दिल्ली के बाहरी इलाके में एक पुरानी हवेली थी, जिसे लोग "निशा हवेली" कहते थे। कहा जाता था कि वहाँ एक रहस्यमयी महिला का साया भटकता था, जो हर पूर्णिमा की रात किसी न किसी को अपना शिकार बनाती थी। कई लोग गायब हो चुके थे, लेकिन कोई भी यह नहीं जान पाया कि उनके साथ क्या हुआ।
राहुल और उसके दोस्त इस हवेली की सच्चाई जानने के लिए वहाँ जाने की ठान चुके थे। वे चार लोग थे—राहुल, समीर, आरव और साक्षी। उनके मन में हल्का डर था, लेकिन रोमांच की भूख ने उन्हें पीछे नहीं हटने दिया।
रात के 12 बजते ही वे हवेली में दाखिल हुए। अंदर घना अंधेरा था, लेकिन मोबाइल की रोशनी ने उन्हें थोड़ा देखने लायक बनाया। चारों ने अलग-अलग दिशाओं में घूमकर जगह का जायजा लेना शुरू किया। अचानक, साक्षी ने एक कमरे के भीतर किसी महिला की हल्की सिसकियों की आवाज़ सुनी।
"कोई अंदर है," उसने फुसफुसाते हुए कहा।
राहुल ने दरवाज़ा खोला तो सामने एक खूबसूरत महिला खड़ी थी। उसकी आँखें गहरी काली थीं और होंठ खून जैसे लाल। उसकी सफेद साड़ी हवा में हल्की-हल्की उड़ रही थी, जैसे कोई अदृश्य शक्ति उसे सहला रही हो।
"तुम लोग यहाँ क्या कर रहे हो?" महिला ने मोहक आवाज़ में पूछा।
राहुल और समीर उसके सौंदर्य में खो से गए। आरव और साक्षी को महसूस हुआ कि कुछ अजीब था, लेकिन वे कुछ बोलते उससे पहले ही महिला ने राहुल का हाथ पकड़ लिया। अचानक हवेली का माहौल बदल गया। दीवारों पर अजीब आकृतियाँ उभरने लगीं, हवा भारी हो गई और हर दिशा में कामुकता का अजीब सा एहसास फैल गया।
महिला ने राहुल के करीब आते हुए हल्की मुस्कान दी। "तुम बहुत खास हो," उसने धीमे से कहा।
राहुल उसकी आँखों में खो चुका था। जैसे ही महिला ने उसके होठों को छुआ, एक ठंडक उसके पूरे शरीर में फैल गई। उसकी साँसें तेज़ होने लगीं, और उसके होंठ धीरे-धीरे नीले पड़ने लगे।
"राहुल, हटो वहाँ से!" साक्षी चिल्लाई, लेकिन बहुत देर हो चुकी थी।
महिला ने उसे अपनी बाहों में कस लिया, और उसके नाखून राहुल की पीठ में गहरे धँस गए। वह अब उसे छोड़ने के मूड में नहीं थी। अचानक, उसके चेहरे पर एक शैतानी मुस्कान आ गई, और उसने राहुल के गले पर अपने नुकीले दाँत गड़ा दिए।
राहुल की चीख हवेली में गूँज उठी। उसके शरीर से धीरे-धीरे ऊर्जा खींची जा रही थी। समीर और आरव ने उसे बचाने की कोशिश की, लेकिन जैसे ही वे महिला के करीब पहुँचे, हवेली में हर दरवाज़ा और खिड़की अपने आप बंद हो गई।
"अब तुम सब मेरे हो," महिला की आवाज़ अब कामुकता से ज्यादा शैतानी लग रही थी।
रात गहराती जा रही थी, हवेली की दीवारें लाल होने लगीं, और चारों दोस्त समझ चुके थे कि उन्होंने जो खेल शुरू किया था, वह अब मौत के रास्ते पर जा चुका था...
समीर और आरव ने पूरी ताकत लगाकर दरवाज़ा खोलने की कोशिश की, लेकिन वह टस से मस नहीं हुआ। हवेली के अंदर हवा भारी होती जा रही थी, और साक्षी को महसूस हुआ कि कोई अदृश्य शक्ति उसके शरीर को छू रही है। उसके रोंगटे खड़े हो गए।
राहुल अभी भी उस खूबसूरत मगर शैतानी महिला की गिरफ्त में था। उसके होंठ अब पूरी तरह नीले पड़ चुके थे, और उसकी आँखों की रोशनी फीकी हो रही थी। महिला ने धीरे-धीरे अपना सिर उठाया, उसके होंठों पर हल्की लाल चमक थी—जैसे उसने राहुल की ऊर्जा को चूस लिया हो।
"तुम्हें पता है," उसने सेक्सी मगर ठंडी आवाज़ में कहा, "जो भी यहाँ आता है, वो मेरी भूख को शांत करने के लिए ही आता है। और अब, तुम्हारी बारी है।"
उसकी नज़र अब समीर पर थी। समीर के शरीर में झुरझुरी दौड़ गई, लेकिन वह पीछे नहीं हटा।
"हम यहाँ से निकलेंगे," उसने हिम्मत जुटाकर कहा।
महिला मुस्कुराई और धीरे-धीरे उसके करीब आई। उसकी आँखों में एक अजीब सा खिंचाव था, जैसे वह समीर के शरीर और आत्मा को पूरी तरह अपने वश में कर लेना चाहती हो।
आरव ने जल्दी से जेब से रुद्राक्ष की माला निकाली और उसे महिला की ओर फेंक दिया। लेकिन जैसे ही वह महिला के शरीर से टकराई, वह एक जलती हुई चिंगारी में बदल गई और राख बन गई।
"बेवकूफी मत करो," उसने आँखें घुमाते हुए कहा, "तुम्हारी यह छोटी-छोटी चीज़ें मुझ पर असर नहीं करेंगी।"
साक्षी अब तक हवेली की दीवारों पर लिखी पुरानी लिपियों को पढ़ने की कोशिश कर रही थी। उसने देखा कि एक खास मंत्र लिखा था, जो शायद इस महिला के प्रभाव को कम कर सकता था।
"आरव, समीर! मुझे कुछ मिला है!" साक्षी चिल्लाई।
महिला ने गुस्से से उसकी तरफ देखा। "तुम बहुत ज़्यादा जानने की कोशिश कर रही हो, लड़की!"
