Harisingh harish ki kuchh aur rachnayen v samiksha - 4 in Hindi Book Reviews by राज बोहरे books and stories PDF | हरिसिंह हरीश की कुछ और रचनाएं व समीक्षा - 4

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हरिसिंह हरीश की कुछ और रचनाएं व समीक्षा - 4

हरिसिंह हरीश की कुछ और रचनाएं व समीक्षा 4  

दर्द की सीढ़ियां (ग़ज़ल संग्रह)

 

 

हरि सिंह हरीश अपनी युवावस्था के समय से ही लिखने के प्रति बड़े समर्पित रहे हैं। वह कहते थे कि जब वह छठवें क्लास में पढ़ रहे थे तो होमवर्क की कॉपियों पर उपन्यास लिखने लगे थे। दरअसल उन्हें कुशवाहा कांत के उपन्यास पढ़ने का बड़ा शौक था । वे मुरार ग्वालियर में रहते थे और वहां की लाइब्रेरी से किताबें निकालकर खूब पढ़ते थे ।वे जिस  मिल के कैंपस में निवास करते थे,उस मिल के मालिक ने भी लाइब्रेरी में अपने खाते से हरीश जी को किताबें निकालने की सुविधा प्रदान कर दी थी । तो एक छोटे से बच्चे में लिखने की इतनी ललक इस कारण पैदा हुई कि वह पढ़ते भी बहुत थे। यह अलग बात है कि पढ़ने उन्हें उतनी कलात्मक ऊंचाई नहीं सिखा पाया, हां नियमित लिखने की प्रेरणा दे गया। वे चाहते थे कि जैसी किताबें लाइब्रेरी में रखी रहती थी, उनकी रखी जाए। बस इसी इच्छा से उन्होंने लिखना शुरू किया। वे अध्यापक रहे पर ड्यूटी से  आके नियमित रोज एक न एक रचना लिखते थे, गीत लिखते थे, गजल लिखते थे या मुक्तक लिखते थे, उपन्यास भी लिखते थे। उनके लिखे 40 उपन्यास अप्रकाशित रह गए ।उनके लिखे 10000 गीतों में मुश्किल से 500 भी छप पाए। उनकी 15000 गजलों में मुश्किल से ढाई तीन सौ  ही गजल छपिया होगी। मुक्तक तो छपे ही नहीं अब इस पर दुख मनाया नहीं जाना चाहिए, क्योंकि प्रकाशक वही छापेगा जो पाठक मांगेगा छोटे प्रकाशक तो सदा ही अपनी छापी हुई सारी प्रतियाँ लेखक या कवि को ही सौंप देने चाहते हैं, वे ही बेच दें, वे ही बाजार में भेजें । वही लाइब्रेरी में भेजें ।तो हरि सिंह हरि ज्यादा नहीं छपे।

 हां फिर भी उनके उनका एक उपन्यास कली भँवरे  और कांटे छाप और मन के गीत नमन के अक्षर भजन संग्रह तथा लगभग 10 अन्य किताबें छपी, जिनमे 6 गीत संग्रह और गजल संग्रह भी कहे जा सकते हैं । भले ही वे  काव्यशास्त्र के सिद्धांत पर गीत के मानक पर पूरे ना उतरते हो,ग़ज़ल  के मानक पर बहुत बड़े ना हो और गजल के चंद्र शास्त्र पर तो वे कतई गजल न हों।  लाख ग़ज़ल ना कहलाई जाने वाली रचनाओं के संग्रह हो ।  तो ऐसे कभी रचयिता को श्रद्धांजलि स्वरुप में उनकी कुछ रचनाएं यहां प्रस्तुत कर रहा हूं

 

 

(११०)

 

दुनिया ने जलाया हमें अथकों ने बुझाया। गीतों में वही देके जमाने को सुनाया।

 

ग़म दे दिया दुनिया ने खुशी छीन कर हमको, पर देखिए हमने उसे इस दिल से लगाया।

 

हम वो नहीं बदनाम मुहब्बत को करें जो, हमने तो मुहब्बत का सदा नाम बढ़ाया ।

 

शायर हूं मुहब्बत को समझाता हूं बाखूबी. हमने हमेशा प्यार के नगमों को सुनाया।

 

गम से कभी घबराया नहीं आज तक 'हरीश', से ही लड़ने को में सामने आया ।

 

 

(१११)

 

बन्दसत्चाई का अब रास्ता । है कहां रखाई का अब रास्ता ?

