खेल खेल में - जादूई
(पार्ट -३)
शुभ को जंगल में एक खूबसूरत युवती दिखाई देती है।
वह महिला शुभ को देखकर मोहित हो जाती है।
वह युवती कहती है कि वह इस जंगल की रानी है।
वह उससे शादी का प्रस्ताव करती है ।।
लेकिन शुभ को इस जंगल से बाहर निकलना था।
इस जादुई जंगल में रहना नहीं था। उसकी उम्र बढ़ रही थी।
शुभ ने शादी से मना कर दिया।
यह सुनने के बाद, युवती को गुस्सा आता है।
वह अपना रूप बदलती है।
अब डार्क -लुकिंग ब्लैक ओल्ड बुढ़िया बन जाती है। जिनकी वेशभूषा विचित्र प्रकार की दिखीं।
बुढ़िया को देखकर शुभ को याद आ गया कि यह तो वही बुढ़िया है जिसके पास से मैंने जादूई किताब खरीदीं थी।
बुढ़िया ने कहा: "मैं इस जंगल की जादूगरनी हूं। आप मेरे नियंत्रण में हैं। यह जंगल मेरा है। तुम मेरी बातें मान लो तो जिंदा बचोगे वर्ना इस जंगल में मर जाओगे। मैं खुशी खुशी मना रही हूं। तुम खूबसूरत हो मुझे अच्छे लगने लगे हो।
शुभ को जादूगरनी नियत मालूम हो गई।
उसने सोचा कि क्या किया जाए।
उसे बौना याद आ गया। जिसने लड़की का नोकीला हथियार दिया था।
वह निकाला
और जोर से उस जादूगरनी की तरफ़ फेंका
निशाना सही निकला
वह गिल्ली जैसा दिखने वाला लड़की का नोकीला भाग सिर पर लग गया। जादूगरनी के सिर पर खून बहता है और चिल्लाने लगी।
शुभ के मुख पर स्माइल आ गई और
वहां से आगे चलने लगा।
चलते-चलते अब उनकी उम्र तीन गुना हो गई।
अब उससे चला नहीं जा रहा था।
तभी उसने एक छोटी लड़की को देखा।
शुभ को आश्चर्य हुआ,इस जंगल में परी जैसी दिखने वाली छोटी लड़की कहां से आ गई?
तभी वह परी जैसी छोटी लड़की शुभ के पास आ गई।
आकर बोलती है:-"पिताजी, आप इस उम्र में कहाँ घुमतेरहते हो ? यह घना जंगल है।आप के साथ कुछ भी हो जायेगा तो आप अक्सर घर को भूल जाते हैं। इस जंगल में आप चलकर थक गए हैं .. अब घर चलो। माँ आपको याद करतीहै।"
शुभ, "बेबी, मैं तुम्हें नहीं जानता। लेकिन तुम कौन हो? मैंने शादी भी नहीं की है। तो तुम कौन हो?"
बच्चे ने कहा:-"लो... पिताजी .. आप मुझे जानते नहीं!मुझे पता था .. आप सब कुछ भूल जायेंगे .. क्या हम इस जंगल से बाहर निकलना चाहते हैं? चलो मेरे साथ .."
"अरे बेबी मैं तुम्हें नहीं जानता? तुम इस जंगल से बाहर निकलने में क्या मदद कर सकती हो?"
बच्ची:-.. पिताजी..आप अपनी लड़की को नहीं जानते! कितनी बार कहा है कि मेरा नाम स्नेहा है। आपकी लाड़ली हूं।... लगता है कि आप थक गए हो.. आप का हाथ कांपता है।अब अपना हाथ मुझे दो मैं आपको घर ले जा रही हूं।.. पिताजी आप मम्मी से डरते हो? मैं हूं आप के साथ में।इस जंगल में ... आप बहादुर बेटी के बहादुर पिता हैं। यदि आप माँ को देखेंगे तो आपको सब कुछ याद आ जायेगा।.. और आप पूरे दिन कहां घुमते रहे?. आप तो सारा दिन गुनगुनाते रहते हो मम्मी को देखकर.. गुम है किसी के प्यार में...मुझे और मम्मी को प्यार करते हो। तो आपने माँ को छोड़कर क्यूं चले गये थे? आप के बिना मेरा जी नहीं लगता।"
शुभ को लगा कि मैं बुढ़ा होता जा रहा हूं। मुझे सहारे की जरूरत है ।हमें इस बुढ़ापे में मदद लेनी होगी। इस बच्ची की माँ कौन है? शायद यह मददगार है .. तो चलो इस प्यारे बच्चे के साथ ..
शुभ स्नेहा के साथ जाता है। उछलती हुई कूदकर एक छोटी सी झोपड़ी के पास आती है।
और जोर से आवाज करती है।
"माँ..ओ माँ .."
लेकिन कोई आवाज नहीं आती।
स्नेहा बुदबुदाती है .. अब इस उम्र में सुना जाने की संभावना कम है।
स्नेहा झोपड़ी में जाती है।
कुछ ही मिनटों में स्नेहा के साथ क बूढ़ी औरत बाहर आती है।
"ले लो .. माँ .. पिताजी का पाता चल गया।और पापा का हाथ पकड़कर रखना।उनका अच्छी तरहसे खयाल रखना।.. मैं थक चुकी हूं। इस उम्र में मुझे खेलना चाहिए। मम्मी आप पापा से फिर से मत झगड़ा करना।"
शुभ उस बुढ़ी औरत को देखकर चौंक जाता है।
( क्या सचमुच शुभ बुढी औरत को पहचानता है? वह बुढ़ी औरत भी पहचान पायेंगी? और उसके बाद क्या होगा? शुभ कैसे जादूई खेल से वापस आ जायेगा? पढ़िए मेरी कहानी)
- कौशिक दवे