हरिसिंह हरीश की कुछ और रचनाएं व समीक्षा 3
दर्द की सीढ़ियां (ग़ज़ल संग्रह)
हरि सिंह हरीश अपनी युवावस्था के समय से ही लिखने के प्रति बड़े समर्पित रहे हैं। वह कहते थे कि जब वह छठवें क्लास में पढ़ रहे थे तो होमवर्क की कॉपियों पर उपन्यास लिखने लगे थे। दरअसल उन्हें कुशवाहा कांत के उपन्यास पढ़ने का बड़ा शौक था । वे मुरार ग्वालियर में रहते थे और वहां की लाइब्रेरी से किताबें निकालकर खूब पढ़ते थे ।वे जिस मिल के कैंपस में निवास करते थे,उस मिल के मालिक ने भी लाइब्रेरी में अपने खाते से हरीश जी को किताबें निकालने की सुविधा प्रदान कर दी थी । तो एक छोटे से बच्चे में लिखने की इतनी ललक इस कारण पैदा हुई कि वह पढ़ते भी बहुत थे। यह अलग बात है कि पढ़ने उन्हें उतनी कलात्मक ऊंचाई नहीं सिखा पाया, हां नियमित लिखने की प्रेरणा दे गया। वे चाहते थे कि जैसी किताबें लाइब्रेरी में रखी रहती थी, उनकी रखी जाए। बस इसी इच्छा से उन्होंने लिखना शुरू किया। वे अध्यापक रहे पर ड्यूटी से आके नियमित रोज एक न एक रचना लिखते थे, गीत लिखते थे, गजल लिखते थे या मुक्तक लिखते थे, उपन्यास भी लिखते थे। उनके लिखे 40 उपन्यास अप्रकाशित रह गए ।उनके लिखे 10000 गीतों में मुश्किल से 500 भी छप पाए। उनकी 15000 गजलों में मुश्किल से ढाई तीन सौ ही गजल छपिया होगी। मुक्तक तो छपे ही नहीं अब इस पर दुख मनाया नहीं जाना चाहिए, क्योंकि प्रकाशक वही छापेगा जो पाठक मांगेगा छोटे प्रकाशक तो सदा ही अपनी छापी हुई सारी प्रतियाँ लेखक या कवि को ही सौंप देने चाहते हैं, वे ही बेच दें, वे ही बाजार में भेजें । वही लाइब्रेरी में भेजें ।तो हरि सिंह हरि ज्यादा नहीं छपे।
हां फिर भी उनके उनका एक उपन्यास कली भँवरे और कांटे छाप और मन के गीत नमन के अक्षर भजन संग्रह तथा लगभग 10 अन्य किताबें छपी, जिनमे 6 गीत संग्रह और गजल संग्रह भी कहे जा सकते हैं । भले ही वे काव्यशास्त्र के सिद्धांत पर गीत के मानक पर पूरे ना उतरते हो,ग़ज़ल के मानक पर बहुत बड़े ना हो और गजल के चंद्र शास्त्र पर तो वे कतई गजल न हों। लाख ग़ज़ल ना कहलाई जाने वाली रचनाओं के संग्रह हो । तो ऐसे कभी रचयिता को श्रद्धांजलि स्वरुप में उनकी कुछ रचनाएं यहां प्रस्तुत कर रहा हूं
(४५)
जिन्दगी में दर्द सहना चाहिये ।
दर्द सहकर मस्त रहना चाहिये ।
बहना चाहे रोकदे गंगो-जमन, आँसुओं की धार बहना चाहिये ।
दर्द में ओ लुत्फ है, मैं जानता, जो जानता हो उसको कहना चाहिये ।
मत कहो बेदर्द लोगों से कभी,
दर्द की दीवार बहना चाहिये ।
है जमाने में कोई कमतर 'हरीश' उसका हमको हाथ गहना चाहिये
(४६)
कांच के ही घर के आगे पत्थरों के ढेर हैं।
देखियेगा किस कदर यहां कचरों के ढेर हैं।
किसको किससे मारना है, आप खुद ही सोच लें,
लाठियां, तलवार, चाकू, हंटरों के ढेर हैं।
आदमी शैतान जब से हो गया है दोस्तो तबसे इसके सामने तमनचरों के ढेर हैं।
काट डाले इसने कितने और कितने काटना,
इसकी यादों में अभी तक उन सरों के ढेर हैं।
नोट लेकर काम करता है यहां का आदमी,
घूंस लेने वाले कितने अफसरों के ढेर हैं।
देते-देते थक गए हम. लेवे-लेते ये नहीं,
आज की सरकार में, इतने करो के ढेर हैं।
रात में घर से निकलते, चोरियों के वास्ते,
अपने भारत देश में रजनीचरों के ढेर हैं।
एक शायर की कलम को आज लिखना पड़ रहा,
दीजियेगा नोट लाखों तो वरों के ढेर हैं।
(४७)
ये मतला गजलों के लिये ठीक नहीं है।
ये मामूली अकलों के लिये ठीक नहीं है।
इस बेजान सी मिट्टी में तुम पौध न येपो,
ये इन सभी गमलों के लिये ठीक नहीं है।
ये जूतियां ठीक नहीं, इनमें कीलें निकल आई.