 

है निठल्ला आदमी इस दौर का. है नहीं कमाई का अब यस्या । न्यायालयों में भीड़ लगने लग गई. खा है अधाई का अब राख्ता । साफ-सुधरे रास्तों को छोड़कर, चले रहे हैं काई का अब राख्खा । भाईयों से भाई की अब दूरी बढ़ी, खुल गया लड़ाई का अब रास्ता । बोलियों में अब नहीं मिसरी घुली, बढ़ गया खटाई का अब रास्ता । अब नहीं पंचों की कीमत यहां, बन गया है ढाई का अब रास्ता । डालरों में खो रहा है आदमी, भूल बैठा पाई का अब रास्ता । है बनावट घरों में अब देखिष्ट, खुल गया है नाई का अब राच्ता । क्या कहें, किससे कहें, बोलो 'हरीश', है कहां सफाई का अब रास्ता ?

 

(૧૧૨ )

 

सच कह रहे हैं लोग मुहब्बत नहीं मिली । दुनिया को जबसे प्यार की दौलत नहीं मिली ।

 

लोगों ने खूब धूल के बादल उठाये हैं, खतरों से बच निकलने की सूरत नहीं मिली।

 

शैतान सर उठाये हैं, क्यों आज बेबज, क्यों आज तलक इनको नसीहत नहीं मिली ?

 

बैकार बैठने से कोई काम कब हुआ. माना कि साथ वाले से तबीयत नहीं मिली।

 

नफरत के चहेतों में कहां बात यह 'हरीश', चाहत की चाह थी मगर चाहत नहीं मिली ।

 

दर्द की सीढ़ियां (ग़ज़ल संग्रह)

११३)

 

तेरे गांव नहीं आऊंगा । वैरी छांव नहीं आऊंगा ।

 

तू चाहे पनघट पर पहुंचे. अब मैं गीत नहीं गाऊंगा ।

 

तू चाहे हर बार पुकारे. तेरे पास नहीं आऊंगा ।

 

तेरे आंगन की तुलसी पर, दीप बालने नहीं आऊंगा ।

 

बना रहूंगा सदा अभागा, तुमको लेकिन नहीं पाऊंगा ।

 

कवि 'हरीश' तुम्हारे कारन, जीवन भर ना मुस्काऊंगा ।

 

(११४)

 

मेरे हाथ आइना, वेरे हाथ में पत्थर हैं क्यों ? मैं अकेला आदमी हूं और वो यहां सचर हैं क्यों ?

 

वो सफर करके घरों में चैन से जा सो गए, मेरे आगे इस सफर में ये पुर खतर मंजर हैं क्यों ?

 

मैं तुम्हारे वास्ते लाया गुलों का हार ये, फिर बता मेरे लिए तेरे हाथ में खंजर है क्यों ?

 

वृ बताता फिर रहा है, मैं तो यहां खुशहाल हूं, मेरे सीने में चुभा गम का भला नश्तर है क्यों ?

 

आपका घर आजकल महलों से कम लगता नहीं, मेरा घर वीरान होकर बोलिये बंजर है क्यों ?

 

क्या करे, कैसा करे, नादां 'हरीश' ये सोचता, मैं खड़ा बाहर अकेला, आप सब अंदर हैं क्यों

 

 

(११५)

 

मेरे सामने खड़ी हैं, दर्द की ये सीढ़ियां ।

 

में बहुत छोटा, बड़ीं है, दर्द की ये सीढ़िया ।

 

पैर में छाले पड़े हैं और दिल में घाव है, घाव रिसता और कहीं हैं. दर्द की ये सीढ़ियां।

 

मैं अकेला जिन्दगी मर दर्द से लड़ता रहा, हर समय मुझसे लड़ीं हैं, दर्द की ये चीढ़ियां ।

 

'हरीष्श' तो इनके विषय में सोचता हरदम रहा, शायद अब गिर ही पड़ीं हैं, दर्द की ये सीढ़ियां ।

 

(११६)

 

तेरे बगैर जीने की हसरत नहीं रही। हां, जबसे तुझे मुझसे मुहब्बत नहीं रही।

 

दिल ने समझ लिया है तेरे इस ख्याल को, लगता है तुझे मेरी जरूरत नहीं रही।

 

