Harisingh Harish ki Kavitayen v Samiksha - 3 in Hindi Book Reviews by राज बोहरे books and stories PDF | हरिसिंह हरीश की कविताएं व समीक्षा - 3

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हरिसिंह हरीश की कविताएं व समीक्षा - 3

हरिसिंह हरीश की कविताएं  व समीक्षा

मेरा खत न मिलने पर 3

हरि सिंह हरीश एक  कर्मठ कवि थे। अपनी हैसियतों के भीतर लिखने वाले। अपने शब्दकोश के भीतर लिखने वाले और विषय के दायरे में भी लगभग सीमित रहने वाले। उनका मुख्य विषय था प्रेम और प्रेम। जब विषय रखेंगे तो प्रेमिका भी आएगी। प्रेमिका की याद भी आएगी। मिलन भी आएगा और मिलन के क्षणों की हरकतें भी याद आएंगे। प्रेमिका से उलझना भी याद आएगी। उनके द्वारा कविता और उपन्यास लिखने का काम पूजा की तरह किया जाता था। सुबह 6:00 बजे जाग जाते और लिखना शुरू कर देते। उन्होंने 39 उपन्यास लिखे। उनके पास 10000 गीत हैं। उनके लिखे 25000 मुक्तक हैं। उनकी लगभग 15000 गजल हैं। अगर गीत शास्त्र या ग़ज़ल के आलोचना शास्त्र से इन रचनाओं का आकलन करें तो शायद इनमें से कम ही खरे उतरेंगे ।लेकिन मनमौजी कवि थे । एक कस्बे का कवि। इसका देखने का दायरा , अनुभव करने का दायरा कस्बे के कवि की तरह ही था। न उंन्का   देश के किसी व्यक्ति से कंपटीशन था, न देश के किसी बड़े संस्थान से किताब छापने की लालसा। पत्रिका भी बड़ी नहीं चाहते थे वे। छोटे-मोटे पत्र पत्रिकाओं में छप लेते थे और कवि गोष्ठी में सुन लेते थे। उनके प्रकासन उनकी शुरुआत ‘कली भवरे और कांटे’ उपन्यास से हुई जो उनका 40 व उपन्यास था। पर इसके बाद के 39 उपन्यास अब प्रकाशित ही रह गए। उन्होंने ‘मन के गीत नमन के अक्षर”  के नाम से एक व्यक्ति गीत संग्रह भी प्रकाशित कराया था। इसके बाद फिर प्रोफेसर पर शुक्ला (परशुराम शुक्ल) की प्रेरणा मिली । डॉक्टर हरिहर गोस्वामी द्वारा दिया गया आशीर्वाद सहयोग और शहर के बहुत तेरे लोगों की अप्रिशिएसन से उन्होंने अपने अन्य किताबों का प्रकाशन शुरू किया। दतिया काव्य धारा 3 का उन्होंने संपादन किया और अपनी लगभग एक दर्जन किताबें उन्होंने विभिन्न संग्रह में शामिल की और छपाई। उनके एक रचना संग्रह पर यह टिप्पणी और टिप्पणी के साक्ष्य में उनकी रचनाएं प्रस्तुत हैं -

 

(३१)

 

तुमने हमें भुलाकर छोड़ा, बिल्कुल हमें मिटाकर छोड़ा । खुशियां तो तुम दे न पाये, ग़म दे हमें रुलाकर छोड़ा ।

 

सावन के झूले न झूले, खुशियों में हम कभी न फूले । तुम्हें याद ही करते-करते, हम सारी दुनिया को भूले ।

अपने अनगिन दुःख-दर्दों में, तूने हमें भुलाकर छोड़ा । खुशियां तो तुम दे न पाये, ग़म दे हमें रुलाकर छोड़ा ।

 

सुख की सांस न लेने दी है, सदा ज़रा न देने दी है। फंसी रही किश्ती तूफां में, क्यों तूने न खेने दी है ?

बिछा प्रेम की मन में शैया, मरघट बीच सुलाकर छोड़ा । खुशियां तो तुम दे न पाये, ग़म दे हमें रुलाकर छोड़ा ।

 

सदियां बीतीं तुम न आये, पल भर तुम्हें देख न पाये । झूठी कसमें खाकर तूने, कितने सब्जबाग दिखलाये ?

प्रेम रोग देकर के तुमने, तिल-तिल हमें जलाकर छोड़ा । खुशियां तो तुम दे न पाये, ग़म दे हमें रुलाकर छोड़ा ।

 

कब क्या होगा, जब क्या होगा, तुम्हीं बताओ अब क्या होगा? मेरे नयन बन्द होने पर, तुम आओगे तब क्या होगा ? जिन्दा लाश हमारी करके, तूने जगत हंसाकर छोड़ा । खुशियां तो तुम दे न पाये, ग़म दे हमें रुलाकर छोड़ा ।

 

३२)

 

तेरा नाम ले रहे हैं हम बार बार देखो । होता है किस कदर से दिल बेकरार देखो ?

 

सदियां गुजर गई हैं पर दीदार हो न पाया । मेरी बेकरारियों को करार हो न पाया ।

कर-कर के थक गए हम तेरा इन्तज़ार देखो । होता है किस कदर से दिल बेकरार देखो ?

 

तू है नहीं हमारा दिल मानता नहीं है । कैसे कहें तू हमको पहचानता नहीं है ।

 यह सोच करके अरमां हैं तार-तार देखो । होता है किस कदर से दिल बेकरार देखो ?

 

मेरे बनोगे इक दिन, मुझसे कहा था तुमने । मेरे लिए ग़मों को, कितना सहा था तुमने ?

तुम हो गये पराये, यह मेरी हार देखो । होता है किस कदर से दिल बेकरार देखो ?

 

इस जन्म मिल न पाये, उस जन्म क्या मिलोगे ? लगता है हर जनम में, मुझको यूं ही छलोगे ।

 जो अश्क़ों का दे रहे हमें उपहार देखो । होता है किस कदर से दिल बेकरार देखो ?

 

टोका था ज़माने ने, पर मैंने न बात मानी । तेरा प्यार नहीं सच्चा, मैंने न बात जानी ।

मेरे सनम का यारो झूठा यह प्यार देखो । होता है किस कदर से दिल बेकरार देखो ?

 

३३)

 

किस तरह भूलूं तुम्हें, यह समझ पाता नहीं ? क्या करूं ? क्या न करूं? यह समझ आता नहीं ?

 

वो बोलना तेरा, वो तेरा मुस्कुराना याद है । मुझको तेरे प्यार का वो ज़माना याद है ।

 दिल मेरा गुजरा ज़माना भूल अब पाता नहीं । क्या करूं ? क्या न करूं? यह समझ आता नहीं ?