ये मुलायम तलवों के लिये ठीक नहीं हैं।
जहां आठों पहर घनघोर अंधेरा टिका रहे,
वह जगह इन जलवों के लिये ठीक नहीं है।
अदना 'हरीश' कह रहा सच मान लीजिये,
यह गुलाबी कलमों के लिये ठीक नहीं है।
(४८)
लगता है तेरे प्यार के सम्बल नहीं रखे।
हम जबसे तेरे प्यार में क़ाबिल नहीं रहे।
बन आई वकीलों की झगड़ा-फसाद में.
क्रानून में भी देखिये अब हल नहीं रहे।
मरते हैं रोज-रोज ही, ये सबको पता है,
कहता है कौन आजकल खल नहीं रहे?
हर रोज दल-बदल की विकड़म क्यों चल रही.
अच्छे यहां पर आजकल ये दल नहीं रहे।
हर काम हो समय पर, अच्छा यही है अब.
पर ईमान की राहों पर कोई चल नहीं रहे।
सुन्नू जवान है मगर बूढ़ा सा लग रहा,
खाने को अब गरीबों को अन्न-जल नहीं रहे।
(७९)
दाई से रिश्ता है पुराना मेरा । दर्द से कुच्कृन्यना है मेरा ।
मेरी दौलत, मेरी पूंजी दर्द है, दर्द ही सारा खजाना है मेरा ।
मेरी किस्मता सिर्फ मेरा दर्द है, दर्द में डूबा जमाना है मेरा।
यह गजल मेरी है देखो दर्द की, दर्द ही बस अब तराना है मेरा ।
दर्द पीता, दर्द खाता जा रहा, दर्द अब तो अबोदाना है मेरा ।
(८०)
तेरे बिन सारे दिन सूने । दुःख-दर्दों से हैं ये दूने ।
वन-मन सारा दुख से झुलसा, लगे नैन से आंसू चूने ।
तुम आंई तो सच कहता हूं, खुशियां लगीं मुझे अब छूने ।
मुझ से हाथ छुड़ाकर देखो, जिन्दा लाश बनाया तूने ।
वूने साथ दिया न पूरा, हुए खुशी के दिन अब ऊने ।
कवि 'हरीश' तुम्हारे संग के, याद रहेंगे दिन वह पूने ।
(८१)
जिन्दगी ने दर्द की थाती थमा दी प्रेम से । अधजली बुझती हुई बाती थमा दी प्रेम से ।
क्या करूंगा यार इसका तू जरा मुझको बता, खून से लथपथ अरे । छाती थमा दी प्रेम से ।
बीव, गजलें लिख रहा हूं आंसुओं की आजकल, एक लड़की खूबसूरत गाती थमा दी प्रेम से ।
डाकुओं का पीछा करती, आ रही देखो पुलिस, एक गोली छाती में आती थमा दी प्रेम से।
दुःख-दर्द-आंसू और आहें ही, भरे इसमें 'हटीथ' यार तूने इस तरह पाती थमा दी प्रेम से ।
(८२)
कब तक मैं बदनाम रहूंगा ? खास नहीं मैं आम रहूंगा ।
रात चांदनी नहीं बनूंगा, सुबह नहीं मैं शाम रहूंगा ।
पीकर जिसको झूम उठे दिल. नहीं कभी में आम रहूंगा।
मेरा यही रहेगा दावा. वैरा कर में धाम रहूंगा ।
जा रहेमा वेय.
