N Dekha, N Suna - 1 in Hindi Fiction Stories by Brijmohan sharma books and stories PDF | न देखा, न सुना - 1

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न देखा, न सुना - 1

भूमिका

मेरी आयु 80 पार हो चुकी है | मै अपनी आयु के अंतिम आयुखंड मे हूँ |

मुझे नाम यश या धन मे रुचि नहीं है | ऐसे मे मेने अपने सबसे प्रिय विषय मेरे सद्गुरुदेव रमण महर्षि की जीवनी से लोगों का परिचय कराना चाहता हूँ | मै बचपन से अध्यात्म मे रुचि रखता हूँ |

अतः मै एसे गुरु की तलाश मे था जो सिद्ध हो व मुझे दिव्य अनुभव करा सके |

धर्म की कथा कहानिया व भजन सुनाने वाले तो लाखो लोग मिल जाएगे किन्तु परमात्मा की दिव्यअनुभूति करने वाला लाखो करोड़ों मे कोई एक महापुरुष मिलता है | धर्म की दुनिया नकली गुरुओं से भरी हुई है |

जब एक दिन मैंने महर्षि रमण के विषय मे पढ़ा तो अचानक मुझे लगा मेरी अध्यात्म की खोज पूरी हुई |

16 वर्ष की मासूम आयु मे एक बालक जिसकी कोई विशेष धार्मिक प्रष्ठभूमि नहीं थी , उसे ऐक दिन अचानक म्रत्यु के भय ने घेर लिया | पहले तो वह बहुत भयभीत हुआ किन्तु उसने अपने शरीर की म्रत्यु का शुक्ष्म निरीक्षण किया और वह  अध्यात्म की सर्वोच्च दिव्य अवस्था समाधी मे लीन हो गया | वह ऐक स्धान पर बिना हिले डुलै घंटों पृस्तरवत् बैठा रहता ।

उस मासूम को शैतान बच्चे बड़े बड़े पत्थर मारते । तब वह शिवमंदिर के अंधेरे गर्भगृह मे चला गया जहां विषैले कीड़ों ने काट काट कर उसके पूरे शरीर मे घाव कर दिऐ। बड़ी मुश्किल से ऐक साधू ने उसे जबरन खाना खिलाकर उसकी.प्राणरक्षा की।

मै महर्षि की महादिव्य अवस्था से बहुत अभिभूत हूं |

यह पुष्पांजलि महर्षि के श्री चरणों मे मेरी भेंट है

महर्षि की चरणरज

बृजमोहन शर्मा  791 सुदामनगर इंदौर (म.पृ.) 452009  मो  9424051923

 

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रमण का जन्म

 

30 दिसेम्बर 1879 को मदुरई के निकट तिरुचली गांव मे बालक व्यंकट रमण का जन्म हुआ | उस दिन ऐक भव्य शिव महोत्सव मनाया जा रहा था।

बचपन से ये कोई विशेष धार्मिक बालक नहीं थे | इनमें अध्यात्म के कोई विशेष लक्षण नहीं थे। ये खेलकुद के शौकीन थे | इनकी माता एक बड़ी धार्मिक महिला थी | ये जब छोटे थे  तभी इनके पिता का देहांत हो गया था |

फिर ये अपने चाचा के घर मदुरई मे आ गए और वहां अंग्रेजी स्कूल मे इनका विद्याध्ययन जारी रहा | सिर्फ विशेष बात यह थी कि ये जब सोते तो इन्हें दीन दुनिया की कोई खबर नही होती । रमण के दुश्मनों को जब उससे बदला लेना होता तो वे उसके सोने का इंतजार करते और नींद मे उसे खूब पीटते और दूर फेंक आते । किंतु बालक रमण को कुछ भी पता न चलता ।

