आरव और ज़ोया की ज़िंदगी धीरे-धीरे सामान्य होने लगी। अब ज़ोया पूरी तरह इंसानों जैसी दिखती थी—न कोई जादू, न कोई डरावनी घटनाएँ। आरव को लगने लगा कि सब कुछ ठीक हो गया है।
लेकिन, कुछ चीजें अब भी अजीब थीं।
ज़ोया को हमेशा ठंड लगती थी, चाहे मौसम कैसा भी हो। वह कभी शीशे के सामने ज़्यादा देर नहीं ठहरती थी। और सबसे ज़्यादा अजीब बात—जब भी कोई उसे छूता, तो उसे हल्की झुनझुनी महसूस होती थी।
एक दिन, निखिल आरव के घर आया।
"तो भई, अब तुम और तुम्हारी रहस्यमयी प्रेमिका कैसे हो?" निखिल ने मज़ाक किया।
आरव हँसा। "अच्छे हैं।"
निखिल ने ज़ोया को देखा। "तुम सच में हवेली से बाहर आ गई? लोगों का कहना था कि वहाँ जो भी जाता है, वापस नहीं आता।"
ज़ोया ने मुस्कुराकर सिर हिलाया। "हाँ, लेकिन अब मैं यहाँ हूँ।"
निखिल ने ध्यान से ज़ोया को देखा।
"अजीब बात है…"
"क्या?" आरव ने पूछा।
"तुम्हारी आँखें… ये तो पहले गहरी काली थीं, लेकिन अब हल्की नीली दिख रही हैं।"
आरव चौंक गया। उसने कभी इस पर ध्यान नहीं दिया था।
ज़ोया ने जल्दी से कहा, "लाइट की वजह से ऐसा लग रहा होगा।"
बात वहीं खत्म हो गई, लेकिन आरव के मन में सवाल उठने लगे।
रात को जब ज़ोया सो रही थी, तो आरव ने उसका चेहरा ध्यान से देखा। उसकी त्वचा पहले से ज़्यादा सफ़ेद और चमकदार लग रही थी।
अचानक, ज़ोया ने आँखें खोल दीं।
"तुम मुझे इस तरह क्यों देख रहे हो?"
आरव थोड़ा घबरा गया। "बस… तुम्हें देख रहा था।"
ज़ोया मुस्कुराई, लेकिन उसकी मुस्कान में कुछ अलग था।
अगली सुबह, आरव को ज़ोया कमरे में नहीं मिली। वह पूरे घर में उसे ढूँढता रहा, लेकिन वह कहीं नहीं थी।
फिर उसने बगीचे में देखा—ज़ोया वहाँ खड़ी थी, लेकिन उसके सामने एक औरत थी, जिसने काला लबादा पहन रखा था।
आरव को देखते ही वह औरत मुड़ी और धीमी आवाज़ में बोली, **"समय पूरा हो गया, ज़ोया। तुम्हें वापस चलना होगा।"**
आरव दौड़कर ज़ोया के पास पहुँचा। "ये कौन है?"
ज़ोया की आँखों में डर था।
"यह… यह मेरी नियति है, आरव।"
औरत ने हाथ उठाया। "तुमने एक चुड़ैल को अपनाया था, इंसान। लेकिन तुम्हें नहीं पता कि जादू हमेशा कीमत माँगता है।"
आरव ने गुस्से से कहा, "मैं ज़ोया को कहीं नहीं जाने दूँगा!"
औरत हँसने लगी। "अब तुम उसे रोक नहीं सकते। वह पूरी तरह इंसान नहीं बनी। वह धीरे-धीरे एक अलग अस्तित्व में बदल रही है।"
आरव ने ज़ोया की ओर देखा। उसकी आँखें अब पूरी तरह नीली हो चुकी थीं, और उसकी त्वचा सफ़ेद पड़ रही थी।
"ज़ोया, क्या यह सच है?"
ज़ोया की आँखों से आँसू बहने लगे। "हाँ, आरव। मैं अब इस दुनिया में पूरी तरह नहीं रह सकती। मैं इंसान और परछाई के बीच फँस गई हूँ।"
आरव ने उसका हाथ थाम लिया। "तो क्या कोई तरीका नहीं जिससे तुम यहीं रह सको?"
औरत ने धीरे से कहा, **"एक तरीका है।"**
आरव और ज़ोया ने एक साथ उसकी ओर देखा।
"अगर आरव अपनी आत्मा का एक हिस्सा ज़ोया को दे दे, तो वह पूरी तरह इंसान बन सकती है। लेकिन..."
"लेकिन क्या?" आरव ने तुरंत पूछा।
"लेकिन ऐसा करने से तुम्हारी ज़िंदगी आधी हो जाएगी।"
आरव ने बिना सोचे कहा, "मैं तैयार हूँ!"
लेकिन ज़ोया ने उसका हाथ झटक दिया। "नहीं, आरव! मैं तुम्हें खोना नहीं चाहती!"
आरव ने उसकी आँखों में देखा। "मैं तुम्हारे बिना नहीं रह सकता, ज़ोया। मैं यह करने के लिए तैयार हूँ।"
औरत ने सिर झुकाया। "तो ठीक है... यह तुम्हारा फैसला है।"
उसने एक छोटी खंजर निकाली और आरव के सीने पर रखा।
"अपनी आँखें बंद करो और ज़ोया के बारे में सोचो। अगर तुम्हारा प्यार सच्चा है, तो यह बलिदान सफल होगा।"
आरव ने गहरी सांस ली और आँखें बंद कर लीं।
खंजर चमक उठा।
चारों ओर रोशनी फैल गई।
जब आरव ने आँखें खोलीं, तो ज़ोया उसके सामने खड़ी थी—पूरी तरह इंसान।
उसकी आँखें अब सामान्य थीं, उसकी त्वचा अब ठंडी नहीं थी।
ज़ोया ने रोते हुए आरव को गले लगा लिया। "तुमने मेरे लिए यह किया, आरव…"
आरव मुस्कुराया। "अब हम हमेशा साथ रहेंगे।"
लेकिन औरत की आवाज़ गूँजी—
**"याद रखना, आरव। तुमने अपनी आधी ज़िंदगी दे दी है। अब तुम्हारे पास सिर्फ़ 15 साल बचे हैं…"**
आरव और ज़ोया एक-दूसरे को देखते रहे।
क्या उनका प्यार इन 15 सालों में सब कुछ पा लेगा, या यह बस एक और नई कहानी की शुरुआत थी?