Yoga In Reality in Hindi Science by Rudra S. Sharma books and stories PDF | Yoga In Reality

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Yoga In Reality

लेखक और लेखन के बारें में।

मेरी अभिव्यक्ति केवल मेरे लियें हैं यानी मेरी जितनी समझ के स्तर के लियें और यह मेरे अतिरिक्त उनके लियें भी हो सकती हैं जो मुझ जितनी समझ वाले स्तर पर हों अतः यदि जो भी मुझें पढ़ रहा हैं वह मेरी अभिव्यक्ति को अपने अनुभव के आधार पर समझ पा रहा हैं तो ही मुझें पढ़े क्योंकि समझ के आधार पर मेरी ही तरह होने से वह मेरे यानी उसके ही समान हैं जिसके लियें मेरी अभिव्यक्ति हैं और यदि अपनें अनुभवों के आधार पर नहीं समझ पा रहा अर्थात् उसे वह अनुभव ही नहीं हैं जिनके आधार पर मैं व्यक्त कर रहा हूँ तो वह मेरे जितने समझ के स्तर पर नहीं हैं, मेरे यानी उसके जितनें समझ के स्तर पर जिसके लियें मेरी यह अभिव्यक्ति थी है और अनुकूल रहा तो भविष्य में भी रहेगी। मेरी अभिव्यक्ति के शब्द मेरी उंगलियाँ हैं जो मेरे उन अनुभवों की ओर इशारा कर रही हैं जिन अनुभवों के आधार पर मैं अभिव्यक्ति करता हूँ यदि पढ़ने वाले के पास या सुनने वालें के पास वह अनुभव ही नहीं हैं या उनकी पहचान ही नहीं हैं तो जिनके आधार पर अभिव्यक्ति हैं तो वह खुद के अनुभवों से तुलना नहीं कर पायेगा जिनकी ओर मैंने इशारा किया हैं जिससें मेरी अभिव्यक्ति उसकी समझ से परें होगी नहीं तो फिर वह अनुभवों का ज्ञान नहीं होने से जिनके आधार पर अभिव्यक्ति हैं वह उसके किन्ही अन्य अनुभव से तुलना कर वह ही समझ लेगा जिनकी ओर मैं इशारा ही नहीं कर रहा यानी मुझें गलत समझ लेगा।

Yoga In Reality

योग क्या हैं?
जो हमारा हमारें समुचित अस्तित्व से जुड़ाव हैं चाहें हमारा वह अस्तित्व हमारी वास्तविकता यानी शून्य हो या फिर जो संकुचितता के महत्व के ज्ञान के परिणाम स्वरूप उसे किसी समय और स्थान तथा उचितता के अनुकूल होने पर संकुचितता को स्वीकार लेने पर जो यथार्थ सिद्ध होता हैं वह हमारा अज्ञान अर्थात् अनंत यानी प्रत्येक आकर, उसका स्वयं के हर भाग से जो जुड़ाव या जोड़ हैं था और जो अनंत काल तक रहेगा वही जोड़ या जुड़ाव ही योग हैं पर हम हमारें समुचित अस्तित्व के इस जुड़ाव का ज्ञान इस कदर नहीं होने से कि जिससें उसका अनुभव या उसकी अनुभूति भी नहीं की जा सकें जुड़ कर भी हमारें अज्ञान के कारण नहीं जुड़े हैं और इसका कारण यही हैं कि हमनें हमारें समुचित शून्य और अनंत अस्तित्व पर से इस कदर अपना ध्यान हटा रखा हैं कि हम उस पर ध्यान चाह कर भी नहीं दें पातें इसलियें हम सर्वप्रथम हमारें ध्यान को साधते हैं और फिर विभिन्न तरीकों से हमारें अस्तित्व के हर भाग पर ध्यान देते हैं फिर धीरे धीरे हमारा ध्यान हमारें द्वारा हमारें समुचित शून्य और अनंत अस्तित्व पर दिया जाने योग्य हो जाता हैं जिससें कि भिन्नता प्रतीत करवानें वाला अज्ञान मिट जाता हैं और हम अनुभव के आधार पर भी शून्य और अनंत अस्तित्व से एक होकर अनंत और शून्य हो सकते हैं। जो जितना अधिक मानता ही नहीं अपितु माननें के परिणाम स्वरूप स्वयं के पूरे अस्तित्व से जुड़ाव को जानने के आधार पर भी एक हैं वह उतना बड़ा योगी हैं। क्योंकि वास्तविकता में तो हम एक ही हैं पर मान लेने से की हम भिन्न हैं हम एक से अनेक हो गयें अतः यदि हम पुनः मान लें कि हम अनेक नहीं अपितु जो हैं वह और जो नहीं हैं वह भी एक ही हैं तो पुनः एक हो सकतें हैं, पुनः जुड़ सकतें हैं। इस ध्यान योग को कर लेने से ही योग करने के सही अर्थों की पूर्ति हैं; हाँ! इससें ही यथा अर्थों में हमारा हमसें योग हैं यानी जुड़ाव हैं। ध्यान योग ही यथार्थ योग हैं और ध्यान योग से ही यथार्थ योग की सिद्धि हैं।

जो जितना अधिक मानता ही नहीं अपितु माननें के परिणाम स्वरूप स्वयं के पूरे अस्तित्व से जुड़ाव को जानने के आधार पर भी एक हैं वह उतना बड़ा योगी हैं। क्योंकि वास्तविकता में तो हम एक ही हैं पर मान लेने से की हम भिन्न हैं हम एक से अनेक हो गयें अतः यदि हम पुनः मान लें कि हम अनेक नहीं अपितु जो हैं वह और जो नहीं हैं वह भी एक ही हैं तो पुनः एक हो सकतें हैं, पुनः जुड़ सकतें हैं। इस ध्यान योग को कर लेने से ही योग करने के सही अर्थों की पूर्ति हैं; हाँ! इससें ही यथा अर्थों में हमारा हमसें योग हैं यानी जुड़ाव हैं। ध्यान योग ही यथार्थ योग हैं और ध्यान योग से ही यथार्थ योग की सिद्धि हैं।

- रुद्र एस. शर्मा (aslirss)
[समय / दिनांक - १६:०९ / २१.०२.२०२२]