महात्मा बलदेव दास हनुमान साठिका
( भाग ३)
काहू के कुटुम्ब काहू द्रव्य ही को भारी गर्व काहू भुज दर्प काहू गुण को गरूर है।
काहू भूप मान काहू रूप अभिमान सान दीनन अबल जानि सीदत जरूर है ।।
ताही ते सभीत तोहि टेरे बलदेव दास रक्षे करि माफ बेसहूर को कसूर है।
ललित लंगूर से लपेटि दले झूरन को शूरन में शूर महावीर मशहूर है ॥२५॥
महिमा विशाल बाल रूप अंजनी को लाल राम अनुराग रंग रंग्यो अंग अंग है।
राममयी दृष्टि मुख राम नाम इष्ट हिये राम ही को ध्यान राम प्रेम को उमंग है ॥
रामयश श्रौन रामकाज ही में हाथ पाँय नित्य बलदेव रामभक्तन पै दंग है।
अन्तःकरण रामत्तत्त्व ही में लीन सदा राम के प्रताप ही को पुंज बजरंग है ॥२६॥
शान्त रस चित्त वै ज्यों, वीर रस दीनता पै विद्या रूप-हीनता वै, क्षीणता पै बंग (भस्म) है।
कुम्भज समुद्र पै ज्यों, जुर्रा (बाज) खग क्षुद्रपै ज्यों त्रिपुर पै रुद्र बलदेव कियो भंग है।।
पानी अभि चण्ड पे ज्यों, चण्डी चण्ड मुण्ड पे ज्यों पापन के झुण्ड वै ज्यों गङ्गा की उमंग है।
केहरि गयन्द पै ज्यों, पाला अरविन्द पै ज्यों बैरिन के वृन्द नै त्यों वीर बजरंग है ॥२७॥
राम-गुण पाप वै ज्यों, राम शिवचाप पै ज्यों पन्नगारि साँप पै ज्यों, ताप पै इलाज है।
शीत मसा डंस वै ज्यों, भीम कुरु वंश पैं ज्यों कृष्ण खल कंस पैं ज्यों, गिरिन्ह पैं गाज है ।।
आदित अँधेर पे ज्यों, शेर छेर ढेर पै ज्यों असुर अहेर पै ज्यों, बलदेव राज है।
पावक पतेर मैं ज्यों, पौन घनघेर पै ज्यों बैरिन बटेर पैं त्यों बाज कपिराज है ॥२८॥
राम दश शीश पै ज्यों, वैरिन खबीश पै ज्यों मथुरा अधीश पै ज्यों, प्रबल गोविन्द है।
महादेव मार पैं ज्यों, भानु अन्धकार पै ज्यों सगर कुमार पे ज्यों, कपिल मुनीन्द्र है ॥
गरुड़ फणीन्द पै ज्यों, वज्र है गिरीन्द पै ज्यों' कहैं बलदेव ज्यों गयन्द पै मृगेन्द्र है।
आगी तूल वृन्द पै ज्यों, पाला अरविन्द पै ज्यों भूत प्रेत वृन्द पै त्यों दलन कपिन्द है ॥२९॥
सुकृत विराग योग ज्ञान औ विज्ञान सर्व कला के निधान काव्य नाटक से दक्ष है।
अर्थ धर्म काम मोक्ष देत सदा सेवक को नाम कलि काल में विशेष कल्पवृक्ष है।
हरै जो अलक्षि भरै लक्षि करें बुद्धि स्वच्छ मारि प्रतिपक्षिन को राखै जन पक्ष है।
दानौ भूत प्रेत यक्ष राक्षस के भक्षिवे को रक्षिवे को बाल लाल मूरति प्रत्यक्ष है ॥ ३०॥
पूर्वज के पाप केंधो, सन्त गुरु शाप कैथो देवी देव दाप कैंधों भूत ब्रह्मदोष है।
वायु को कुयोग कैंधो, वीर्य रज रोग कैंधों दुष्ट दशा भोग कैंधो क्रूर ग्रह रोष है ॥
काके उत्पात से धौं होत गर्भ श्राव पात ताको शान्त कीजें बलदेव रक्षि कोष हैं।
अंजनी की आन राम बान की दुहाई मान वीर हनुमान गर्भ थाँमें, करि पोष है ॥३१॥
