सुहानी को भीड़ पसंद नहीं थी, लेकिन अकेलापन उससे भी ज़्यादा डराता था। शहर की यह शाम भी कुछ वैसी ही थी—आधी भागदौड़ में डूबी हुई, आधी थकी हुई। वह कैफ़े के कोने वाली कुर्सी पर बैठी थी। सामने मेज़ पर कॉफी का कप रखा था, जिसमें से उठती भाप जैसे उसकी उलझी हुई सोच को और गहरा कर रही थी। मोबाइल उसकी हथेली में था, लेकिन स्क्रीन देखे बिना ही वह उसे घुमाए जा रही थी। ज़िंदगी बाहर से जितनी सुलझी हुई दिखती है, अंदर से उतनी ही उलझी हुई होती है— सुहानी इसका जीता-जागता उदाहरण थी।
वेलेंटाइन- डे, एक अधूरी शुरुआत - 1
पार्ट - 1सुहानी को भीड़ पसंद नहीं थी, लेकिन अकेलापन उससे भी ज़्यादा डराता था।शहर की यह शाम कुछ वैसी ही थी—आधी भागदौड़ में डूबी हुई, आधी थकी हुई।वह कैफ़े के कोने वाली कुर्सी पर बैठी थी। सामने मेज़ पर कॉफी का कप रखा था, जिसमें से उठती भाप जैसे उसकी उलझी हुई सोच को और गहरा कर रही थी। मोबाइल उसकी हथेली में था, लेकिन स्क्रीन देखे बिना ही वह उसे घुमाए जा रही थी।ज़िंदगी बाहर से जितनी सुलझी हुई दिखती है, अंदर से उतनी ही उलझी हुई होती है—सुहानी इसका जीता-जागता उदाहरण थी।उसी वक्त कैफ़े का ...Read More
वेलेंटाइन- डे, एक अधूरी शुरुआत - 2
PART–2सुहानी को घर पहुँचते ही एहसास हुआ कि कुछ छूट गया है।बैग खोला।डायरी थी।चाबियाँ थीं।मोबाइल था।लेकिन चार्जर नहीं माथे पर हाथ रखा और गहरी साँस ली।“ग्रेट, सुहानी… आज का दिन भी अधूरा ही रहेगा।”चार्जर कोई बड़ी चीज़ नहीं थी,लेकिन मोबाइल का प्रतिशत 18% दिखा रहा थाऔर सुहानी जानती थी—आज उसे खुद से बचने के लिए मोबाइल की ज़रूरत पड़ेगी।कैफ़े याद आया।वही कोने वाली मेज़।और सामने बैठा वह लड़का…हर्ष।उसका चेहरा अनायास ही आँखों के सामने आ गया।शांत, सादा, बिना ज़्यादा सवाल किए बस सुनने वाला।सुहानी ने खुद को झटका।“बस एक अजनबी था,”उसने मन ही मन कहा।उधर हर्ष अपने कमरे ...Read More
वेलेंटाइन- डे, एक अधूरी शुरुआत - 3
part -3सुहानी मोबाइल को देखे जा रही थी।स्क्रीन पर वही शब्द रुके हुए थे—“Harsh is typing…”उसने एक पल लिए आँखें बंद कर लीं।जैसे उस एक लाइन में सिर्फ़ कोई मैसेज नहीं,बल्कि बहुत कुछ छुपा हो।उसने खुद से सवाल किया।“मैं इसे इतना सीरियस क्यों ले रही हूँ?”मैसेज आया।हर्ष:“शायद अचानक मैसेज करना अजीब लगे…लेकिन कल अच्छा लगा आपसे बात करके।”सुहानी ने पढ़ा। ब्लू टिक नहीं गया।उसने मोबाइल उल्टा रख दिया।हर्ष कुर्सी पर पीछे टिक गया।मैसेज सेंड हो चुका था।अब कुछ भी उसके हाथ में नहीं था।वर्क डैशबोर्ड खुला था—टास्क्स, डेडलाइन्स, मीटिंग्स।लेकिन दिमाग़ वहीं अटका था—seen होगा या नहीं?वर्क फ्रॉम होम ...Read More
वेलेंटाइन- डे, एक अधूरी शुरुआत - 4
Part- 4सुहानी ने लैपटॉप खोला।स्क्रीन पर मीटिंग इनवाइट पहले से खुला था।समय में अभी पाँच मिनट बाकी थे,लेकिन उसका जैसे पहले ही लॉग-इन हो चुका था।वह जानती थी—यह सिर्फ़ एक प्रोफेशनल मीटिंग नहीं है।यह पहली बार होगाजब हर्ष उसे सामने से देखेगा,बिना कैफ़े की भीड़ के,बिना इत्तेफ़ाक़ की आड़ के।उसने बाल ठीक किए।कैमरा ऑन किया, फिर तुरंत ऑफ।“मैं इतना नर्वस क्यों हो रही हूँ?”“वह सिर्फ़ एक को-वर्कर है।”उधर हर्ष अपने कमरे में बैठा था।पीछे दीवार पर सादा सा शेल्फ,पास में कॉफी का मग।उसने लैपटॉप स्क्रीन को देखा।मीटिंग शुरू होने में दो मिनट।उसने कभी किसी क्लाइंट कॉल से पहलेइतना नहीं ...Read More
वेलेंटाइन- डे, एक अधूरी शुरुआत - 5
part- 5सुहानी ने मोबाइल को देर तक देखा।हर्ष का voice note अब भी वहीं था—सुना हुआ, लेकिन महसूस किया गया।उसका मन बार-बार उसी सवाल पर अटक रहा था—अगर किसी आवाज़ से दिल काँप जाए,तो क्या उसे सुनना ज़रूरी होता है?वह जानती थी,डर हमेशा शोर नहीं करता।कभी-कभी वह बहुत शांत होता है।उधर हर्ष ने लैपटॉप खोला।सुहानी का मैसेज पढ़ते हीउसने टाइप करना शुरू किया—“ज़रूरी नहीं…लेकिन कभी-कभी सच से भागने काएक ही तरीका होता है—उसे सुन लेना।”मैसेज भेजते हीउसने स्क्रीन बंद कर दी।वह इंतज़ार नहीं करना चाहता था।दोपहर तकसुहानी ने कोई जवाब नहीं दिया।काम में मन नहीं लग रहा था।डैशबोर्ड ...Read More