(८३)
हाथी तू तो बहुत बड़ा है, चींटी से क्यों डरता है? कहते लोग यही हैं अब तक तू चींटी से मरता है।
तेरी करुण कहानी अब तक छपी नहीं अखबारों में, अपना पेट हमेष्या तू तो लकड़ी खाकर भरता है।
इतने बड़े दांत हैं तेरे, जितने नहीं किसी के हैं, मोटी-मोटी लकड़ी तू वो अपने लिए कतरखा है।
अब न कहेंगे तुझको बच्चे वू पहाड़ है छोटा सा, मोटे खम्भे से पैरों से दिनभर घूमा करता है।
कवि 'हत्टरीष्श' ने कलम उठाली तेरा किस्सा लिखने को, घास-फूस भी बड़े प्रेम से भूखे में तू चरता है।
(८४)
हाथी तू वो बहुत बड़ा है, चींटी से डर गया अरे,
कहते लोग यही है अक्सर, चींटी से मर गया अरे।
तेरी करुण कहानी अब तक छपी नहीं अखबारों में,
बेमिसाल कई काम यहां पर मरकर भी कर गया अरे ।
इतने बड़े दांतों से लेकिन काम नहीं कुछ कर पाया,
पैरों से लकड़ी के टुकड़े कितने ही कर गया अरे ।
अब न करेंगे बच्चे तुझको हरगिज हाथी बाबा रे,
इनके मन में बुरी भावना ऐसा कर भर गया अरे ।
मरने पर गलने की खातिर नमक डालना पड़ता है,
खा-खा लकड़ी, घास-फूस को चींटी से मर गया अरे।
कवि हरीश ने कलम उठाली तेरा चर्चा करने को, भरकर भी किले में तेरा टंगने को सर गया अरे ।
(८५)
एक दीपक, एक बाली, नेह से भरकर जला दो। जिन्दगी की नफरतों को प्यार से हंसकर बुला दो ।
आदमी भूखा बहुत है आजकल ये प्यार का, नफरतों को मारकर, चैन से उसको खुला को।
भूख की ज्वाला मयुज को खा रही है आज देखो, दूर जंगल में इसे आकर कहीं थोडा दबा दो।
खा रहा है आदमी को आदमी किस शान से, इन दानवों को मारकर के आज वो जग से मिटा दो।
बात कड़वी लग रही है 'हरीश' की जो तो कहो, तुम कोई मीठी कहानी ही जरा हमको सुना दो।
(८६)
दीवाली आज हमको आली हुई है यार । क्या खूब हमें ये खुशहाली हुई है यार ।
कोई कहीं कह रहा है दोस्तों के बीच, अरे । जेब आज अपनी खाली हुई है यार।
कोई खा रहा है लहू, कोई खा रहा है खीर, और आधी गरीब दुनिया सवाली हुई है यार ।
मालिक ये खूब तूने बनाई हैं किस्मतें, किसी की आज वे बजे वाली हुई है यार।
कहीं झोपड़ी वीरान, कहीं महल सज रहे हैं, दुनिया हमारी खूब देखी भाली हुई है यार।
कह-कह के थक गया 'हरीश' दुनिया की कहानी, क्यों रात दीवाली की काली हुई है यार ?
दर्द की सीढ़ियां (गजल संगह।
(८७)
अब तुम कितनी उदास लगती हो ? मन से कितनी हताश लगती हो ?
ये दिल कहता रहता है अक्सर तुमसे, तुम मेरी अब भी खास लगती हो ।
क्या हुआ ओ दूर आके बैठी हो तुम, फिर भी तुम कितनी पास लगती हो ?
तुम मेरे बिन रह नहीं सकती, हो कमी, मेरे बिना कितनी निराश्य लगती हो ।
तेरे बिन 'हरीश्श' जी नहीं सकता, तुम मेरे प्राणों की सांस लगती हो ।
आओ की गहरी हसी पड़फड़ायें, चलो
करमा, 'हटीथ' से क अन भूल जायें, च
(66)
कब तक तुम्हारे नाम का चर्चा करेंगे हम ? लिख-लिख के ख़त जनाब को खर्चा करेंगे हम ।
वह हंसना-हंसाना वैरा, वह प्यार की बातें, इन सब का बोलियेगा क्या पर्चा करेंगे हम?