जाकी घोर गाज सुनि, गाज मृगराज लाजै भाजै यमराज को समाज भूत प्रेत मन्द ।
सहित आनन्द गर्भ - अर्भक प्रसव करें मूढ़ गर्भहू को काढ़ि गर्भिनि को हरै द्वन्द्व ।
प्यारों रामचन्द्र को दुलारी अंजनी को नन्द सुमिरे तिहारो नाम कटत कलेश फन्द ।
जाके चरणारविन्द वन्दत विबुधवृन्द बन्दै बलदेवलाल मूरति लंगोट बन्द ॥३२॥
केंधौ शीश अर्धशीश शंख चख भौंह नाक कान कण्ठ तालू दन्त जिह्वा होठ पीर है।
केंधो हाथ पाय पेट पाँजर कि छाती पीठ केंधों वात पित्त कफ पीड़ित शरीर है ।।
केंधो ग्रहमात्र रोस शाकिनी डाकिनी दोस रोवत अधीर बाल पीवत न छीर है।
मानि रघुवीर की दुहाई बलदेव कहै सर्व ज्वर पीर को हरैया महावीर है ॥३३॥
वन्दौं वात-जात, हरै वात पित्त शीत ज्वर मिश्रित त्रिदोष ज्वर दूर करि डारिये ।
रात्रि-ज्वर दिन-ज्वर नित्य-ज्वर एक-ज्वर द्वे-ज्वर तृतीय - ज्वर चौथिया निवारिये ॥
पञ्च-ज्वर आदि-ज्वर विषम और सर्व ज्वर कारण उपाधि आधि व्याधि भय टारिये ।
अञ्जनीकुमार बलदेव की पुकार सुनि भूत प्रेत आदि के विकार को निवारिये ॥३४॥
भैरो भूत प्रेत औ पिशाच ब्रह्म दानव यक्ष राक्षस खवीस को कपिश तूं पछारिये ।
पितर बेताल क्षेत्रपाल देव देवी दोस शाकिनि डाकिनि सती मातृका को मारिये ।।
हाट बाट घाट को कि बाहेर को, गेह को जो लाग्यो देह ताको तू उचाटि काटि डारिये ।
अञ्जनी की आन बलदेव विनय लीजे मानि वीर हनुमान पञ्च वीरन को जारिये ॥३५॥
दुष्टन - शलन दीन- पालन वदत वेद विश्व में विदित ऐसी रावरी रसम है।
आरत के आह अग्न श्वास ही वायु पुत्र वेणु - वन - बैरिन को करत भसम है ।।
समुझि सुभाव तेरे आयो बलदेव आस देत खल त्रास मोहि तोरिये कसम है।
कीजे शत्रु नाश दीजै दास को सुपास अब तू ही महावीर जू लसम (दुष्ट) के खसम है ।। ३६।।
जय हनुमान सुमंगल रूप अमंगल भजन सज्जन प्यारो।
अंजनिनन्द प्रभञ्जन रंजन केसरि लाल महेश दुलारो ॥
भानुग्रांसुक लोक प्रकाशक त्रास विनासक दास अधारो ।
पिंगल लोचन संकट मोचन बेगि हरो प्रभु सोच हमारो ॥३७॥
जय बजरंग महाभट भीम महाबल तेज प्रताप अपारो ।
ज्ञान विज्ञान विधान निधान महाकवि सर्व सुजान उदारो ।।
आठउ सिद्धि नवो निधि दायक विश्व प्रसिद्ध प्रभाव तिहारो ।
पाहि विनय सुनिये ऋण मोचन बेगि हरो प्रभु सोच हमारो ॥३८॥
सिन्धु उल्लंघन, सिंहिका मर्दन, लंकिनी मारुतशंक निवारो ।
बाग उजारन, अच्छ पछारन, लंक कलंक को जारन हारो ।।
श्री-दुःख टारन, दुष्ट-विदारन, लक्ष्मण-प्राण उबारन बारो ।
पाहि विनय सुनि वन्दियमोचन बेगि हरो प्रभुसोच हमारो ॥३९॥
जय अहिरावण, सैन्य संहारन राम को संकट में रखवारो । दीन-उधारन, काज सुधारन, साधु के कारन को तनु धारो ।।
आधि औ व्याधि उपाधि दलौ बलदेव दया करि मोहि निहारो ।
पाहि विनय सुनिये भ्रममोचन बेगि हौ प्रभु सोच हमारो ॥४०।।