अरे फरीदा, जल्दी करो, कबसे यह बदल गरज रहे है। अगर बारिश हो गई तो यूं सूट टाई पहनकर मुझे घर में ही घूमना पड़ेगा। ट्रैफिक में फंसकर अगर देर हो गई तो मोहतरमा, मै तो पहली मुलाकात में ही आउट हो जाऊंगा।आखिर फर्स्ट इंप्रेशन तो बढ़िया होना चाहिए।" साजिद ने इत्र छिड़कते हुए अपनी बेगम फरीदा से कहा।
" जी , मुझे लगता है , मै वहां आकर क्या करूंगी? आपके दफ्तर के लोग है। नए बॉस है। अगर मेरा आना जरूरी न हो तो क्या मैं घर पर ही ठहर जाऊं?" फरीदा ने बुझे स्वर में पूछा। यह सुनते साजिद झल्ला उठा, " ऑफ ओ, फरीदा , फिर वही बात , बीवियां तो शौहर के साथ घूमने जाने के लिए जिद करती है, और एक तुम हो कि तुम्हे मेरे साथ कहीं आना नहीं होता। क्या मैं तुम्हे पसंद नहीं? आज हमारे निकाह को करीब नौ महीने हो चुके है और मैने इन नौ महीनों में तुम्हे कभी खुश नहीं देखा। कभी दिल खोलकर मुझसे बात नहीं करती। क्यों ऐसी बेजान सी हो तुम? आखिर मेरी क्या गलती है ? " साजिद रूआंसा हो गया। "नहीं नहीं ऐसी कोई बात नहीं। भला आपसे क्यों कोई गलती होगी। मै तो बस इसीलिए मना कर रही थी क्योंकि मैं वहां किसीको जानती भी तो नहीं।" फरीदा ने बात को सम्हाल लेना उचित समझा।
"अरे, मेरी जान नए बॉस यानी "आनंद बाबू "को तो हमने भी नहीं देखा। बस उनकी तारीफें सुनी है। साजिद ने तुरंत फरीदा को मानो फुसला रहा हो उस अंदाज में कहा। पर " आनंद" नाम सुनते ही फरीदा कुछ चौंक सी गई। साजिद ने कहा, " श्रीवास्तव जी ने आनंद बाबू के साथ लखनऊ में काम किया है। वे कह रहे थे आनंद बाबू बड़े खुशमिजाज इंसान है। यूं पढ़ाई में होनहार होने के साथ गाते भी बहुत अच्छा है।पर समय के पाबंद है। देर उन्हें पसंद नहीं। अब उनके स्वागत में पार्टी रखी है तो चलके मिल लेते है, तुम्हारे ही शहर से है, देखलो शायद तुम्हारी भी कोई पहचान निकल आए। पराए प्रदेश में जब कोई अपने शहर का मिल जाए तो उससे रिश्ते अपनेआप गहरे हो जाते है।" साजिद ने फरीदा को समझाते हुए कहा।
आखिर बेमन से फरीदा साजिद के साथ गाड़ी में आनंद से मिलने चल दी।" आनंद " यह नाम बार बार उसके मन में गूंज रहा था। रह रह कर एक ही बात उसके जहन में आती थी के "काश , मै कुछ कह पाती जुबां बहुत कुछ कहना चाहती थी पर लब मानो उसके दुश्मन हो खुलतेही न थे। दिल की बात दिल में दबाकर रखने से फरीदा को हर वक़्त एक घुटन सी होती थी। धीरे धीरे वह बेजान पुतली सी बनने लगी थी।
आसमान में काले बादल अब भी छाएं थे। रह रह कर गरज रहे थे। आवाज तो ऐसी मानो कोई सैलाब आने वाला हो। पर पता नहीं क्यों सिर्फ गरज रहे थे बरसने को तैयार न थे।कुछ कुछ फरीदा की आंखों में उठे सैलाब का भी यही अंदाज था। आँखें भरी तो थी पर छलक नहीं पाती थी। साजिद ने गाड़ी की रफ्तार तेज कर दी। फरीदा का दिल बार बार उससे कह रहा था हो न हो यह वही "आनंद" है। उसका "आनंद"।