पढ़-लिख लिया है खूब, मगर पढ़ना पढ़ रहा, पढ़-पढ़ के पास और एक दर्जा करेंगे हम ।
अपने भाई
लिख-लिख के रख चुके हम तेरी कहानियां, छपवा के इनको और क्या कर्जा करेंगे हम ?
बी को वहां
यह वक्च गुजरा फिर से आयेगा नहीं 'हरीश्च', यह सोच कर ही अब नहीं हर्जा करेंगे हम ।
(८९)
चांदनी में नहायें, चलो हम सनम । प्रेम में डूब जायें, चलो हम सनम ।
धड़कनों के मधुर प्रेम-संगीव पर, प्रेम-नगमें सुनायें चलो हम सनम ।
जाम पीकर जवानी के दिन-रात हम, उम्र भर डगमगायें, चलो हम सनम ।
मेरी आंखों की गहरी हसीं झील में, उम्र भर फड़फड़ायें, चलो हम सनम ।
प्यार ऐसा, 'हरीश' से करो तुम प्रिय, सारा जग भूल जायें, चलो हम सनम ।
(९०)
आपने जब से किनारा कर लिया । दर्दा-ग़म हमने गवारा कर लिया । (१)
छोड़कर तुम साथ मेरा चल दिए, याद का हमने सहारा कर लिया । (२)
अब नहीं आओगे मेरे सामने, दूर से तेरा नजारा कर लिया । (३)
तुम समझ पाये नहीं इसको अरे, मैंने तो इशारा कर लिया । (४)
९१)
सदियां गुजर गईं हैं, मुलाकात के बगैर । ताले लगे जुबां पे तेरी बात के बगैर ।
तन्हाइयों ने इस लिया मुझे काले नाग सा, अब कुछ नहीं सुहाता उसी रात के बगैर ।
जाना, तुझे जाने की फिक्र क्यों ये हो रही, जाने तुझे न दूंगा सौगात के बगैर ।
जब तक तुझे बाहों में भरकर चूम नहीं लूं, आता ही नहीं मुझको मजा घात के बगैर ।
कब से नहीं बिखेरे तेरे हाथ से गेसू, भींगा नहीं कभी इस बरसात के बगैर ।
शायर 'हरीश जी नहीं सकता तेरे बिना, मरना भी नहीं मुमकिन तेरे साथ के बगैर ।
(९२)
चिठ्ठियां आतीं नहीं अब हमारे घर कभी, खत का उत्तर डालने का अब रहा न डर कभी ।
मैंने भी अपनी कलम को बन्द करके रख दिया, इसलिए दुखता नहीं है पत्र लिखते सर कभी ।
अब खुशी ही खुशी है इस तरफ से दोस्तो । गम की होती ही नहीं है इसलिए पतझर कभी ।
बेवफाओं की वजह से यह खता करता रहा, खूब देखे इस तरह से दर्द के मंजर कभी ।
तीर नजरों के ही खाकर हम तुष्ट घायल सदा, अपने हाथों जान देने को न चला खंजर कभी ।
इस शाष्ट से, उस शहर तक प्रेम-पींगें भर चुके, जिन्दगी मेरी हुई थी यूं प्यार में बंजर कभी ।
अब मजे से जी रहा है. सच बताता है 'हरीष्य'. ठोकरें खाता रहा हूँ इस तरह दर-दर कभी ।
(९३)
खोलियां महलों ने वोड़ीं, कोई कहता क्यों नहीं ? मिट्टियां इनकी न छोड़ों, कोई कहता क्यों नहीं ?
पैरों पर गिर गिड़गिड़ाई, पर सुनी उसकी नहीं, नौकरों ने धर झझोड़ी, कोई कहता क्यों नहीं ?
चन्द पैसों के लिए ओ खूब मेहनत कर रही, घूस ले उससे करोड़ी, कोई कहता क्यों नहीं ?
जिन्दगी भर गुदड़ियों को जो सिंया करती रही, सींवे-सीते आंख फोड़ी, कोई कहता क्यों नहीं ?
जिन्दगी भर स्वाद इनका ले सकी न वह कभी, चख सकी न वह मंगोड़ी, कोई कहता क्यों नहीं ?