 

वो तुम्हारी मांग टेड़ी, वो भाल पर बिन्दी तेरी । मेरे दिल को भा गई थी, वो भाल की बिन्दी तेरी ।

तेरा चेहरा भा गया तो कोई अब भाता नहीं । क्या करूं ? क्या न करूं? यह समझ आता नहीं ?

 

वो तेरा पनघट पे जाना, याद है मुझको अभी । वो तेरा फिर लौट आना, याद है मुझको अभी ।

तुम नहीं दिखती वहां तो, मैं भी अब जाता नहीं । क्या करूं ? क्या न करूं ? यह समझ आता नहीं ?

 

वो बोलना तेरा, वो तेरा आना-जाना याद है । वो दूसरों को देखकर बातें बनाना याद है ।

यह तेरा सब कुछ प्रियतमे । भूल मैं पाता नहीं । क्या करूं ? क्या न करूं? यह समझ आता नहीं ?

 

तू जुदा जबसे हुई, यह ज़िन्दगी कुछ भी नहीं । तेरे बिन तो ज़िन्दगी की अब खुशी कुछ भी नहीं ।

क्या करूं मैं यार मेरे कुछ बता पाता नहीं ? क्या करूं? क्या न करूं? यह समझ आता नहीं ?

 

३४)

 

तुम कितने बेवफा हो, हम जान गए हैं ? अय जाने-जां तुम्हें हम पहचान गए हैं।

 

पहले की तरह तुम हमें अब देखती नहीं । क्या हाल है हमारा अब यह पूछती नहीं ?

लगता है किसी दिन का बुरा मान गए हैं। अव जाने-जर्जा तुम्हें हम पहचान गए हैं।

 

न हंसते-मुस्कुराते, न बोलते हो तुम । क्या राज़ रखे दिल में, न खोलते हो तुम ?

न जाने अपने दिल में क्या ठान गए हैं ? अब जाने-जां तुम्हें हम पहचान गए हैं।

 

जबसे गए हो रूठ के खत डालते नहीं । गुस्सा हमारे ऊपर भी निकालते नहीं ।

फिर साथ लिए जां क्यों मेरी जान गए हैं ? अय जाने-जां तुम्हें हम पहचान गए हैं।

 

चाहत का सिला खूब हमें दे के गए हो । मुझे छोड़, मेरी जान क्यों तुम ले के गए हो ?

 नजरें बताओ ऐसी क्यों तान गए हैं ? अय जाने-जां तुम्हें हम पहचान गए हैं

 

 

३५)

 

बोलिये चाहे नहीं, खत तो डाला कीजिये । फूल कोई प्यार का हम पर उछाला कीजिये ।

 

हम बुरे हैं, हमने माना, पर तुम्हारे हैं तो हम । ज़िन्दगी के इस सफ़र में, कुछ सहारे हैं तो हम ।

इस सच्चाई पर जरा नज़रें तो डाला कीजिये । फूल कोई प्यार का हम पर उछाला कीजिये ।

 

हम नहीं होंगे तो तुमको, बाद मेरी आयेगी । याद मेरी आयेगी तो उम्र भर तड़पायेगी ।

इसलिए दिल से हमें न यूं निकाला कीजिये । फूल कोई प्यार का हम पर उछाला कीजिये ।

 

छा रहा ग़म का अन्धेरा, कुछ खुशी पैदा करो। इन बन्द होंठों को ज़रा सी, कुछ हंसी पैदा करो।

इस अंधेरे में सनम कुछ तो उजाला कीजिये । फूल कोई प्यार का हम पर उछाला कीजिये ।

 

मैं भी ख़त लिख रहा हूं, तुम भी लिखा करो । तुम भी कभी निकलकर, मुझको दिखा करो ।

 दिल अगर बेचैन होतो फिर संभाला कीजिये । फूल कोई प्यार का हम पर उछाला कीजिये ।

 

इस जहां में कोई अपना है नहीं तेरे सिवा । तेरे दम से धड़कनों में आती-जाती है हवा ।

इन धड़कनों को, धड़कनों से देखा-भाला कीजिये । फूल कोई प्यार का हम पर उछाला कीजिये ।

 

मानिये कहना हमारा हां, ख़त कभी लिखा करे। ख़त की अपनी भावना में तुम मुझे दिखा करे।

घर के थोड़े काग़जों को थोड़ा काला कीजिये । फूल कोई प्यार का हम पर उछाला कीजिये ।

 

आजकल करते रहोगे, या व्रत भी डालोगे कभी । मेरी तरह फूल भी मुझ पर उछालो कभी।

न आजकल करते ही करते, मेरी बात टाला कीजिये । फूल कोई प्यार का हम पर उछाला कीजिये ।

 

३६)

 

खात तुम्हारे प्यार की यादें दिलाते हैं हमें । पड़ते-पढ़ते देखिये कितना रुलाते हैं हमें ?

 

तू मुझे पानी भरे पनघट से आती दिख गई । तो समड़ा लो एक कविता और तुझपर लिख गई ।

यह नज़ारा देखने फिरसे बुलाते हैं हमें । पढ़ते-पढ़ते देखिये कितना रुलाते हैं हमें ?

 

तू कभी थाली लिए खाना खिलाने आ गई । तो समझ लो एक कविता तू लिखाने आ गई ।

इस हंसी ख्यालात का मंजर दिखाते हैं हमें । पढ़ते-पढ़ते देखिये कितना रुलाते हैं हमें ?

 

तू कर रही हमको इशारा, ख़त थमाने के लिए । यह इशारा कम न था, तेरे पास जाने के लिए।

हां, यह इशारे आज तक कितना सताते हैं हमें ? पढ़ते-पढ़ते देखिये कितना रुलाते हैं हमें ?

 

हां, जब से तू होली जुदा तब से खबर आई नहीं । कितना अर्सा हो गया है, तू फिर इधर आई नहीं ।

वह तुम्हारे दर्दों-ग़म कितना जलाते हैं हमें ? पड़ते-पढ़ते देखिये कितना रुलाते हैं हमें ?

