सचमुच , ज़िंदगी कठिन परीक्षा लेने की मानो प्रतीक्षा कर रही थी | यह ऐसी परीक्षा थी जिसका न कोई कोर्स था , ना गेस पेपर | सभी के जीवन में ऐसा दौर आया करता है लेकिन सबको अपना ही दौर सबसे कठिन दिखता है |मैं अपने शारीरिक अस्थि संबंधी रोग से तो आक्रांत था ही , मेरे दोनों बेटे भी भारतीय थल सेना के अधिकारी बनने के प्रशिक्षण के कठिनतम दौर से गुजर रहे थे | बड़े बेटे दिव्य आदित्य पिछले दिनों लेफ्टिनेंट होकर लगभग दो साल कारगिल में बिता कर अब डोगरा रेजीमेंट की 15 वीं बटालियन में हिसार में नियुक्ति पा चुके थे |छोटे बेटे यश आदित्य इंटर्मीडिएट करके एन डी ए परीक्षा उत्तीर्ण करके अब ट्रेनिंग ले रहे थे | पत्नी और मैं अपने अपने जॉब में लग गए थे | 22 अक्टूबर 2005 को मेरे बड़े पुत्र दिव्य ने अपनी मां को एक मार्मिक पत्र लिखा – “ज़िंदगी की लड़ाई हर इंसान को अकेले ही लड़नी पड़ती है |तुम्हारी, हमारी परवरिश के लिए लड़ाई तुम्हारी ही लड़ाई थी |डैडी या तुम्हारे बच्चों की नहीं|मेरे लिए दुनियाँ में तुमसे मजबूत औरत मिलना मुश्किल है | आज पूरा परिवार तुम्हारे इस संघर्ष की कद्र कर रहा है |” मेरे छोटे बेटे यश भी बेहद संजीदा प्रकृति के थे |उनको वर्ष 2000 में गोरखपुर के एयरफोर्स स्कूल से हाई स्कूल करने के बाद लखनऊ के सिटी मांटेसरी स्कूल, महानगर ब्रांच में दाखिला करवा दिया गया था और वे वहाँ अपनी मौसी ममता के घर रहने लगे थे |याद आता है कि वे भी अक्सर भावुक होकर पत्र लिखा करते थे |इंटर फाइनल में लिखे एक पत्र में उन्होंने लिखा- “.. पता नहीं CMSमें आकर ठीक किया या नहीं |घर से दूर आकर, इतने पैसे खर्च कराकर अगर कुछ नहीं बन पाया तो क्या करूंगा?.. बार बार प्रिंसिपल मैडम की कही एक बात याद आती है-“Your Parents are paying so much for you just to get a little success for you.”| आज जब यही बच्चे बडे हो गए हैं,वे स्वयं बच्चों के माता- पिता बनकर, गृहस्थ के हिचखोले खाते हुए अपना जीवन बिता रहे हैं तब उन दिनों को सोच कर मैं स्वयं मंत्रमुग्ध होता रहता हूँ |सलीके से सहेज कर रखी गई इन पातियों को फिर फिर से पढ़ता रहता हूँ और उन दिनों मे खो जाया करता हूँ | यह तो ज़िंदगी का फ़्लैश बैक था जो चाहे अनचाहे आत्मकथा के इन पन्नों में घुसा आता है | मैंने यहाँ आकर पाया कि इस शहर लखनऊ में अपने गोरखपुर के कम ही लोग आकार बस गए हैं लेकिन जो हैं उन्होंने भी अपने व्यक्तित्व में लखनऊ वालों के गुण - दुर्गुण पूरी तरह आत्मसात कर लिया है | गुण तो नहीं लेकिन उन सभी में यहाँ के दुर्गुणों का आना मुझे अच्छा नहीं लगा |ऐसे ही हैं एक मित्र श्री दयानंद पांडे ,उम्र में मुझसे छोटे किन्तु पत्रकारिता और लेखन की दुनियाँ में मुझसे बहुत आगे ,जिन का जिक्र करना चाहूँगा |गोरखपुर से लखनऊ आते ही विवादों से उनका बहुत