मतलब-परस्त निकले तुम भी जहान में, पहले की तरह तेरी नीयत नहीं रही।

 

लो, खुल गया राज छिपा कुछ नहीं रहा, झूठी है हर इक बात हकीकत नहीं रही।

 

तुमने भुला दिया है मेरा सब कहा हुआ, मेरी भी याद तुमको नसीहत नहीं रही।

 

भूले हो मुझको ऐसे जैसे कुछ हुआ नहीं, पहले की तरह तेरी आदत नहीं रही।

 

वह बेमिशाल हुरुन तेरा अब कहां गया, पहले सी अब वो तुझमें नजाकत नहीं रही।

 

बवलादे क्या मिला 'हरीश' को ऐसे मार के, बिल्कुल ही तुझमें अब तो शराफत

 

 

(११७)

 

हरीष्य की कलम है वलवार की क्यह। इक-इक को काट देनी महार की तरह ।

आए हजार दुश्मन इसके मुक़ाबिले में, सबको पाछाड़ फेंका मक्कार की तरह ।

 

कोई इसे जरा भी खूंटे न बांध पाया, हर बार निकल भागी जलधार की तरह ।

इसका हसीन चेहरा, हरदम दमकता रहा. किसी दिलरुबा - हसीना दिलदार की क्रह ।

 इसके सारे बदन में भरी रोशनाई रहती. हर ओर चमक जाती अंगार की क्रह ।

 हां, इसके जैसी ताकत बन्दूक में कहां है, 'हटरीश' रखता इसको उपहार की तरह।

ये दुश्मनों को दुश्मन, यारों को यार है ये,इसे प्यार करता रहता, हां यार की तरह।

इससे ही लिख दिये हैं संसार ने फसाने, सब इसको प्यार करते, दिलदार की तरह।

दुष्टों की पोल खोले, अच्छों को दे सहारा, इसे हाथ में लिए हूं, पतवार की तरह ।

जो इससे प्यार करते, रखते संभाल करके, मेहनत कथों के जैसे औजार की तरह।

शायर 'हरीश ' इसको, सीने से लगाये है, इसे प्यार करता रहता, खुद्दार की तरह ।

 

(११८)

 

आंखों में बरसात शुरू है, देखो आधी रात शुरु है।

तूने जो देदी है हमको, वही आज सौगात शुरू है।

ख़तम न होगी यह जीवन में,ऐसी मधुमय बात शुरू है।

जग को यह मालूम नहीं है, पहले अपने हाथ शुरू है।

(११९)

संग न साथ जोड़ों दोस्तो। खून करने वालों से न हाथ जोड़ो दोस्तो ।

मिलने-जुलने के लिए यहां कई हमारे है मगर, इनसे जाली दोस्त की ल बाव जोड़ो दोस्तो ।

हर साल आकर के बरसता सावन-मादों रात-दिन, जुल्फ की बरसात से न बरखाव जोड़ो दोस्तो ।

 

दे दिया जो भी तुम्हारे यार ने तोहफा तुम्हें, उस हंसी सौगात से न सौगात जोड़ो दोस्तो ।

कर चुके तुम तो बाराते दोस्तों की खूब ही, इनसे अपने ब्याह की न बायव ओड़ो दोस्तो।

दिन बहुत देखे सभी ने, रात भी देखीं 'हरीथ', अपनी सुहानी रात से न रात जोड़ी दोस्तो ।

(१२०)

जितना तुमने दर्द दिया है। उतना हमने दर्द पिया है।

छोड़ सकेंगे कभी न इसको, जो हमने तेरा हाथ लिया है।

 

कैसे कहो भुला पायेंगे, जो तुमने अहसान किया है।

 

जितना तुमने प्यार किया है, उतना हमने प्यार किया है।

 

तेरे दिल में मेरा दिल है, मेरे दिल में तेरा जिया है।

 

अब 'हरीष्श' विलग न होगा. वेरा जबसे बदन छिया है।

 

 

 

(१२१)

 

अभी चाल से जीता हूँ मैं। दर्द तुम्हारा पीवा हूं में।

दर्द तुम्हारा नहीं मिला जो. जो फिर समझो रीता हूँ मैं।

 मैं तो हूं चाहत की पोथी. नहीं कृष्ण की गीता हूँ मैं।

तुझे चाहकर भी ओ निर्माही, नाम का एक पलीता हूं मैं।

 प्यार 'हरीश ' रटे जाता है, कैसा यार यूं जीता हूं मैं ।

 