(३७)

 

घेरे साथ तुम नहीं हो, होते तो बात करते । दिन यूं नहीं गुज़रता, हंस-हंस के रात करते ।

 

हम दोनों मिलके सुख के सपने सजाते रहते । वही गीत प्यार का हम गुनगुनाते रहते ।

 खुशियों की इस तरह से हंसके सौगात करते । दिन यूं नहीं गुज़रता, हंस-हंस के रात करते ।

 

कभी हाथ तेरा लेके धीरे से चूम लेते । कभी यूं उठा के तुमको खुशियों से झूम लेते ।

हम मिलके इस तरह से, सुख के हालात करते। दिन यूं नहीं गुज़रता, हंस-हंस के रात करते ।

 

कभी एक साथ मिलके चाहत का गीत गाते । कभी हार जाते हम कभी तुमसे जीत जाते ।

जो कर सके न अब तक वो तेरे साथ करते । दिन यूं नहीं गुज़रता, हंस-हंस के रात करते ।

 

राधा बनाके तुमको, बन जाता में कन्हैया । फिर नाचते हम दोनों, कर-करके ता-ता थैया ।

 जीवन की सारी खुशियां, हम अपने हाथ करते । दिन यूं नहीं गुज़रता, हंस-हंस के रात करते ।

 

डोली विठा के तुझको घर अपने लेके जाते । फूलों की सेज पर फिर घूंघट तेरा उठाते ।

तुझे जीत करके वारा दुनिया की मात करते । दिन यूं नहीं गुज़रता, हंस-हंस के रात करते ।

३८)

 

कैसी चाहत है तुम्हारी, ख़त तलक भेजा नहीं । आखरी सांसें बची हैं, अब तलक भेजा नहीं ।

 

चार दिन को थे हमारे, उम्र भर को गैर हो । खुश रहो मेरी तमन्ना, तुम पे खुदा की खैर हो ।

 आज कल कहते रहे, आखरी सांसें बची हैं, अब तलक भेजा नहीं । अब तलक भेजा नहीं ।

 

हो गए हैं हम तुम्हारे, मैं दुल्हन तेरी बनूंगी, बस यही कहते रहे । बस यही कहते रहे ।

बन गई दुल्हन किसी की, यह तलक भेजा नहीं । आखरी सांसें बची हैं, अब तलक भेजा नहीं ।

 

मुझ पे जां देने की तेरी, बात केवल बात थी । आज यह लगने लगा है, वह तुम्हारी घात थी ।

 तुम किस तरह रहती वहां पर, यह तलक भेजा नहीं । आखरी सांसें बची हैं, अब तलक भेजा नहीं ।

 

यह हाल तेरा देख करके, मन मेरा रोने लगा । तुम हमारे हो नहीं अब यह यहीं होने लगा ।

 भूल जाओ अब मुझे तुम, यह तलक भेजा नहीं । आखरी सांसें बची हैं, अब तलक भेजा नहीं ।

 

३९)

दिन, महीने और सालें बीती, लेकिन तुमने ख़त न डाला । आंखें तक फेरे बैठे हो, और जुबां पर देकर ताला ।

 

इतना भी क्या कम था तुमको, लेकिन तुमने थोड़ा समझा । जिस घर से चलकर आए थे, उसको तुमने छोड़ा समझा ।

 गैरों के घर जाकर बैठे, अपना घर देखा न भाला । आंखें तक फेरे बैठे हो, और जुबां पर देकर ताला ।

 

तुमने हमको खूब रुलाया, लेकिन कब आंसू देखे हैं । हम रोते ही रहे हमेशा, मेरे दर्द कहां लेखे हैं ?

फूलों की बगिया में बैठे, तोड़ प्यार के मन की माला । आंखें तक फेरे बैठे हो, और जुवां पर देकर ताला ।

 

इस जीवन में मिले न तुम तो, फिर क्या मिलना मुमकिन होगा ? जीवन में खिली न कलियां फिर क्या खिलना मुमकिन होगा ? इस जीवन में डाल न पाये, गले हमारे तुम जयमाला । आंखें तक फेरे बैठे हो, और जुवां पर देकर ताला ।

 

तूने बड़ा दिया है धोखा, यह अच्छा व्यवहार किया है । मुझे फंसाकर तूने दिलवर, झूठा मूठा प्यार किया है ।

 मैं तो हूं ख़ामोश यहां पर, तूने मगर बहुत कह डाला । आंखें तक फेरे बैठे हो, और जुबां पर देकर ताला ।

 

तूने प्यार न जाना मेरा, मेरा प्यार हक़ीकत था प्रिय, और मुझे बेगाना समझा । जिसे क्यों अफसाना समझा ?

 इससे अच्छा यही था प्रियवर, मुझे पिला देती विष-प्याला । आंखें तक फेरे बैठे हो, और जुबां पर देकर ताला ।

 

४०)

 

दर्द तुम्हारा लिये रहूंगा, अन्तर की गहराई में। सदियों तक यह यहीं रहेगा, चाहत की अपराई चें।

 

यह मेरे अन्तर में डोले, शोणित की धारा सा बनकर । जिसको मैंने बन्द किया है, सांसों की कारा में चुनकर ।

 मैं जब तक जीता दुनिया में, फेकू इसे न खाई में । सदियों तक यह यहीं रहेगा, चाहत की अमराई में।

 

रातें यहां बनी रहती हैं, सुबह न होती यहां कभी । तम ही केवल सोता रहता, सुबह न सोती यहां कभी ।

सभी यहां ऐसे दिखते हैं, जैसे हों परछाई में । सदियों तक यह यहीं रहेगा, चाहत की अमराई में ।

 

सूरज यहां नहीं उगता है, चांद निकलता नहीं कभी । आंसू यहां बहा करते हैं, कोई हंसता नहीं कभी ।

 फिसलन यहां बहुत होती है, जैसे चलते काई में । सदियों तक यह यहीं रहेगा, चाहत की अमराई में ।

 

दर्द यहां नस-नस में रहता, उँगली रखो जहां कहीं । जिधर तुम्हारी नज़र जायेगी, दर्द दिखेंगे तुम्हें वहीं ।

मेरा दर्द नहीं तुम तोलो, इक दाने भर राई में । सदियों तक यह यहीं रहेगा, चाहत की अमराई में ।

 

दर्द प्बार का पीने वालो, तुम यहां सुखी न रह सकते । वार अगर आ जायेगा तो, फिर तुम दुखी न रह सकते ।

 प्यार न लेकिन तुम्हें मिलेगा, इस दुनिया हरजाई में। सदियों तक यह यहीं रहेगा, चाहत की अमराई में ।

 

४१)

 

मन का दर्पण तोडने वाले, तेरा दिल आबाद रहे । तेरी खातिर सब सह लेंगे, लेकिन तू बस शाद रहे ।

 

अपना क्या है, हमने सीखा, आहें भरना, आंसू पीना ? प्यार की खातिर चुप की रहना, घुट-घुट करके मरना जीना ।

फिर भी अपने इन होंठों पर, नहीं कभी फरियाद रहे । तेरी खातिर सब सह लेंगे, लेकिन तू बस शाद रहे ।

 

वृंही रहेंगे, यूंहीं जियेंगे, हमने अब तो ठान लिया । क्यों छोड़ेंगे साथ तुम्हारा, जबकि अपना मान लिया ?