गहरा नाता हो गया है और शायद इन विवादों के चलते ही वे उम्र के इस पड़ाव पर भी सुर्खियों में बने रहना चाहते हैं |अब उनका एक खास सन्दर्भ | श्री दयानन्द पांडेय द्वारा संपादित पुस्तक “कथा गोरखपुर “और “कथा लखनऊ” सहित छह खंडों की पुस्तक जब छप कर आई तो उन्होंने हमेशा की तरह सूचित करते हुए मुझसे पढ़ने का आग्रह किया | पुस्तकें पढ़ते हुए मुझे कटु अनुभवों से गुजरना पड़ा |इस बारे में मैंने अपनी प्रतिक्रिया फ़ेसबुक पर डाली थी जिसे यहाँ उद्धृत करना चाहूँगा | “ मित्रों, फेसबुक मंच का सार्थक उपयोग देखते हुए मैं आज इस पोस्ट के माध्यम से एक गंभीर मसले पर अपनी चुप्पी तोड़ रहा हूं | आशा है आप ध्यान से पढ़कर अपनी राय देंगे | किसी ने क्या ख़ूब कहा भी है कि" बात बोलेगी, हम नहीं | भेद खोलेगी बात ही ! " चूंकि गोरखपुर के साहित्यकारों के लेखन के इतिहास विषयक बात बोली जा चुकी है और उसमें मुझे अनेक गड़बड़ी प्रथम दृष्टया नज़र आई है इसलिए मैं अपनी बात आप सभी के सामने रख रहा हूं | ....स्वस्थ और शालीन विमर्श के लिए ! श्री दयानंद पांडे , प्रतिष्ठित लेखक, साहित्यकार जो मेरे अनन्य मित्र भी हैं, ने डायमंड बुक्स प्रकाशन के लिए गोरखपुर के कहानीकारों का उनकी चुनी हुई एक कहानी के साथ इतिहास लिखा है जो पिछले दिनों छप कर विक्रय की जा रही है | यह अच्छी बात है कि उन्होंने यह एक बड़ा और आवश्यक काम किया है | इसके लिए वे और प्रकाशक दोनों बधाई के पात्र हैं | उन्होंने इन खंडों में जिनका सन्दर्भ दिया है वे हैं - प्रेमचंद , पांडेय बेचन शर्मा उग्र , श्रीपत राय ,सुधाबिंदु त्रिपाठी, हरिशंकर श्रीवास्तव ,रामदरश मिश्र ,अमरकांत,श्रीलाल शुक्ल,ज.ला.श्रीवास्तव , हृदय विकास पांडेय , हरिहर द्विवेदी ,डाक्टर माहेश्वर, भगवान सिंह सहित कुल 81 कहानीकार | कुछ तो सचमुच गोरखपुर की मिट्टी पानी में पले - बढ़े थे लेकिन कुछ सिर्फ नाम वाले गोरखपुर के ! नौकरी की मजबूरी में किसी की पोस्टिंग गोरखपुर हो जाय और वह बड़ी हैसियत वाला या वाली हो तो वह गोरखपुर का होने का दावा नहीं कर सकता है ! उसके लेखन में गोरखपुर तो कतई नहीं उतर सकता है! इसलिए संपादक श्री पांडे का यह दावा लगभग झूठ है कि "सभी कहानियाँ गोरखपुर की माटी की खुशबू में तर बतर हैं " या यह कि "माटी की महक इन कथाओं में महकती, गमकती, और इतराती हुई मिलती हैं |" लेकिन इतनी श्रमसाध्य तप और साधना के बाद मित्र दयानन्द पांडेय अपने लंगोटिया मुझ जैसे मित्र प्रफुल्ल कुमार त्रिपाठी और गोरखपुर की ढेर सारी उन साहित्यिक विभूतियों को भूल गये हैं जिनको उस इतिहास लेखन के संग्रह में स्थान मिलना ही चाहिए था | जैसे -प्रोफेसर गोपीनाथ तिवारी, प्रोफेसर माता प्रसाद त्रिपाठी, डा.उदय भान मिश्र, हरिराम द्विवेदी, प्रोफेसर तारिक़ छतारी, प्रोफेसर जी.