(१२२)

 

आया चुनाव लोगों, चुन-चुन पछाड़ दो। अपने सारे शहर में झन्डों को गाड दो ।

 

दीवार, रंग दो सारी, घर-घर की रात को, दूजे के बैनरों को बढ़-बढ़ के फाड़ दो।

 

भाषण का दौर आये तो तुम भी दहाड़ देना, जो-जो कहा था उसने, उसको लताड़ दो।

 

वादे सभी से करना, कसमें सभी से खाना, इवना तुम वोटरों को जमकर के लाइ दो ।

 

कोई एक मारे पत्थर, सह जाना प्यार से, मौका पड़े जो तुमको सर पर पहाड़ दो।

 

नेताओं का यहां पर ये ही रहा रवैया, करना नहीं है कुछ भी. केवल दहाड़ दो ।

 

झटके से तान करके जो धोती खींचे वेरी, तुम उसका दौड़ करके पाजामा फाड़ दो ।

 

कहता 'हरीश' तुमसे दो टूक बात अब, जो व्यंग्य कसे तुम पर, तुम ऊसको झाड़ दो ।

 

 

(१२३)

 

खाया है किसने आज तक धीसा नहीं कभी । मैंने किसी से आजतक पूछा नहीं कमी ।

 

सब जा रहे थे खाने धोखा बहार. में, तकता रहा उनको अगर रोका नहीं कमी ।

 

सब अपनी-अपनी राह पर चलते रहे यहीं, पर देख कर उनकी अरे चौका नहीं कभी ।

 

लड़ते रहे, झगड़ते रहे, आप सब मगर, मैंने किसी को आज तक रोका नहीं कभी ।

 

बदनाम कर दिया यूहीं सबने 'स्टरीश्च' को, फिर भी जनाब आजतक, बोला नहीं कभी ।

 

(१२४)

 

बच्चों सा बनकर तू देख । बच्चों सा तनकर वूदेख ।

 

क्या सुनकर वो कहते हैं, बच्चों से सुनकर वू देख ।

 

गुड्डा-गुड़ियों के नापों का, स्वेटर भी बुनकर तू देख ।

 

हार पहनने गुड़ियों को, फूलों को चुनकर तू देख ।

 

शादी रुकी दहेजों पर तो, सिर अपना घुनकर तो देख ।

 

कितना खर्च हुआ शादी में, थोड़ा यह गुनकर तू देख ।

 

कवि 'हरीश' सा बनकर थोड़ा, उंगली पर गिनकर तो देख

 

(१२५)

इस तरह का शोर करना, ठीक अब होता नहीं। मुफलिसों पर जोर करना, ठीक अब होता नहीं ।

 

क्यों दहेजों पर अड़े हो, प्रेम से शादी करो, इस तरह गठजोर करना, ठीक अब होता नहीं।

 

कल रुला दोगे हमें फिर, यह हमें मालूम है, इस तरह विभोर करना, ठीक अब होता नहीं।

 

तुम नहीं शादी करोगे, छोड़ दोगे कल मुझे, इसतरह चितचोर करना ठीक अब होता नहीं।

 

कमजोर की कमजोरियों को लात न माये' हटरीथ', बेवज्ञा झकझोर करना, ठीक अब होता नहीं।

 

(१२६)

 

मन है बहुत उदास हमाय । क्या है बोलो हाल तुम्हाय ?

 

मरता हूं न जीता हूं मैं, लटका सर पर तेज दुधाय ।

 

ख़त देना क्यों बन्द किया है, छीन लिया क्यों यही सहाय ?

 

कसमें वादे भूल चुके हो, कैसे होता कहो गुजरा ?

 

यह कोई छोटी बात नहीं है, तुम कर बैठीं खूब किनाय ।

 

यह 'हरीश' मर गया समझ ली, देखो आकर कभी नजारा ।

 

(१२७)

हम गरीबों के यहां पोथी नहीं क्रानून की। फिक्र हमको रहती हरदम नून, लकड़ी. चून की ?

 

हमको है दरकार खुशिया दूसरों की छीनना, फिर क्या जरूरत हमें बोलो दूसरों के खून की ?