इक-दूजे के हैं हम दोनों, केवल ये बस याद रहे । तेरी खातिर सब सह लेंगे, लेकिन तू बस शाद रहे ।

 

जब तक तन में जान है बाक़ी, तब तक तुम्हें पुकारेंगे । याद करेंगे हरदम तुमको, हरगिज नहीं बिसारेंगे ।

बार-बार यह दुआ करेंगे, तू शाद रहे, आबाद रहे । तेरी खातिर सब सह लेंगे, लेकिन तू बस शाद रहे ।

 

हमको ग़म की जंजीरों में क़ैद किया है अपनों ने । लूट लिया है हमको तेरे सुन्दर-सुन्दर सपनों ने ।

हमतो ऐसे भी जी लेंगे, लेकिन तू आज़ाद रहे । तेरी खातिर सब सह लेंगे, लेकिन तू बस शाद रहे ।

 

४२)

तुम्हारा दर्द पाले हैं, तुम्हारा ग़म संभाले हैं । तुम्हें मालूम क्या होगा कि क्या-क्या हम संभाले हैं ?

 

हमारा हाल ऐसा है, तुम्हारा हाल कैसा है ? ज़रा आकर बता जाओ, वहां पर हाल कैसा है ?

न जीते हैं, न मरते हैं, फ़क़त कुछ दम संभाले हैं। तुम्हें मालूम क्या होगा कि क्या-क्या हम संभाले हैं ?

 

हमारे हाल ढीले हैं, हमारे जख्म गीले हैं । हमारी ज़िन्दगी के तो सभी हालात गीले हैं ।

कि थामे दिल-जिगर बैठे कि चश्मे नम संभाले हैं। तुम्हें मालूम क्या होगा कि क्या-क्या हम संभाले हैं ?

 

हमारे दिल में तूफां है, हमारे लब पे नाले हैं । हमारी खो गई मंज़िल, हमारे पांव छाले हैं ।

फसाना आंसुओं का है, नहीं कुछ कम संभाले हैं। तुम्हें मालूम क्या होगा कि क्या-क्या हम संभाले हैं ?

 

बना रखा तेरा इक बुत उसी को पूजते रहते । बता क्या है कमी तुझ में उसी से पूछते रहते ?

कभी आंचल, कभी चेहरा, कभी हम ख़म संभाले हैं। तुम्हें मालूम क्या होगा कि क्या-क्या हम संभाले हैं ?

 

४२)

 

तुम्हारा दर्द पाले हैं, तुम्हारा ग़म संभाले हैं। तुम्हें पालूम क्या होगा कि क्या-क्या हम संभाले हैं ?

 

हमारा हाल ऐसा है, तुम्हारा हाल कैसा है ? ज़रा आकर बता जाओ, वहां पर हाल कैसा है ?

न जीते हैं, न मरते हैं, फ़क़त कुछ दम संभाले हैं। तुम्हें मालूम क्या होगा कि क्या-क्या हम संभाले हैं ?

 

हमारे हाल डीले हैं, हमारे जख्म गीले हैं। हमारी ज़िन्दगी के तो सभी हालात गीले हैं ।

कि थामे दिल-जिगर बैठे कि चश्मे नम संभाले हैं। तुम्हें मालूम क्या होगा कि क्या-क्या हम संभाले हैं ?

 

हमारे दिल में तूफां है, हमारे लब पे नाले हैं। हमारी खो गई मंज़िल, हमारे पांव छाले हैं ।

 फसाना आंसुओं का है, नहीं कुछ कम संभाले हैं। तुम्हें मालूम क्या होगा कि क्या-क्या हम संभाले हैं ?

 

बना रखा तेरा इक बुत उसी को पूजते रहते । बता क्या है कमी तुझ में उसी से पूछते रहते ?

कभी आंचल, कभी चेहरा, कभी हम ख़म संभाले हैं। तुम्हें मालूम क्या होगा कि क्या-क्या हम संभाले हैं ?

 

४३)

 

मन के तार न सूना भाई, मन के तार न छूना । क्यों सिर लेते हो अपने, दुःख दर्द को दूना ?

 

जग की लाख विषमताओं का इनमें भरा है रोदन । जिसमें अब तक मानवता ने किया नहीं संशोधन ।

 सम का नाम नहीं पाओगे हर ठौर है इसका उना । यन के तार न छूना भाई, पन के तार न छूना ।

 

गहन तिमिर में भटक रहा है, वहाँ बन का उजियारा । अब तक इसको मिला नहीं है चाहत का गलियारा ।

पड़ा हुआ है कोना-कोना देखो इसका सूना । मन के तार न छूना भाई, मन के तार न छूना ।

 

जग जैसे जगमग होता है, ये ऐसे बुझता है। बदली में ज्यों चंदा छुपता, ये ऐसे छुपता है।

 इसके अरमानों का सबने किया अभी तक खूंना । मन के तार न छूना भाई, पन के तार न छूना ।

 

(४४)

 

लोगों को मंज़िल मिलती है, चलते-चलते राह में । हम ही ऐसे रहे अभागे, दर्द मिला है चाह में ।

 

कैसे कहदें जग ने लूटा, हमको भरी बहार में ? बुरा मान लेती है दुनिया, कहदें अगर हजार में ।

वहीं दर्द गीतों में मेरे, जो है मेरी आह में । हम ही ऐसे रहे अभागे, दर्द मिला है चाह में।

 

अपनों ने ही मारा हमको, छुरा भौंक कर सीने में। मौत खड़ी है तूफां बनकर, दिल के आज सफीने में।

सभी खड़े हैं मुझे देखने, नफरत भरे निगाह में। हम ही ऐसे रहे अभागे, दर्द मिला है चाह में।

 

हम पर कैसे जुल्म हो रहे, कैसे कहें कहानियां ? ऐसी-ऐसी दी लोगों ने, नफ़रत भरी निशानियों ।

 किसको लाकर खड़ा करें हम, अपनी आज गवाह में ? हम ही ऐसे रहे अभागे, दर्द मिला है चाह में ।

 

 

४५)

उफना-उफना दर्द न बैठा, मैंने बहुत फूंक कर देखा । ताकत अपनी खूब लगाकर, मैंने बहुत हुक कर देखा ।

 

जाने कैसे लोग यहां के, दर्द पराया नहीं समझते ? मन की बात समझ न पाते, बात-बात में खूब उलझते ।