हीरे जिसने पत्थरों से ढूंढ करके दे दिये, उसके सर पड़ती है कोड़ी, कोई कहता क्यों नहीं ?
जूठे बर्तन मांज कर जो सदा देती रही, न नाक भों उससे सिकोड़ी, कोई कहता क्यों नहीं ?
किस तरह उनके खजाने भर गए जाने 'हरीष्य', पर जोड़ पाई वह न कौड़ी, कोई कहता क्यों नहीं ?
(९४)
कितने दिन बीते रो-रोकर । तेरी यादों में खो-खोकर ।
इक पल भी न चैन मिला है, गम वेरा तन्हा ढो-ठोकर ।
उठा नहीं पल भर की देखो, बैठा रहा अश्रु बो-बोकर ।
थककर चकनाचूर हुआ हूं, अश्रु मोतियों से पो-पोकर।
अब 'हरीश' नहीं मरेगा, जी लेगा अब तो सो सोकर ।
(९५)
मेरी हसरत है यही तुझे प्यार हो जाये । तो मेरा टूटा हृदय गुलजार हो जाये ।
कहता रहे जमाना जोर-शोर से, फिर भी हमारे यार का दीदार हो जाये ।
मेरे मालिक, मेरे रहबर, सुन भी लीजिए, प्यार के इजहार का इकरार हो जाये ।
मेरे दिल का यह मकां खाली पड़ा है आपको, इस मकां में रहना अब स्वीकार हो जाये ।
तू मुझे इक बार आ के मुस्कुरा के देखले, यह प्यार का 'हरीश' को उपहार हो जाये ।
(९६)
वेरा ख्याल दिल से निकलता ही नहीं है। ये नादान दिल मेरा समझता ही नहीं है।
पत्थर हुए है लोग यहां किस कदर बोलो, पत्थर कभी देखो वो पिघलता ही नहीं है।
चेहरे पे कई चेहरे नजर आ रहे हैं हमको, ये डर मेरे पहलू से निकलवा ही नहीं है।
मुर्दाघरों में आकर ये मालूम कीजिए, मुर्दा कमी बिस्तर से उछलता ही नहीं है।
दिल का मरीज हो या गम का मरीज ही, खुशियों में कभी देखो मचलता ही नहीं है।
'हरीश' का तेरे बिना बुरा हाल हो गया, अब दिल किसी सूरत में बहलता ही नहीं है।
(९७)
हर कोई बैठा मुझे ही मार जाने के लिए। मैं खड़ा हूं काम से बाजार जाने के लिए।
अब मुझे तूफान के आसार से दिखने लगे, मैं खड़ा कश्ती लिए उस पार जाने के लिए ।
कन तलक जिनसे हमारी बन्दगी होती रही, हां, आज वो ही हैं खड़े दुत्कार जाने के लिए ।
सब ही मुझसे जीतने को देखिए तनकर खड़े, में ही जैसे हूं यहां बस हार जाने के लिए।
अब मुझे लगने लगा है उम्र ढलती देखकर, मेरा ये जीवन हुआ बेकार जाने के लिए।
मैं भी क्या नादान था जो उम्र भर हंसता रहा, अब खड़ा हूं देखिए लाचार जाने के लिए।
अब तो मुझको दोस्तो चान इसका हो गया है, मैं ही क्या देखो खड़ा संसार जाने के लिए।
सब के सब ही हो गये हैं द्वार पर मेरे खड़े, कांधे जो कि चाहिए हैं चार जाने के लिए।
चल पड़ा 'हरीश' तन्हा अब यहां न आयेगा, हर कोई आता यहां, सरकार जाने के लिए ।
(९८)
तुमसे अब मिलना न होगा, फूलों सा खिलना न होगा।
हम दोनों इक हुए हैं जब से, लेश-मात्र हिलना न होगा।
गम से फटा हुआ है अन्तर, जिसका अब सिलना न होगा।
जलें प्यार में हम दोनों ही, मात्र जरा न चिलना न होगा।
हो.
हम 'हटरीश्श' प्रेमी हैं दोनों, फिर क्योंकर मिलना न होगा ?
(९९)
गीत लिख लेवा मगर गीतों में उल पाता नहीं। क्या करूं इस हाथ से यह दीप जल पाता नहीं ?