 

एम फटे चिथड़ों में खुश हैं ऐ अमीरों देखलो, ओढ़नी चादर हमें न मखमली रंगून की।

 

अब गुरुकुलों सी है नहीं शालाओं की आबोहवा, फिर क्या जरूरत इस तरह के ज्ञान के मजमून की ?

 

हर तरफ गुन्डे ही गुन्डे दिख रहे हैं देश में, हालतें बदत्तर हुई हैं प्रेम के जुनून की।

 

हां, चन्द लोगों ने यहां माहौल गंदा कर दिया, आदमी कुचला है जैसे हो दशा दावून की।

 

मेरे जीते जी किसी ने खत तलक डाला नहीं, फिर भला मरने पे आती घंटियां क्यों फून की ?

 

रंग मंहगे हो गए हैं जबसे हमारे देश में, फीकी-फीकी लग रही है होली हर फागून की।

 

क्या कहे किससे कहे, ये पूछता अदना 'हरीश', प्यार को गुड़िया न समझो, सिर्फ रंगी ऊन की ?

 

(१२८)

 

गम लेकर तेरे जीता हूं मैं। दर्द तुम्हारा मैं पीता हूं मैं।

 

बहा-बहाकर अश्रु हजारों, फिर भी नहीं तनिक रीता हूं।

 

तेरे गम की करुण कहानी, तेरे गम की में गीता हूं।

 

नाम तुम्हारा ले लेकर के, फटा गरेबां में सीता हूं।

 

कवि 'स्त्रीच्य' हमेच्या बरा, कमी नहीं तुमसे जीता हूं।

 

(१२९)

 

खुशियों का दौर आया, सब लोन मुस्कुराये । पीकर खुशी की मदित्य, सब लोग डगमगाये ।

 

बूढ़े, जवाल बच्चे सब हो गये है इकट्ठे, सबने भुजा उठाकर नारे बहुत लगाये ।

 

दुष्टमल सहम गया है, नारों का शोर सुनके, बैठा हुआ है दुष्टमन मुंह अपना जो छुपाये ।

 

यह देश ही है ऐसा, जहां एक होके रहते, गर हो कोई जुदावो, हमको जरा बताये ।

 

हंसता 'हटीथ' हरदम, इसकी ही सरजमीं पर, जिसको यर्की नहीं है वह सामने वो आये ।

 

(१३०)

 

दिसम्बर गया, जनवरी आ गई। जिन्दगी ये हमारी हटरी आ गई।

 

बुढ़ापे ने छोड़ा हमें यह में. जवानी के हाथों परी आ गई।

 

गए दिन सभी इस तरह बीत कर. नई साल फिर सुनहरी आ गई।

 

चल पड़ी जिन्दगी की मधुर मेल ये, कि तकते ही वी स्वर्णगिरि आ गई।

 

हाथ ज्यों ही उठे थे दुआ के लिए, सामने व्यों ही शगुन चिरी आ गई।

 

मन बहलने लगा देखकर नई सुबह, जिन्दगी में मधुर माधुरी आ गई।

 

हमको चूफां भी लाखों मिटा न सके, लो. किनारे पर अपनी तरी आ गई।

 

दिन सोना हुआ, रात चांदी हुई. हाथ थाली सिवारों मरी आ गई।

 

कैसा तुफान था गुजरे दिन में 'हरीस', सभके लोगों को भी फुरफुरी आ गई

 

(१३१)

 

कैसी सवाई आ रही हैं आज लड़कियों ?

 

घर-घर जलाई जा रहीं हैं आज लड़कियां ?

 

थे राधा, सीता, रुक्मणी, सावित्रियां, देखो कैन्सी उस्लाई अ रही हैं आज लड़कियों?

 

हां. ब्याह करके मांगते हैं दौलतें, इनसे, न दे तो भगाई आ रही हैं आज लड़कियां ?

 

फूल सी नाजुक हैं मगर देखिए, थोड़ा, खून में कैसी नहाई जा रही हैं आज लड़कियां ?

 

पुण्यान्मा सोचे हुए भी 'तरीष्य' ये देखो, पापी कहलाई जा रही हैं आज लड़कियां ?