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ऐक दिन  …

बालक व्यंकट रमण को अचानक लगा कि वह मरने वाला है । उसे भयानक मृत्यु भय ने घेर लिया । वह बहुत डर गया । फिर उसने धैर्य रखकर अपनी मृत्यु का गहन निरीक्षण किया। उसने अपने ऐक ऐक अंग को मरते हुए देखा। तभी वह अध्यात्म की सर्वोच्च दिव्य अवस्था समाधि मे पृवेश कर गया। वह परम आनंद व  शांति की ब्रम्हलीन अवस्था मे रहने लगा । अब उसे संसार मे कुछ अच्छा नही लगता। ऐक दिन वह घर से भागकर अनेक कठिनाइयों का सामना करते हुऐ,भूखा प्यासा  तिरूवन्नामलाई के अरूणेचलेश्वर मंदिर के अहाते मे शरीर मन से परे दिव्य समाधि मे लीन होकर बैठ गया। घर छोड़ने के पूर्व वह ऐक लेटर छोड़ गया कि उसकी खोज न की जाऐ । वह अपने पिता की खोज करने जा रहा है।

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न देखा न सुना न पढ़ा पहले कहीं

वह 16 वर्ष का मासूम बच्चा तिरूवन्नामलाई के पृसिद्ध

शिव मंदिर के अहाते मे पत्थर की अविचलित मूर्ति के समान

बिना तनिक हिले डूले बैठा रहता था । भक्त आते ,उस पर ऐक नजर डालकर बिना ध्यान दिऐ आगे बढ़ जाते। आसपास के शैतान बच्चे उसे पागल समझ उस पर बड़े बड़ै पत्धर फेंकते किंतु वह बिना पृत्युत्तर दिऐ उनकी मार सहता रहता । पत्थरों की मार से

उसके शरीर पर घाव हो गए | फिर वह पत्थरों की मार से बचने के लिए शिव मंदिर के गर्भगृह मे चला गया । वहां अंधेरा रहता था । उसे न भूख ,न प्यास की खबर थी ।

वह शरीर मन से परे दिव्य ध्यान. मे लीन था । विषैले कीड़ों ने उसके पूरे शरीर पर डेरा जमा लिया था। कीड़ों ने पूरे शरीर पर बड़ै बड़ै घाव कर दिऐ थे। उस बालक को याद ही नहीं रहता कि कब दिन निकला या रात हुई।

तब ऐक दिन ऐक साधूने उसकी उच्च अवस्था को पहचान कर उनकी सेवा करके उनके शरीर के प्राण बचाऐ ।

 

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निरंतर समाधि

ऐक महात्मा ने बालक रमण को समीप के ऐक मंदिर मे शिफ्ट कर दिया । वे दिनरात समाधि मे डूबे रहते । उन्हें न दिन का, न रात का पता होता । वे न प्यास न भूख की चिंता करते । जो कोई कुछ दे देता उसे खड़े खड़े गटक लेते |

कोई एक  साधू ही उनके शरीर की रक्षा करता ।

अब उनकी पृसिद्धी चारों और फैल चुकी थी। लोग उनके दर्शन के लिऐ उमड़ने लगे। उन्हे भीड़ से बचाने के लिए अतिरिक्त कोशिश करना पड़ती । दिन प्रतिदिन की भीड़ से बचने के लिए वे अरूणाचल पर्वत की ऐक गुफा विरूपाक्ष गुफा मे रहने लगे । यह गुफा बहुत ऊंचाई पर थी व सामान्य लोगों की पहुंच से दूर थी।

 

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अपूर्व शांति

महर्षि विरूपाक्ष गुफा मे ध्यान मग्न रहते थे। गुफा के अंदर ऐक पुरातन योगी की कब्र थी । अंदर ठंडक थी। पास मे पानी का स्रोत था। कोई ऐक भक्त भोजन की व्यवस्था कर देता था । इस गुफा के चारों ओर शेर चीते अजगर नाग व अन्य विषैले पशु घूमते रहते थे। इतनी ऊंचाई पर सामान्य लोग  वहां तक कम पहुंच पाते थे किंतु छोटे बच्चे उछलकूद करते हुए वहां पहुंच जाते थे । वहां की शांति से पृभावित वे वहाँ शांत भाव से बैठे रहते । गुफा के आसपास महर्षि के प्रभाव से ऐक दूसरे के दुश्मन प्राणी आपसी बैरभाव भूलकर ऐक दूसरे पर बिना आक्रमण किऐ घूमते रहते।