उसने हवा में हाथ घुमाया, और अचानक साक्षी का शरीर ऊपर उठ गया। वह घबराकर चिल्लाने लगी, लेकिन उसके शब्द उसके गले में ही अटक गए। उसकी साँसे तेज़ हो गईं, जैसे कोई अदृश्य हाथ उसकी गर्दन दबा रहा हो।
समीर और आरव भागकर उसके पास पहुँचे, लेकिन तभी महिला ने समीर की ओर इशारा किया, और वह एक झटके में दीवार से जा टकराया।
अब हवेली की दीवारों से अजीब-अजीब आकृतियाँ निकलने लगी थीं। काली परछाइयाँ हवा में लहराने लगीं। यह जगह अब पूरी तरह एक शैतानी लोक में बदल चुकी थी।
"अब बहुत देर हो चुकी है," महिला फुसफुसाई।
राहुल ज़मीन पर पड़ा था—बेजान, निष्प्राण। समीर, आरव और साक्षी की आँखों में डर था, लेकिन वे जानते थे कि अगर वे कुछ नहीं करेंगे, तो वे भी इसी हवेली का हिस्सा बन जाएंगे।
**अब या तो वे इस श्रापित आत्मा से बच सकते थे, या फिर हमेशा के लिए इस हवेली के कैदी बन जाएंगे…**
आरव ने हिम्मत जुटाकर जेब से एक छोटा सा चाकू निकाला और अपने हाथ की कलाई पर हल्की सी कट लगा दी। खून की एक बूंद ज़मीन पर गिरते ही हवेली में कंपन होने लगा। वह मंत्र, जो साक्षी ने दीवारों पर देखा था, अब धीरे-धीरे चमकने लगा।
महिला ने गुस्से से आरव की ओर देखा। "तुम्हें लगता है कि यह सब मुझे रोक सकता है?"
लेकिन जैसे ही समीर ने भी अपने हाथ पर कट लगाया और ज़मीन पर रक्त टपकाया, हवेली की दीवारें कांपने लगीं।
"यह कोई आम खून नहीं है," साक्षी ने कहा, "यह बलिदान उस आत्मा को मुक्त कर सकता है!"
महिला चिल्लाने लगी, उसका शरीर हवा में कांपने लगा। उसके चेहरे की सुंदरता अब डरावनी बन चुकी थी। उसकी आँखों से खून की धारा बहने लगी, और उसके लंबे नाखून धीरे-धीरे राख में बदलने लगे।
"नहीं!" उसने भयानक आवाज़ में चिल्लाया, "मैं हमेशा के लिए नहीं जा सकती!"
साक्षी ने दीवार पर लिखे मंत्रों को ज़ोर-ज़ोर से पढ़ना शुरू किया। हवेली में और कंपन होने लगा। ज़मीन फटने लगी, और महिला के शरीर से काले धुएँ की लपटें निकलने लगीं।
अचानक, हवेली के हर कोने से भूतिया आकृतियाँ प्रकट होने लगीं। ये वही आत्माएँ थीं, जो इस श्रापित स्थान में कैद थीं।
"अब समय आ गया है," उनमें से एक आत्मा ने कहा।
समीर, आरव और साक्षी ने एक-दूसरे की ओर देखा और मंत्र का अंतिम श्लोक पढ़ा।
अगले ही पल, हवेली ज़ोरदार धमाके के साथ हिलने लगी, और महिला एक तेज़ चीख के साथ हवा में गायब हो गई। हवेली की छत गिरने लगी।
"भागो!" आरव चिल्लाया।
तीनों किसी तरह दरवाजे की ओर भागे। जैसे ही वे बाहर निकले, हवेली ज़मीन में समा गई—मानो वह कभी वहाँ थी ही नहीं।
राहुल का शरीर ठंडा पड़ा था, लेकिन साक्षी ने उसे उठाया और उसके सीने पर हाथ रखा। कुछ ही क्षणों में, उसने गहरी सांस ली और आँखें खोल दीं।
"क्या हुआ?" उसने कमजोर आवाज़ में पूछा।
आरव ने एक लंबी सांस ली। "हम बच गए।"
लेकिन जैसे ही वे गाँव की ओर लौटने लगे, साक्षी को ऐसा महसूस हुआ कि कोई अभी भी उन्हें देख रहा था। उसने पलटकर देखा, और वहाँ एक धुंधली परछाई थी—वही महिला, जिसकी आँखों में अब भी अधूरी मुक्ति की पीड़ा थी…