 

(૧૨૨)

 

जिन्दगी किताब हो गई। मौत का हिसाब हो गई।

 

आज लड़खड़ा कदम गए मेरे, और ये शराब हो गई।

 

हाथ में चुभे हैं शूल थोड़े, लेकिन अब ये गुलाब हो गई।

 

अब तक तुम्हारी याद है मुझको, तू वो एक ख़्वाब हो गई।

 

मेरे इस सवाल का बतादे तू, क्या अनोखा जवाब हो गई।

 

तुम गए हो जब से रूठकर, ये जिन्दगी खराब हो गई।

 

ऐ 'हरीश' भूल जा तू उसे, वह तो अब नवाब हो गई।

 

(१३३)

 

व्यर्थ गंमा प्यार की तुमने बहाई थी। सात फेरे डालकर दुनिया बसाई थी ।

 

फेर बैठे चार दिनों में अपनी ये नजर, सिर्फ इतनी बात ही दिल में समाई थी।

 

धड़कनों से धड़कनें टकराई थी तुमने, रकटकी चातक की तरह क्यों लगाई थी ?

 

क्यों रौंद डाली दिल की खेती, ये बताइये, खू-पसीने से जिसे लहलहाई थी।

 

आज थोड़ी बात पर इतना अकड़ रहे, क्यों बात तुमने बोलिये पहले बढ़ाई थी ।

 

यह 'हरीथ' तेरा रहा, तू नहीं रही, यह बात भला तूने क्यों मुझसे छिपाई थी ।

 

(૧૨૪)

 

तुमसे मिलकर क्या पाया है ? गम का गीत सदा गाया है।

 

मैं ऐसा तन्हा हो बैठा, जिसके पास नहीं छाया है।

 

जबसे जुदा तुम गए हो, तबसे चैन नहीं पाया है।

 

तूने वो घर बसा लिया है, मुझे रास घर कब आया ?

 

दिल तो यही हमेशा कहता, मैंने तो धोखा खाया है।

 

जिस क्षण मिलन हुआ था तुमसे, वही मुझे यहां तक लाया था।

 

कवि 'हत्तीष्य' यही कहता है, दर्द तेरा मुझको भाया है।

 

( १३५ )

 

दर्द की ये सीढ़ियां, इंसान चढ़ न पायेगा । दो कदम भी इन पे ये इंसान बढ़ न पायेगा ।

 

दिल-जिगर जख्मी पड़े हैं मुद्दवों से देखिए, दर्द की जख्मी गजल इंसान पढ़ न पायेगा ।

 

एक-दो चैतां नहीं इस मुल्क में ए दोस्तों, हर किसी से ही अरे। इंसान लड़ न पायेगा ।

 

यह हसीं सूरत तुम्हारी खाली खाली ही भली, आंसुओं से इसको ये इंसान मढ़ न पायेगा।

 

यह हमारी आंख के ही गर्म आंसू हैं 'हरीथ', इनको गहनों की तरह इंसान गढ़ न पायेगा ।

 

(१३६)

 

लायें कहां से जिन्दगी में हम तुम्हारा साथ ? छोड़कर तुम जा चुके हो यह हमारा हाथ ।

 

किस तरह बीती सुनायें, यह समझ आता नहीं, रोज ही मिलते मगर होती नहीं है बात ।

 

ख़्बाव में अक्सर हमारे सामने रहते हो तुम, आंख खुलते ही बदल जाते सभी हालात ।

 

क्या कहूं, किससे कहूं, यह सोच कुछ पाता नहीं, क्यों नहीं होती हमारी फिरसे मुलाकात ?

 

दर्द कितना पी रहे हैं, प्यार में तेरे लिए, पर कौन समझा आजतक मेरे दिली जञ्चात ।

 

जिन्दगी भर याद आते तुम रहोगे यूं हमें, पर प्यार की न हो सकेगी फिर कभी बरसात ।

 

है 'हरीश' कितना अभागा प्यार में तेरे सनम, इसलिए ये खाता रहता हर किसी से मात ।

 

 

(१३७)

 

तबीयत जय खराब है श्रीमान आजकल, मुरझाया ये गुलाब है श्रीमान आजकल ।

 

कब से इसे हाथों में लिए बैठा हुआ हूं, ऐसी हंसी किताब है श्रीमान आजकल ।

 

मेरे तो पड़ गई है चेहरे पे झुर्रियां, वेरा हसीं शबाब है श्रीमान आजकल ।

 