आर. सैयद, आचार्य प्रतापादित्य, महेश मणि त्रिपाठी, प्रदीप कुमार पांडेय, शिवेन्दु कुमार श्रीवास्तव, भगवत शरण गुप्त, रामनाथ, राजेश, डा. अमर नाथ ,डा. शची मिश्रा आदि ! मैंने अपनी इस पोस्ट में आगे लिखा – “ असल में जैसे इलाहाबाद या प्रयाग में पवित्र संगम तट पर जाकर यदि कोई भौतिक रुप में पवित्र सरस्वती नदी को देखना या दिखाना चाहे तो उसे असफल होना पड़ेगा ठीक उसी प्रकार मित्र दयानन्द पांडेय को गोरखपुर में लम्बी अवधि रहकर और फिर कुछ महानगरों में लम्बी अवधि बिताकर संभवतः गोरखपुर की अनेक साहित्यिक विभूतियां दिखाई नहीं दे रही हैं जिनका गोरखपुर की श्रीवृद्धि में पर्याप्त योगदान है | वैसे यह भी आश्वस्त हूं कि मित्र दयानन्द पांडेय ने छह खंडों में गोरखपुर के साहित्यकारों का उल्लेख करके इतिहास में उन छूटे हुए लोगों को मिटा देने की गन्दी हरकत भी जानबूझकर नहीं की है |उनके नामों को जानबूझकर नहीं छोड़ा गया होगा लेकिन चूंकि वे नाम छूट गये हैं इसलिए उनका उल्लेख करना भी मेरे लिए मित्र धर्म निभाने जैसा आज आवश्यक हो गया है |”
इस संदर्भ की फ़ेसबुक पोस्ट में मैंने आगे लिखा- उपेन्द्र नाथ अश्क़ की एक कविता है - "अदृश्य नदी |"उसकी कुछ पंक्तियों को उद्धृत कर रहा हूं-" गंगा जमुना ही नहीं, मेरे नगर में-लोग कहते हैं - एक तीसरी नदी भी है- सरस्वती जो कभी दिखाई नहीं देती, वह व्यथा है - जो दिल - ब - दिल बहती हैऔर चेहरों पर जिसका कोई आभास नहीं मिलता ! "शायद इन छूटी हुई शख़्सियतों के लिए ये पंक्तियां चरितार्थ हो रही हैं ! अश्क़ जी ने अपनी इसी कविता का अन्त किया था-" तुम्हारी वह तीसरी नदी मैं हूं! तो फिर इन आंखों को चुपचाप पोंछ डालो, और मुझे पहले की तरह अदृश्य बहने दो ! "दयानन्द जी, आपने जिन विभूतियों को इतिहास से ख़ारिज़ करने की गुस्ताख़ी की है वह अक्षम्य तो है ही निन्दनीय भी है | उससे भी बड़ी बात यह कि आपने उन लोगों को भी जोड़ डाला है जिनका कहानी लिखने अथवा गोरखपुर से सही मायने में जुड़ने से कोई सम्बन्ध ही नहीं है |अगर आप दिल्ली नौकरी करने के सिलसिले में कुछ वर्ष या महीने रहे हैं तो क्या आप दिल्ली वाले कहलाने लगेंगे?... नहीं ना ! “
श्री दयानन्द पांडेय द्वारा सम्पादित यह पुस्तक गोरखपुर के साहित्य और पाठक जगत द्वारा बायकाट किये जाने योग्य है क्योंकि इसमें गलत और आधे अधूरे तथ्य दिये गये हैं जिसमें इतिहास को भी गलत दिशा देने का प्रयास किया गया है | मित्र, दयानन्द जी, आप यदि संभव हो तो भूल सुधार कर , ठंढे दिमाग से थोड़ा और रिसर्च करके , गोरखपुर और गोरखपुर के उन साहित्यकारों को भी पृष्ठों में उतारिए जो संगम तट पर विद्यमान सरस्वती नदी समान आपको दिखाई नहीं दे रहे हैं! आपने मेरे साथ दर्जनों गोरखपुर के लिखने- पढ़ने वालों के लेखन व्यक्तित्व को यूं कहा जाय कि मार डाला है तो अनुचित नहीं है !”