6- मौन दीक्षा
सद्गुरु के लिए ऐक संस्कृत श्लोक है जिसका अर्थ है
सच्चे सद्गुरु के समक्ष जाने पर मुमुक्षु के सभी प्रश्नों का उत्तर बिना शिष्य के पूछे व बिना गुरू के बोले ही मिल जाता है
ऐसा ही कुछ महर्षि रमण के साथ था । प्रश्नकर्त्ताके प्रश्न महर्षि की ओर से बहती दिव्य शांति के प्रवाह मे प्रश्न गौण हो जाते थे ।
वे प्रश्न व उनके उत्तर निरर्थक लगते थे ।
समस्त प्रश्न मन के बनाऐ हुऐ हैं । उनके उत्तर भी मनोनिर्मित है ।
महर्षि की दीक्षा मौन होती थी । दक्षिणेश्वर शिव की दीक्षा मौन है |
वे किसी भक्त की ओर मौन होकर देखते और वह दिव्य धारा को अपनी ओर बहते अनुभव करता ।
7 गणपतमुनि को दिव्यग्यान
गणपत मुनि ऐक विख्यात संत व संस्कृत कवि थे।
वे वेदांत के ग्याता थे। वे ऐक उलझन मे धै। उन्होंने अनेक ग्रंथ पढ़ें ,अनेक साधुओं से चर्चा की.किंतु उनकी उलझन दूर नहीं हो रही थी।
तब वे विरूपाक्ष गुफा मे पहुंचे।
उन्होने महर्षि से पूछा ,भगवन.तप क्या है ?
महर्षि ने उत्तर दिया, मन को उसके स्रोत मे लीन करना तप है। मुनि ने और भी पृश्न पूछे ,सभी का सटीक व अनुभव जन्य उत्तर महर्षि ने दिया।
गणपत मुनि ने पृभावित होकर महर्षि को भगवान की उपाधि दी।
इसके बाद महर्षि भगवान रमण महर्षि कहलाने लगे।
8
जानवरों स प्यार
महर्षि को जानवरों समय बहुत प्रदेश म था । बंदर तब उन्हे अपना मित्र मानते थे ।
वे अपने झगड़े महर्षि समय सुलझाते थे । बदरो के छोटे बच्चे बड़े बंदरों से बचने के लिए इनकी गोद मे बैठे रहते थे ।
अजगर व विषैले इनके ऊपर से निकल जाते थे । अनेक गायें इनसे बड़ा प्यार करती थी ।
एक बार एक नाग एक भक्त की ओर बढ़ रहा था तभी उसे महर्षि ने आदेश दिया ,” रुक जाओ “” और वह रुक गया व दूसरी ओर जाने लगा |
इनके समीप मोर खेलते रहते थे । एक दूसरे के दुश्मन पशु पक्षी लड़ते नहीं थे|
9
पहला अंग्रेज भक्त
1911
सर हम्फ्रीज नामक अंग्रेज पुलिस आफीसर भारत मे नया नियुक्त हुआ था।
वह भारतीय अध्यात्म विद्या मे रुचि रखता था। वह तंत्र मंत्र की साधना करता था। उसका ट्रांसफर तिरूवन्नामलाई के समीप हो गया।
वह ऐक शिक्षक से संस्कृत सीखता था। उसे सपने मे ऐक गुफा मे ऐक संत ध्यानस्थ दिखाई देते थे।
उसने गुफा व संत की फोटो बनाकर शिक्षक को बतलाई। शिक्षक ने कहा ये महर्षि रमण हैं।
हम्फ्रीज शीघृता से अरूणाचल पर्वत पर महर्षि के दर्शन हेतु पहुंचा।
वहां उसे अत्यंत दिव्य अनुभव व शांति की अनुभूति हुई । महर्षि ने अंग्रेजी मे बात करके हम्फ्रीज को तंत्रमंत्र छोड़ने की सलाह दी।
उन्होंने हम्फ्रीज को ,मै कौन हूं? यह खोज करने की सलाह दी ।
उसनें अपने अनुभव विश्वपृसिद्ध रहस्यवाद की ऐक मैगजीन मे लिखे जिसै पढ़कर अनेक विदेशी भक्त महर्षि के दर्शनों के लिए आने लगे।
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ईसाई धर्म मे हिन्दू धर्म से मिलते उपदेश
कुछ भक्तों को महर्षि मे ही ईसामसीह के रूप मे दर्शन हुऐ । अनेक विदेशी भक्त उन्हें ईसामसीह का पुनर्जन्म मानते थे।
महर्षि ने जब घर छोडा तो जो शब्द ईसा ने कहे थे वही.
बालक रमण ने अपने घर वालों के लिए लिखे लेटर मे लिखे थे ,” मै अपने पिता की खोज मे जा रहा हूं । “
दोनों महापुरुषों मे पर्वत के प्रति आकर्षण था।
महर्षि वेदान्त को समझाने के लिए बाइबिल के कुछ वाक्य
उद्रथ करते थे जैसे “I and my father are one”
अर्थात मै व मेरे पिता ऐक हैं । यह.अहं ब्रम्हास्मि से पूरी तरह मेल खाता है।
“ किंगडम आफ हेवन इज विदिन यू “ स्वर्ग का साम्राज्य आपके अंदर है “।
“अयमात्मा ब्रम्ह” ,वेदवाक्य यही.कहता है ।
आदि अनेक उदाहरण दिऐ जा सकते हैं ।