कहते हैं लोग प्यार बला चीज है कोई, फिर भी तो लाजवाब है श्रीमान आजकल ।

 

पीने को पी रहे हैं सभी देखिए मगर, ये शराब बहुत खराब है श्रीमान आजकल ।

 

मेहनत की ये कमाई नहीं इसमें बहाओ, मंहगी बहुत शराब है श्रीमान आजकल ।

 

एक नहीं जाम कई पीते जाइये, इसका नहीं हिसाब है श्रीमान आजकल ।

 

पीता नहीं है वो भी बदनाम है 'हरीश्श', क्या इसका कोई जवाब है श्रीमान आजकल ।

 

(१३८)

 

भूली नहीं है यादें अभी तक वो पुरानी । आंखों में झूमती हैं रातें वो सुहानी ।

 

गुजरे हुए दिनों की कुछ बात न पूछिये, ख्वाबों ब्लके रह गई वो अपनी कहानी ।

 

बीते दिनों में प्यार की क्या शान थी अपनी, अब तक जवान लगती उन दिनों की कहानी ।

 

भूला नहीं हूं रोज का वो मिलना तुम्हारा, यादों में बांध रखी है वो सारी निश्थानी ।

 

 

१३९)

 

ये झोपड़ी तो दब गई महलों के नीचे । सारे नी यहां दब गए दहलों के नीचे ।

 

बाद के लोगों की चर्चा क्या करें हम, बाद के सब दब गए पहलों के नीचे ।

 

देवता तक आजकल खामोष्य बैठे लग रहे हैं, लग रहा वह दब गए सबलों के नीचे ।

 

फूल बेश्थक दिख रहे हैं आपको माना खिले, पर प्यार इनका दब गया गमलों के नीचे ।

 

कह दिया तुमने सभा में जो भी कहना था तुम्हें, दर्द सारा दब गया जुमलों के नीचे ।

 

गीत गाकर आप भी महसूस करते वो सही, कुछ छुपा बेशक वो है वबलों के नीचे ।

 

मार डाले कितने तुमने गोलियों से भूनकर, स्वार्थ कितना दिख रहा हमलों के नीचे।

 

चोंच से उछली हुई मछली 'हरीश्थ' यह जानती. कि लहलहाता नीर है बगुलों के नीचे ।

 

(१४०)

 

तुमसे मुझे मिला है दर्द।

 

गुल की तरह खिला है दर्द ।

 

अब यह जुदा नहीं हो सकता, दिल के बीच सिला है दर्द ।

 

चाहत का इक रूप यही है, चाहत का सिलसिला है दर्द।

 

धन-दौलत अब यही है अपनी, अपना घर औ' किला है दर्द।

 

अब 'हरीश्थ' लिखेमा जमकर, दिल में खूब हिला है दर्द।

 

 (१४१)

 

खून-खराबा करने वाले हथियारों को बन्द करो । अपनी जिद में लगे हुए इन हत्यारों को बन्द करो ।

जिरुम मसलते रहते हरदम धरती के इस आंगन में, ऐसे जिस्मफरोशी के तुम बाजारों को बन्द कटरी ।

मेहनत का जो फूंक रहे हैं जुये-थराबों में पैसा, ऐसे घर-घर ढूंढ-ढूंढकर नाकारों को बन्द करो ।

जओ कहते हैं काम नहीं है हमको करने धरने को, ऐसे झूठ बोलने वाले आवारों को बन्द करो ।

सच को कभी न जाहिर करते, झूठे पर्दे उठा रहे, ऐसे झूठे-छापने वाले अखवारों को बन्द करो ।

बेच रहे जो सुख की खातिर अपना ही ये वतन 'हरीश', ऐसे घर-घर छुपे हुए इन गद्दारों को बन्द करो ।

(१४२)

 

देखा है किसने आज जमाने में आदमी ? हमको नजर न आया ठिकाने में आदमी ।

 

चारों तरफ जहान में चर्चा इसी का है, कि मुस्तैद है जनाब कमाने में आदमी ।

 

मुंह फट हुआ है कितना, इसे डर नहीं रहा, चूके न अपनी बात सुनाने में आदमी ।

 

हंसने की इसको अब तो जरूरत नहीं रही. होशियार हुआ देखो रुलाने में आदमी ।

 