यही सोचकर हृदय देखिये, मैंने बहुत मूक कर देखा । ताक़त अपनी खूब लगाकर, मैंने बहुत हूक कर देखा ।

 

रात-रात भर हर करवट पर, पीड़ा को मैंने सहलाया । पर अपनों की चूक न मानी, खुद को ख़ताबार ठहराया ।

नींद न आई मुझे रात भर, मैंने बहुत कैंचकर देखा । ताक़त अपनी खूब लगाकर, मैंने बहुत हूक कर देखा ।

 

कहते हैं कुछ रो लेने से, पीड़ा कुछ हल्की हो जाती । आंखों में ठण्डक आ जाती, अश्रु-बूंद शबनम हो जाती ।

इसीलिए तो हर आंसू को, मैंने बहुत घूमकर देखा । ताक़त अपनी खूब लगाकर, मैंने बहुत हूक कर देखा ।

 

कली, फूल, तितली को देखा, रंग-बिरंगे चित्र बनाये । बुला दिखाया जब लोगों को, बोले बड़े बिचित्र बनाये ।

गंध न आई उनमें तेरी, मैंने बहुत सूंघकर देखा । ताक़त अपनी खूब लगाकर, मैंने बहुत हूक कर देखा ।

 

लोग यही बतलाया करते, मरघट तो जलता रहता है । दुनिया के हर इक मानव को, यह मरघट छलता रहता है।

नहीं बचाया मुझे किसी ने, मैंने बहुत चीखकर देखा । ताक़त अपनी खूब लगाकर, मैंने बहुत हूक कर देखा ।

 

कोयल कितना रस बरसाती, जब वह गीत सुनाती हमको । मन अपना कितना खिल जाता, जब वह मीत दिखाती हमको?

 कूक न पावा मैं कोयल सा, मैंने बहुत कूक कर देखा । ताक़त अपनी खूब लगाकर, मैंने बहुत हूक कर देखा ।

 

ऊंचे पर्वत पर चढ़ करके, मैंने धरती ओर निहारा । नहीं दिखा है मुझे कहीं पर तेरा प्रियवर मुझे सहारा ।

नहीं बचाने आया कोई, मैने बहुत कुंदकर देखा । ताक़त अपनी खूब लगाकर, मैंने बहुत हुक कर देखा ।

 

(४६)

 

मैं अपना दिल बहलाने को, अश्क़ों को बहाया करता हूं। तकदीर में रोना लिखा है, यह बात छुपाया करता हूं ।

यह मेरी अपनी मजबूरी, जो उनसे इतनी है दूरी । मैं लाख हंसूं तो क्या होता, पर रोने की है मजबूरी ।

मैं दर्द के नगमें गा-गाकर मन को बहलाया करता हूं।तकदीर में रोना लिखा है, यह बात छुपाया करता हूं।

 

जो सपने हैं इन आंखों में, वो पूर्ण नहीं हो पायेंगे ।

मैं घर भी जाऊं तो भी ये चूर्ण नहीं हो पायेंगे ।

मैं मन की भूल भुलैयों में ख़ुद को ही भुलाया करता हूं।

तकदीर में रोना लिखा है, यह बात छुपाया करता हूं ।

 

यह जीवन जब बेकार गया तो जीने का मतलब है क्या ?

 दुःख दर्द कलेजा फाड़ चुके, तो सीने का मलतब है क्या ?

मैं ग़म के दहके शोलों में, खुद को ही जलाया करता हूं।

तकदीर में रोना लिखा है, यह बात छुपाया करता हूं ।

 

यह दुनिया एक तमाशा है, जिसमें मैंने भी काम किया ।

 लोगों की खातिर देखो तो खुद को कितना बदनाम किया ?

 जो द्राग दिये हैं अपनों ने, सीने से लगाया करता हूं ।

 तकदीर में रोना लिखा है, यह बात छुपाया करता हूं ।

 

४७)

मंज़िलें दर मंज़िलें मैं पार करता जाऊंगा । आदमी हूं, आदमी को प्यार करता जाऊंगा ।

 

मुझको यारो ग़म नहीं गर ज़िन्दगी कुर्बान हो । हो अगर इस बात से, हर आदमी का मान हो ।

तो जगमगाता हर तरफ संसार करता जाऊंगा । आदमी हूं, आदमी को प्यार करता जाऊंगा ।

 

नाम जिसका भी हुआ, यहां प्यार से ही तो हुआ । इस अजूबे, इस करिश्मे इकरार से ही तो हुआ ।

 प्यार के जज्बे का मैं प्रचार करता जाऊंगा । आदमी हूं, आदमी को प्यार करता जाऊंगा ।

 

दिल अगर सीने में हो तो दिल का कहना मान लो । यह हकीकत ज़िन्दगी की प्यार करके जानलो ।

प्यार कर सब पे ही मैं अधिकार करता जाऊंगा । आदमी हूं, आदमी को प्यार करता जाऊंगा ।

 

नफ़रतों को इस जहां से तोड़ फेकूंगा कभी । नफ़रतों के हाथ को झंझोड़ फेकूंगा कभी ।

 प्यार करने वालों का सत्कार करता जाऊंगा । आदमी हूं, आदमी को प्यार करता जाऊंगा ।

 

मुझको सच्चे प्यार का परचम उड़ाना है यहां । नफ़रतों की सांस को जड़ से मिटाना है यहां ।

ज़र्रा-ज़र्रा प्यार से गुलज़ार करता जाऊंगा । आदमी हूं, आदमी से प्यार करता जाऊंगा ।

 

४८)

 

तन हमारा प्यार में, रंगकर बसन्ती हो गया । मन हमारा प्रेम करके, प्रेम पंथी हो गया ।

 

जब से देखा है तुम्हें, मैं याद अपनी खो चुका । याद बस इतना रहा कि मैं तुम्हार हो चुका ।

तेरा-मेरा नाम जैसे, नल-दमयन्ती हो गया । मन हमारा प्रेम करके, प्रेम पंथी हो गया ।

 

प्रेम के सारे फसाने, अब पुराने हो गये । इस तरह के देखियेगा, हम दीवाने हो गये ।

अपनी मुहब्बत देखकर, ये जग रसवन्ती हो गया । मन हमारा प्रेम करके, प्रेम पंथी हो गया ।

 

रच गया है गीत देखो, प्यार के परिवेश का । इक चहेते प्रेम के सुन्दर-सुहाने भेष का ।

श्रृंगार सारे गीत का यूं पंक्ति-पंक्ति हो गया । मन हमारा प्रेम करके, प्रेम पंथी हो गया ।

 

बन गई राधा तू मेरी, मैं बन गया तेरा कन्हैया । नाचते हैं झूम करके, हम दोनों अब ता-ता-थैया ।

 प्यार अपना कृष्ण की माला, बैजन्ती हो गया । मन हमारा प्रेम करके, प्रेम पंथी हो गया ।

 

सब कह रहे हैं प्यार-पावन इनके जैसा हो । हो अगर तो प्यार  सबका सिर्फ ऐसा हो ।

सारेजग मे यह युगल मन किम्व्दंति हो गया !  मन हमारा प्रेम करके, प्रेम पंथी हो गया ।

 

 

(४९)

 

दर्द में डूबे हुए हैं, मुस्कुराये भी तो क्या ? ग़म के घेरे में खड़े हैं, गुनगुनाये भी तो क्या ?

