूर को शक था कि अय्यर और राममूर्ति ने मिलकर मामले को दबाने के लिए खजाने का कुछ भाग ही लौटाया था। उन्होंने 22 जून, 1951 को सरकार से इस पूरे मामले की गहराई से जाँच करवाने की सिफारिश की, लेकिन उसका भी कोई नतीजा नहीं निकला। भारतीय दूतावास ने अक्तूबर 1951 में राममूर्ति के घर पर आई.एन.ए. के खजाने के रूप में जो कुछ भी मिला, उसे कब्जे में ले लिया। उसे चुपचाप जापान से भारत लाया गया और नेहरू ने भी उसका निरीक्षण किया तथा कथित तौर पर एक भद्दी टिप्पणी की, “बहुत बुरा!” नेहरू ने सन् 1952 में संसद् में अय्यर की रिपोर्ट के हवाले से ताईपेई में हवाई दुर्घटना में नेताजी की मौत की पुष्टि की। अय्यर को बाद में पंचवर्षीय योजना का सलाहकार, एकीकृत प्रचार कार्यक्रम के रूप में नियुक्त किया गया। 

विदेश मंत्रालय के अवर सचिव आर.डी. साठे ने 1 नवंबर, 1951 को दो पन्नों का एक गुप्त नोट लिखा, जिसका शीर्षक था ‘आई.एन.ए. का खजाना और मेसर्स अय्यर ऐंड राममूर्ति द्वारा उसे सँभालना’ और उसमें आई.एन.ए. के खजाने के रहस्यमय तरीके से गायब हो जाने और इस काम में अय्यर-राममूर्ति की जोड़ी की संदिग्ध भूमिका से जुड़ी परिस्थितियों का जिक्र किया गया था; साथ ही बड़े हिस्से में से आंशिक वापसी ने और भी सवाल खड़े कर दिए थे। जवाहरलाल नेहरू ने 5 नवंबर, 1991 को इस नोट पर हस्ताक्षर कर दिए, लेकिन राव और चेत्तूर के पूर्व के नोटों की तरह नेहरू सरकार ने साठे के नोेट को भी फाइलों में दबा दिया। हालाँकि, मामला इतने पर ही खत्म नहीं हुआ। 

टोक्यो में भारत के राजदूत ए.के. धर ने सन् 1955 में विदेश मंत्रालय को चार पन्नों का एक नोट भेजा, जिसमें आई.एन.ए. के खजाने के रहस्यमय तरीके से गायब हो जाने की सार्वजनिक जाँच करवाने की माँग की गई थी। उनकी राय थी कि अगर सरकार को खजाना वापस भी नहीं मिलता है तो कम-से-कम दोषियों या फिर संभावित अपराधियों के नामों का तो पता चल जाएगा। उन्होंने आगे कहा कि इस मामले को लेकर सरकार की 10 साल लंबी उदासीनता ने न सिर्फ दोषियों को काफी हद तक बचने का रास्ता उपलब्ध करवाया है, बल्कि यह नेताजी के महान् कार्य और बलिदानों का अपमान भी है। यहाँ तक कि सन् 1956 में नेताजी के लापता होने की जाँच के लिए गठित की गई ‘शाह नवाज समिति’ ने भी नेताजी की निर्वासित सरकार की संपत्तियों और आई.एन.ए. के खजाने की जाँच की सिफारिश की थी। 

इसके बावजूद नेहरू ने कुछ नहीं किया! यह बात बेहद चौंकानेवाली है। यह कोई मामूली रकम नहीं थी। अगर पूरे खजाने को बरामद कर लिया गया होता तो आज की तारीख में उसकी कीमत कई सौ करोड़ रुपए होती। क्या नेहरू सरकार गबन करनेवालों को बचा रही थी? नेहरू सरकार ने एक संदिग्ध गबनकर्ता एस.ए. अय्यर को सरकारी सेवा में क्यों रखा; यहाँ तक कि एक गुप्त मिशन पर भी भेज दिया, जैसाकि ऊपर उल्लेख किया गया है? क्या नेताजी की मृत्यु की पुष्टि करने वाली अय्यर की रिपोर्ट अदला-बदली थी? क्या नेहरू को इस बात का डर था कि पकड़े जाने पर अय्यर-राममूर्ति की जोड़ी हवाई दुर्घटना में नेताजी की मौत की काल्पनिक कहानी से जुड़ा कोई बड़ा राज उगल देगी? इस विषय पर अनुजधर की पुस्‍तक ‘इंडियाज बिगेस्ट कवरअप’ वास्तव में पठनीय है।