रोकना मैं चाहता पर हाथ रुकते हैं नहीं, मेरा काबू इस जगह पर यार चल पाता नहीं ।
प्यार उनसे है हमें, गैरों से उनको है वफा, मेय यह ख्याल उनके दिल में पल पाता नहीं।
मेरे हाथों दर्द की गागर छलकने लग गई, दर्दे-दिल पर सुख की मलहम यार मल पाता नहीं।
है बड़ा नादां 'हरीश' जो प्यार करता जा रहा, प्यार मेरा उनके दिल में यार पल पाता नहीं।
(१००)
आप आये नहीं जमाना गुजर गया । नगमें गुजर गये, वराना गुजर गया ।
कल तक हुई थी खूब मुलाकात हमारी, राहें गुजर गईं, ठिकाना गुजर गया ।
वादे हुए न पूरे तुम्हारे वो प्यार के, हर रोज का वो तेरा बहाना गुजर गया ।
अब तक अधूरी है अरे अपनी वो कहानी, हम कह सके न वो भी फसाना गुजर गया।
यादों में खोये रहते हम आजकल तेरे, माना कि तेरे दिल में समाना गुजर गया।
कहता रहा 'हरीश' ममर सुम नहीं पाये, अब क्या कहे वो तेरा सुनाना गुजर गया।
१०१)
मान्यवर । अब इतना तमाच्या मत करो । सब समझाने लग गए, पूरा खुलासा मत कन्ये ।
यह दीवारें तक यहां की देख लेती हैं तुम्हें, इस तरह अभिनय कोई तुम नया सा मत करो ।
आदमी को आदमी समझो यही अच्छा है अब, आदमी को मारने माहौल खासा मत करो ।
मेरा क्या बातों में सब कुछ जान जाऊंगा कभी, तुम किसी सीधे मनुज से यूंही झांसा मत करो।
एक दिन यह भी चढ़ेगा इन पहाड़ों पर कभी, गिरते देखो जो उसे तो यूं हताश्था मत करो ।
दे दिया जो दिया, फिर सोचने क्यों लग गए, मन ही मन में तोल करके वोला-माशा मत करो ।
अपनी हिन्दी सबसे अच्छी इस जहां में दोस्तों, फ़ारसी, इंग्लिश मिली अब इसको भाषा मत करो ।
शायर 'हरीश' कह रहा है, है, यह गजल सुन लीजिए, सुनके मेरी यह गजल खुसपुस जरा सा मत करो ।
(१०२)
बेवफा तुम हुए यह पता चल गया । कुछ हुआ तो सही ये दिल जल गया।
बाव छोटी नहीं, बात है ये बड़ी, अपना कोई हमें प्यार में छल गया ।
हमने सोचा था हम चांद के पास हैं, चांद निकला ही था मगर उल गया ।
लुट गई जिन्दगी हम करें क्या कहो. प्यार कितना हमें देखिए फल गया ।
नहीं जी पा रहे, न मर पा रहे, लगता खुशियों का अपना समां टल गया ।
(१०३)
मेरे दिल को आजकल चाहत की बू आने लगी। नाम लेवे प्यार का राहत की बू आने लगी ।
मैं अकेला रात को सोता नहीं हूं चैन से. इस मोहल्ले को मेरी आदत की बू आने लगी ।
मेरी अपनी बात है, पर देखिएमा आजकल, हर पड़ोसी को मेरी जरूरत की बू आने लगी ।
मैं यहां बेहद अकेला, और कितनी दूर तुम. आयेमा कल खत तुम्हारा खव की बू आने लगी ।
वो हमारे प्यार में डूबे रहे कई साल तक, आज क्यों उसको मेरी इस लत की बू आने लगी।
सिर्फ महफिल में मिला था, रात को एक शक्स से. तब से हर इक रात उस सूरत की बू आने लगी ।
नाम ऐसा जुड़ गया 'हरीश' का उस शक्स से, के गुजरे हुए लम्हात की मुहब्बत की बू आने लगी ।
(१०४)
ये जिन्दगी हमें कितना तड़पा रही ? ऐसा लगता हमें जैसे शरमा रही।
हम खड़े सामने, ये खड़ी सामने, देख करके हमें ये वो धक्य रही।
हाथ मेंहदी रचाये खड़ी हंस रही, अपनी सखियों से हंस-हंस के बतरा रही।
सूना इसको सुनासिब नहीं लग रहा, ये ती शोलों की क्रयह बरमा रही।
अरे । घूंघट उठाने के पहले ही ये, अपनी आंखों ही आंखों में सुष्कृय रही।
अब वो इसका दीवाना 'हरीच' हो गया, ये भी दीवानी इसकी ही कहला रही।
(१०५)
तुमने मुझसे किया किनारा । कित्चित भी न किया इथाय ।
मैं तड़पा दर्शन को तेरे, लेकिन वू न मिला दोबाय ।
जन की मन में रही हमारे, देखा वेरा नहीं नत्राय ।
बनी जान पर बिना तुम्हारे, अब क्या होगा कहो हमारा ?