हम वो नगमें हैं जो अक्सर होंठ पर आते नहीं । नाम अपना भूल करके कोई भी लाते नहीं ।

हम किसी को अपनी खातिर आजमायें भी तो क्या ? ग़म के घेरे में खड़े हैं, गुनगुनाये भी तो क्या ?

 

हमने साग़र पी लिए हैं, आंसुओं के झूमकर । हम ग़मों में जी रहे हैं हर खुशी को चूमकर ।

हम नशों में डूबकरके, डगमगायें भी तो क्या ? गम के घेरे में खड़े हैं, गुनगुनाये भी तो क्या ?

 

हम बुरे हैं जब किसी को फिर ज़माना क्या करे ? दिल है अपना मुश्किलों में फिर बहाना क्या करें ?

हम किसी तरह ज़रा सा खिलखिलायें भी तो क्या ? ग़म के घेरे में खड़े हैं, गुनगुनाये भी तो क्या ?

 

(५०)

 

 

दर्द ने होंठों को चूमा, झिड़कियां मिली प्यार में। मन खिला है ग़म उठाकर, फूल के आकार में।

 

अब नहीं कोई तमन्ना, अब न कोई आरजू । भूल बैठा प्यार को मैं, जब से भूली मुझको तू ।

 इक नयापन आ गया है, जीने की रफ़्तार में। मन खिला है ग़म उठाकर, फूल के आकार में।

 

काश ! पहले कहते हमसे, हम तुम्हारे हैं नहीं । ज़िन्दगी के रास्ते में हम सहारे हैं नहीं।

 तो हमें ग़म क्यों ये मिलते बोलिये संसार? मन खिला है ग़म उठाकर, फूल के आकार में ।

 

बरबाद करके ज़िन्दगी मेरी कहां पर चल दिये ? तुमको खोकर ऐ तमन्ना हाथ हमने भल लिये ।

 हम यूंही काटेंगे जीवन यार के इन्तज़ार में । मन खिला है ग़म उठाकर, फूल के आकार में ।

 

५१)

 

ये रात बड़ी होती, मुलाकात बड़ी होती । तुम साथ अगर होते, हर बात बड़ी होती ।

 

हाथों में हाथ लेकर, आंखों में देखते हम । है कितना प्यार तुमको, सांसों में देखते हम ।

 अपने लिए यही तो कायनात बड़ी होती ।

तुम साथ अगर होते, हर बात बड़ी होती ।

 

हम भी तो समझ लेते कि तकदीर रंग लाई । खुश देखने को हमको, दुनिया मेरी मुसकाई ।

 अपनी तो फिर खुशी की बरसात बड़ी होती । तुम साथ अगर होते, हर बात बड़ी होती ।

 

दुल्हन तुम्हें बनाके, डोली में बिठा लाता । दुनिया से छुड़ा करके, तुम्हें अपना बना लाता ।

पहले मिलन की अपनी ये रात बड़ी होती । तुम साथ अगर होते, हर बात बड़ी होती ।

 

कई रातें गुज़रतीं, पर बातें न ख़त्म होतीं । अपने मिलन की ऐसे यह रातें ख़त्म न होतीं ।

 फिर चाहतों की अपनी सौगात बड़ी होती । तुम साथ अगर होते, हर बात बड़ी होती ।

 

५२)

 

मेरा जीवन जनम जनम का प्यासा है। इस जीवन में प्यास बुझेगी आशा है।

 

जबसे तुमको देख लिया तनहाई में । मन कहता है, मिल बैठें अमराई में ।

मन की तो बस इतनी सी अभिलाषा है। इस जीवन में प्यास बुझेगी आशा है।

 

दिन को तड़पूं, रात जागकर के काटूं । पल-पल रोऊं, जीवन को तिल-तिल बांटू ।

 पीड़ा में खोई जीवन परिभाषा है। इस जीवन में प्यास बुझेगी आशा है।

 

तेरी सूरत मन को कुछ ऐसी भाई । जब भी आई याद तुम्हारी ही आई ।

समझ न पाऊं मन की कैसी भाषा है ? इस जीवन में प्यास बुझेगी आशा है।

 

मिलने का वादा करते मुस्कानों में । कह जाते आ सपनों में कुछ कानों में ।

आओगे या कोरी हमें दिलासा है । इस जीवन में प्यास बुझेगी आशा है।

 

क्यों भोले मन को विश्वास दिलाते हो ? क्यों अमृत के बदले जहर पिलाते हो ?

सच कहते हो या केवल फिर यह झांसा है। इस जीवन में प्यास बुझेगी आशा है ।

 

तुमसे मिलकर मज़ा बहुत आ जायेगा । मिलकर घन जब बातों में खो जायेगा ।

कुछ भी कहलो, लेकिन बात खुलासा है। इस जीवन में प्यास बुझेगी आशा है।

 

 

 तुम में हमने देख लिया कुछ अनहोना । तुमने शायद कर डाला जादू टोना ।

 हमने तेरे दिल में प्यार तलाशा है । इस जीवन में प्यास बुझेगी आशा है ।

 

तुम पूनम का चांद, अमा का मैं तारा । तुम शबनम, मैं हूं धरती का अंगारा ।

तोल-माप लो, इक तोला, इक माशा है । इस जीवन में प्यास बुझेगी आशा है ।

 

बुला रहा हूं, मीत हमारे आ जाओ । गीत तुम्हारे लिए रचे हैं, गा जाओ ।

तुम बिन देखो यह 'हरीश' उदासा है । इस जीवन में प्यास बुझेगी आशा है ।

 

५३)

 

हम तुम्हारे लिए जी रहे हैं सनम । अपने अश्क़ों को हम पी रहे हैं सनम ।

 

हाथ तेरा कभी हाथ आया नहीं । तेरा साया कभी साथ आया नहीं ।

फिर भी दामन तेरा छी रहे हैं सनम । अपने अश्क़ों को हम पी रहे हैं सनम ।

 