झगड़ा-फसाद खूब करे, कौन रोकता. तैयार है एफ० आई० आर० लिखानें में आदमी ।

 

अपने ही आप धोती से बाहर निकल रहा, बेशर्म हुआ अंग दिखाने में आदमी ।

 

शायर 'हरीश' इसको नजर भर न लख सके, उस्ताद है मुंह अपना छुपाने में आदमी ।

 

 

(१४३)

 

मेरी जल से आपका रिश्ता नहीं जनाब । पहचानने का इसलिए सख्खा नहीं जनाब ।

उनके महलों के लिए रास्ता सीधा यही, पानी कहीं से देखिए रिस्ता नहीं अनाब ।

चन्दा जरुर आपको उनसे ही मिलेगा, हालत भी उनकी हम सी खस्ता नहीं जनाब।

कैन्से पढ़ें बताइये ये बच्चे गरीब के, कापी, किताब, गांठ में बस्ता नहीं जनाब ।

वो इतने बड़े हैं कि बताए नहीं बनता, इसलिए वह आजतक फसता नहीं अनाब।

 

इस आदमी की आज तक कीमत नहीं आंकी, इस आदमी सा आज तक सरुवा नहीं जनाब ।

 

ये नेता हमारे सारा सोना-चांदी चबा चुके,अब खाने के लिए हमको जस्ता नहीं जनाब ।

 

मेरे दोस्त ने खाने पे बुलाया था रात को, जब खाने लगा तो बोला खरुवा नहीं जनाब ।

 

अदना 'हरीथ' रस्खियों से बंध नहीं सकता, हां, चाहतों से कोई भी कसता नहीं जनाब ।

 

(१४४)

 

आया-आया सुधर बसंत । देखो देखो इधर बसंत ।

 

बाग-बगीचों खेतों मे, सब को आया नजर बसन्त ।

 

सबने वस्त्र निकाले पीले, पाई सबने खबर बसंत ।

 

अलसी, सरसों, राई लेकर, आया हंसता डगर बसंत ।

 

रंग-बिरंगा मौसम लेकर, कैसा आया संवर बसंत ?

 

काजल 'हरीष्य' लगाओ थोड़ा. लग न जाये नजर बसंत ।

 

(१४५)

 

कोन मुझे आबाद करोमा ? जओ देखे बरबाद कहेगा ?

 

हूं गमखार जमाने भर का, कौल मुझे फिर शाद कहेगा ?

 

जो कहना है कहले मुझसे, क्या मरने के बाद कहेगा ?

 

सच को बोलो डर कैसा है, वह अपनी फरियाद कहेगा ।

 

मैं हूं, मेरा गम है केवल, फिर कितनी वादाव कहेगा ?

 

मैंने उसे हमेशा चाहा, फिर क्या इसके बाद कहेगा ?

 

खुश है तूं दुनिया में फिट क्यों, कोई तुझे नाशाद कहेगा ?

 

खत्म हुआ जीवन का नाटक, फिर क्या तू संवाद कहेगा ?

 

'हरीश्श' सहेगा गम के झौंके, जग क्यों न फौलाद कहेगा ?

 

(१४६)

 

सदिययं बीतीं प्यार बिना । हां, तेरे दीदार बिना ।

 

पथ पर आंखें टिकी रहीं, हां, तेरे इन्तजार बिना ।

 

कब से खाली हाथ खड़ा, प्रिय तेरे उपहार बिला ।

 

वने वन देखो भटक रहा, अपने ही घर बार बिना ।

 

कवि 'हटरीथ' अकेला है, देखो अपने यार बिना ।

 

(१४७)

 

किस तरह जिन्दगी हम गुजारा करें ? जो तुम्हे रात-दिन हम पुकार करें।

 

जमाने की नजरें बहुत तेज हैं, भला कैसे फिर हम इथारा करें ?

 

चड़पता है दिल तेरे दीदार को, कहां पर कहो हम नजारा करें ?

 

मिल गया खत तुम्हारा इसी श्याम को, शुक्रिया आज वो हम तुम्हारा करें।

 

तेरे संग में रहे तो मजा आ गया, अब जुदाई नहीं हम गवारा करें ।

 

तुम मेरे सामने से चले आ रहे, फिर कैसे बता हम किनारा करें ।

 

ये 'हरीश' तो तुम्हारा रहेगा सदा, तन्हा रह के ये हम विचारा करें।