कुछ दिन रहकर साथ हमारे, ऐसा तूने किया किनारा।
हाय । 'स्यैश्च' अमाना कितना. तुझे मिली न जीवन धारा ।
(१०६)
नई साल आई, पुरानी गई। पुरानी की हर इक कहानी गई ।
नये तोहफे लेले नई साल के. पुरानी की हर इक निशानी गई।
खिल गह नये फूल अब बाग में. पुरानी महक राक्रानी गई।
है अभी कात चोड़ा टहल वो जय. फिर न कहना सुबह ये सुहानी गई।
बूढ़े, बच्चे, जवानों से अंबड़ाई ली. दर्द में डूबी अपनी वो बानी गई।
इस के तू भी मत बुलबुला ले 'टीस', फिटन काली निकल ये जवानी गई।
(१०७)
मुझकों यारों ने थमा दी, दर्द की गठरी । खुद गैरे सिर पर उठा दी, दर्द की गठरी ।
आह. आंसू और टीसे दूसकर इसमें सभी. प्यार से कैसी जमा दीं, दर्द की गठरी।
मैंने पूछा क्या है इसमें, वो बहाना कर दिया, देखिए हंसकर महादी, दर्द की गठ्टी ।
मैंने इसके जिस्म का बोझा उठाया उम्र भर, हर जगह जाकर घुमा दी, दर्द की गठरी ।
लोग मुझसे पूछते हैं, क्या भरे इसमें कहो, तो देखने उनको गहादी, दर्द की गठरी ।
जो मिला लोगों से मुझको, वह खुची से ले लिया, खूब अब तो यह मुटादी, दर्द की गठरी ।
हां, इसी गठरी से मैंने गीत, गजलें चुन लिए, महफ़िलों में 'ला सुनादी, दर्द की गठरी ।
अब मुझे जाना पड़ेगा छोड़कर इसको यहां, इस तरह सबको महादी, दर्द की गठरी ।
याद इसकी जीते जी मैं भुला न पाऊंगा, कौन कहता है भुलादी, दर्द की गठरी ?
मैंने अपने वास्ते सब कुछ लिया इससे 'हरीश', कौन कहता है लुटा दी, दर्द की गठरी ?
(१०८)
कब तक दर्द पिये जाऊंगा । कब तक दर्द पिये जाऊंगा । पीकर दर्द जिये जाऊंगा ।
तुमसे प्यार मिला न किंचित, शिकवे यही किये जाऊंगा।
तुमने कर बरबाद दिया है, ताना यही दिये जाऊंगा ।
मरते दम तक वेरा ही बस, पल-पल नाम लिये जाऊंगा ।
दुनिया से न जिक्र करूंगा, अपने होंठ सिये जाऊंगा ।
कवि 'हरीश' दर्द पी-पीकर, तेरा हृदय छिये जाऊंगा।
(१०९)
खो गई हर खुशी बात ही बात में । तुम जुदा हो गई एक ही रात में ।
वह कहां है जमाना जब हम साथ थे, हाथ वेरा था मेरे इसी हाथ में।
फूल देकर गईं एक मासूम सा, खूब तुमने दिया ये भी सौगात में ।
दे खुशी एक दिन फिर रुलाया मुझे, मीना हम तो गए गम की बरसात में।
तुमसे मिलते ही हम फिर बिछड़ क्यों गष्ट, अब न जी पायेंगे ऐसे हालात में ।
दिल लिया था, मेरा जान भी मांगते, हंस के दे देते हम, झट तेरे हाथ में।
साथ जीने का वादा किया था 'स्त्रीश्श', क्यों न लेकर गई तुम मुझे साथ में ।