तूने दिल के हजारों ही टुकड़े किये । इस दिल को हजारों ही दुःखड़े दिये ।

 अपना दामन स्वयं सी रहे हैं सनम । अपने अश्क़ों को हम पी रहे हैं सनम ।

 

तू पराया हुआ, फिर भी हम हैं तेरे । बोल दे तू भी मेरा है, ओ सांवरे ।

हम तुम्हारे लिए ही रहे हैं सनम । अपने अश्क़ों को हम पी रहे हैं सनम ।

 

५४)

छूने कब से हाथ तुम्हारा, हाथ बढ़ाये बैठे हैं । हमतो चाहत का सीने में, जज़बात छुपाये बैठे हैं।

 

दिन तो हाथ छुड़ाकर भागा, छुप ही गया अंधेरे में। लेकिन तुमको ढूंढ ही लेंगे, हम तो कभी उजेरे में।

अब तो चांद-सितारे ये बारात सजाये बैठे हैं । हमतो चाहत का सीने में, जज़बात छुपाये बैठे हैं ।

 

तेरी खातिर दिल के अन्दर क्या तस्वीर बनाई है ? इसीलिए मिलने की तुमसे ये तदवीर बनाई है।

चाहत की तुमको देने सौगात सजाये बैठे हैं । हमतो चाहत का सीने में, जज़बात छुपाये बैठे हैं।

 

नख से शिख तक हम देखेंगे तेरे रूप सलौने को । चूम ही लेंगे हम तो बढ़कर तेरे प्रेम खिलौने को ।

इस आशा की मन के भीतर बात छुपाये बैठे हैं। हमतो चाहत का सीने में, जज़बात छुपाये बैठे हैं।

 

बना दुल्हनियां तुम्हें बिठाकर ले जाऊंगा डोली में । चांद सितारे अपने हाथों मैं टाकूंगा चोली में ।

प्रथम मिलन में यही प्रियतमे । घात लगाये बैठे हैं। हमतो चाहत का सीने में, जज़बात छुपाये बैठे हैं।

 

तुम तो सिर्फ हमारी होगी, यही हमारा दावा है। तेरा प्रेम प्रियतमे ! हमको पावन काशी-काबा है।

खुशियों की आंखों में यह बरसात छुपाये बैठे हैं। हमतो चाहत का सीने में, जज़बात छुपाये बैठे हैं ।

 

मेरी कविता तुम्ही प्रियतमे, तुम्ही ग़ज़ल औ' गीत हो । तुम्हीं मुहब्बत, चाहत, उल्फत तुम्हीं प्रेम औ' प्रीत हो ।

 इस सारे भावों की हम कायनाम छुपाये बैठे हैं । हमतो चाहत का सीने में, जज़बात छुपाये बैठे हैं।

 

(५५)

 

आप आये नहीं चैन आया नहीं । हमने देखो कभी मुस्कुराया नहीं ।

 

आपने तो हमें खूब धोखे दिये । फिर भी हमने कभी भी गिले न किये ।

गीत खुशियों भरा कभी गाया नहीं । हमने देखो कभी मुस्कुराया नहीं ।

 

आंसुओं से भरे अपना दामन रहे । फिर भी तेरे लिए हम अपावन रहे ।

फिर भी तुमने कभी जान पाया नहीं । हमने देखो कभी मुस्कुराया नहीं ।

 

दूर से ही तुम्हें हमतो देखा किये । कितनी दूरी है तुमसे ये लेखा किये ।

फूल जूड़े में तेरे लगाया नहीं । हमने देखो कभी मुस्कुराया नहीं ।

 

किस कदर हमको ग़म की ये सौगात दी ? आंसुओं की हमें खूब ये बरसात दी ।

फिर भी हमको कभी भी हंसाया नहीं । हमने देखो कभी मुस्कुराया नहीं ।

 

ज़िन्दगी होम दी, पर मिला कुछ नहीं । फिर भी देखो हमें तो गिला कुछ नहीं ।

 फिर भी तुमको कभी भूल पाया नहीं । हमने देखो कभी मुस्कुराया नहीं ।

 

५६)

 

तुम यूंही सामने खड़ी रहो. मैं तुम्हें निहारे जाऊंगा । तुम्हें देख-देख कर ही अपनी, तकदीर संवारे जाऊंगा ।

 

मैं वादा तुमसे करता हूं, मैं तुम पर जान लुटा दूंगा । ग़र यकी नहीं है तुमको तो, मैं मर कर अभी दिखा दूंगा।

 'तुम मेरी सब कुछ लगती हो,' मैं तुम्हें पुकारे जाऊंगा। तुम्हें देख-देख कर ही अपनी, तकदीर संवारे जाऊंगा ।

 

तुम्हें छीन न कोई पायेगा, यह मेरा पक्का वादा है। खाता हूं तेरी आज कसम, यह मेरा सही वादा है।

मैं तेरी सूरत आंखों में दिन रात उतारे जाऊंगा । तुम्हें देख-देख कर ही अपनी, तकदीर संवारे जाऊंगा ।

 

हम जनम जनम के साथी हैं, ये भूल नहीं हम पायेंगे । हम तेरे होकर जीते हैं, हम तेरे बिन मर जायेंगे ।

 मैं तेरी यादों के सम्बल से, उम्र गुजारे जाऊंगा । तुम्हें देख-देख कर ही अपनी, तकदीर संवारे जाऊंगा ।

 

तुमने तो सबकुछ भुला दिया, यह चाहत का दस्तूर नहीं। यह तुमको तो स्वीकार हुआ, पर हमको यह मंजूर नहीं।

 गर तेरा हाल यही है तो, मैं दूर किनारे जाऊंगा । तुम्हें देख-देख कर ही अपनी, तकदीर संवारे जाऊंगा ।

 

तुम्हें इसका उत्तर देना है, कल रब के आगे जाकर के । क्यों कहो पराई हो बैठी, हां, मुझसे वो वादा करके ?

कल तेरी हार अवश्य होगी, आज मैं तो हारे जाऊंगा। तुम्हें देख-देख कर ही अपनी, तकदीर संवारे जाऊंगा ।

५७)

 

कितने सावन बीत गए हैं। बरस बरस की रीत गए हैं।

 

तुम न आये, तुम न आये ।

न कोई सन्देशा आया ।

मैं हंस जाती जिसको पढ़कर । सन्देशा न ऐसा आया ।

जाने कितने दिवस बीतकर, मुझसे देखो जीत गाए ?