साजिद और फरीदा सही समय पर होटल पहुंच गए। आनंद बाबू अभी अभी ही आए थे। सभी से मेल मिलाप व उनकी जान पहचान कराई जा रही थी। फरीदा का दिल जोर से धड़क रहा था वहीं कद काठी , वही सफारी सूट दूर से ही फरीदा उसके "अपने आनंद "को पहचान गई थी। आनंद ने पलटकर देखा , दोनों की आँखें मिली, आनंद बाबू हल्का सा मुस्कुरा दिए। फरीदा की आँखें डबडबा आई। आंखों में आए ज्वार भाटा को उसने मुश्किल से रोका। और वह सजिद के साथ आगे बढ़ी। साजिद भी आनंद बाबू से मिला और फरीदा की और देखकर कहा ," यह हमारी बेगम साहिबा" आनंद ने फरीदा की ओर देखा और बहुत ही गरिमापूर्ण तरीके से उसका अभिवादन किया।
फिर यूंही पार्टी चलती रही। आनंद ने सभीको बहुत हंसाया, गाना भी गाया। सभी आनंद के इस मित्रतापूर्ण व्यवहार से बहुत खुश थे , सब जल्द ही उससे घुल मिल गए। बस एक फरीदा ही थी जो भरी महफिल में अकेली , उदास सी खड़ी थी , मानो दिल में कोई बोझ लिए जी रही हो।
जब सब इधर उधर की बातों में व्यस्त थे , साजिद भी अपने दोस्तों के साथ किसी राजनैतिक चर्चा में शामिल था, आनंद धीरे से उस समूह से हटकर दूर कॉरिडोर में अकेले खड़ी , हाथ में जूस का गिलास लिए भरी आंखों से घने बादलों को ताकती फरीदा के पास पहुंच गया। उसने पीछेसे आवाज दी," क्यों इतनी गुमसुम हो फरीदा?" फरीदा ने मुड़ते हुए चौंक कर आनंद को देखा।" हां, मै अब भी तुम्हारी आँखें पढ़ पाता हूं, तुम्हारी खामोशी समझ पाता हूं। "आनंद ने कहा। " आनंद , थिरकते लफ्जों से फरीदा ने उसका नाम लिया। " क्य तुम मुझे कभी माफ कर पाओगे? तुमसे प्यार तो खूब किया, खुदा जानता है पूरी शिद्दत से किया, पर उसे निभा नहीं पाई इस बात का बोझ मुझे खाए जा रहा है। " फरीदा मुश्किल से बोल पाई।" हो सके तो मुझे माफ कर देना" फरीदा का गला भर आया।
" माफी किस बात की फरीदा ? जब तुम्हारी कोई गलती ही नहीं है। मै तुम्हारी मजबूरी समझ गया था। तुम उस दिन नहीं आई, देर होते होते इतनी देर करदी ।हां ,पहले जरा गुस्सा आने लगा था पर तभी तुम्हारा मासूम चेहरा याद आया , मै जान गया के तुम हमारे अलग अलग धर्म , मान्यताओं की दीवार तोड़ नहीं पाई। मेरे प्यार से ज्यादा तुमने अपने मातापिता के मान_सम्मान को महत्त्व दिया। और ऐसा करना न करना यह बिल्कुल तुम्हारा हक है। इसमें मुझे बुरा लगने का कोई अधिकार नहीं। प्यार अपनी जगह है,और रिश्ते अपनी जगह । नए रिश्ते बनाने के लिए पुराने रिश्ते कुचले नहीं जाते । हमारा प्यार अमर है, हम साथ नहीं तो क्या? हमारी वजह से कोई आज दुखी तो नहीं। और अगर मै ही तुम्हे समझ न पाया तो मैने क्या खाक प्यार किया। फरीदा सचमे मेरे दिल में तुम्हारे लिए कोई मलाल नहीं ।मै बस तुम्हे खुश देखना चाहता हूं। तुम्हारी यह उदासी अब मेरे दिल में बोझ बन रही है। तुम खुशी खुशी साजिद के साथ अपना जीवन बिताओ और मैं सपना के साथ। हमारा प्यार स्वार्थ से परे है। चलो ,बहुत देर से बाहर अकेले खड़ी हो अब अंदर चलो, साजिद को तुम्हारे साथ की जरूरत है, अभी और पूरी जिंदगी।" आनंद ने सारी बात खुलकर कह दी।
तभी कड़ाके की बिजली चमकी ,बूंद बंद छलक कर पलभरमे तेज बारिश होने लगी। और कबसे रोक कर रखे हुए फरीदा के आंसू धुंआधार बारिश की तरह बरस पड़े।
अब बारिश और आंसू दोनों बह गए । आसमान खुल गया ।और मानो फरीदा के दिल का बोझ हठ गया।