होली, दोज, दीवाली बीती । रात चांदनी वाली बीती ।

तेरे बिन तो ओ परदेसी, दिवस रात हर काली बीती ।

दुःख ही केवल पास रह गया, खुशियों के सब गीत गए।

 

आजा आजा अब तो आजा । ओ मेरे सपनों के राजा ।

 तेरे बिन तो नहीं बजेगा, मुझसे चाहत वाला बाजा ।

 

कब तक छुपा रखूंगी जग से, कि रूठ मेरे मनमीत गए ?

 

यह मेरी पाती पढ़ करके, शाम ढले ही तुम आ जाना ।

 मेरी फूलों की शैचा पर, गीत प्यार का तुम गा जाना ।

 

तेरे बिन तो सभी रूठकर, जीवन के संगीत गए ।

 

 

 

५८)

 

देखा जबसे तुम्हें प्रियतमे । मन मचल रहा है मिलने को । कली हृदय की ललक रही है, तेरे संग-संग खिलने को ।

 

बस एक बार तुम आकर बैठो, मेरे मन के मन्दिर में। गहराई तुम आकर आंको, मेरे हृदय समन्दर में ।

मैं कब से बोल रहा हूं प्रियवर, साथ तुम्हारे चलने को । कली हृदय की ललक रही है, तेरे संग-संग खिलने को।

 

तेरी सांसों की गर्मी को, ये मेरी सांसें मचल रहीं । देखो-देखो आकर देखो, ये कबसे कैसी उछल रहीं ?

तेरी सांसों की गर्मी से, हम बैठे हैं जलने को । कली हृदय की ललक रही है, तेरे संग-संग खिलने को ।

 

चाहत के तो सभी यहां पर, रहते हरदम भूखे हैं । केवल नफरत करने वाले हरदम रहते इससे रूखे हैं। मेरा जीवन तरस रहा है, इस चाहत में ढलने को । कली हृदय की ललक रही है, तेरे संग संग खिलने को ।

 

तेरी चूड़ी, तेरा कंगन, खनक-खनक कर बुला रहा । मैं ठहरा चावावर साथी, फिर क्यों कर ये बुला रहा ?

मैं भी तेरे संग-संग देखो, राजी हुआ भटकने हो । कली हृदय की ललक रही है, तेरे संग-संग खिलने को ।

 

तुमने रूप बनादेवी का, मुझे पुजारी बना लिया । तन-मन-जीवन लेकर मेरा, मुझे भिखारी बना दिया ।

इस जगती में हमीं थे केवल, तुम्हें देखिये ठगने को । कली हृदय की ललक रही है, तेरे संग-संग खिलने को।

५८)

 

तुम दूर हुए जब से, मजबूर हुए जबसे । हम भी तुम्हारे ग़म में, चूर हुए जब से ।

 

अब क्या बतायें तुमको, कहने को कुछ नहीं है ? आंसू बहे हैं सारे, बहने को कुछ नहीं है ।

तुम हाथ छुड़ा हमसे यूं दूर हुए जब से । हम भी तुम्हारे ग़म में, चूर हुए जब से ।

 

कहने को तुम हो अपने, पर लग नहीं रहा है। चाहत भरा ये जादू कहीं पग नहीं रहा है ।

तेरे जुदा मिलन के दस्तूर हुए जबसे । हम भी तुम्हारे ग़म में, चूर हुए जब से ।

 

चाहा था तुमने कितना, अब झूठ लग रहा है। यह झूठ आज कितना, अब हमको ठग रहा है ?

तुम बेवफाइयों में मशहूर हुए जब से । हम भी तुम्हारे ग़म में, चूर हुए जब से ।

 

अब देखते नहीं हो, मिलने की बात छोड़ो । खुशियों में यार अब तो, खिलने की बात छोड़ो । तुम इस तरह से यारा, मगरूर हुए जब से । हम भी तुम्हारे गम में, सूर हुए जब से ।

 

५९)

 

तुम दूर हुए जब से, मजबूर हुए जबसे । हम भी तुम्हारे ग़म में, चूर हुए जब से ।

 

अब क्या बतायें तुमको, कहने को कुछ नहीं है ? आंसू बहे हैं सारे, बहने को कुछ नहीं है ।

तुम हाथ छुड़ा हमसे यूं दूर हुए जब से । हम भी तुम्हारे ग़म में, चूर हुए जब से ।

 

कहने को तुम हो अपने, पर लग नहीं रहा है। चाहत भरा ये जादू कहीं पग नहीं रहा है । तेरे जुदा मिलन के दस्तूर हुए जबसे । हम भी तुम्हारे ग़म में, चूर हुए जब से ।

 

चाहा था तुमने कितना, अब झूठ लग रहा है। यह झूठ आज कितना, अब हमको ठग रहा है ?

तुम बेवफाइयों में मशहूर हुए जब से । हम भी तुम्हारे ग़म में, चूर हुए जब से ।

 

अब देखते नहीं हो, मिलने की बात छोड़ो । खुशियों में यार अब तो, खिलने की बात छोड़ो ।

तुम इस तरह से वारा, मगरूर हुए जब से । हम भी तुम्हारे ग़म में, चूर हुए जब से ।

 

(६०)

 

आओ मेरी बाहों में, दुनिया का सहारा छोड़ के । मुझसे आकर नाता जोड़ो, हर बन्धन को तोड़ के ।

 

तुमसा नहीं कोई भी जग में, मैंने मान लिया है । तुम ही मेरे बन सकते हो, यह भी जान लिया है।

नहीं कभी मैं जा सकता हूं, तुमसे नज़रें मोड़ के ।मुझसे आकर नाता जोड़ो, हर बन्धन को तोड़ के ।

 

तुम चकोर हो, मैं हूं चन्दा, तुम तितली, मैं फूल हूं । तुम मंजिल, मैं राह प्रियतमे, तुम नदिया, मैं कूल हूं ।

खुश होगी तुम सदा प्रियतमे, मुझसे नाता जोड़ के । मुझसे आकर नाता जोड़ो, हर बन्धन को तोड़ के ।

 

सारी दुनिया बढ़ा रही है, हाथ तुम्हारा छूने को । मेरा दिल कहता है आ मिल, रोशन कर घर सूने को ।

सारे चौपट कर मन्सूबे, दुनिया की इस होड़ के । मुझसे आकर नाता जोड़ो, हर बन्धन को तोड़ के ।

 

कितने जीवन नहीं मिले तुम, क्या अब भी नहीं मिलोगे ? मेरे संग-संग जीवन मग में, क्या अब भी नहीं चलोगे ?

जाओगे तुम कहां बतादो, मन का दर्पण तोड़ के ? मुझसे आकर नाता जोड़ो, हर बन्धन को तोड़ के