PART–2
सुहानी को घर पहुँचते ही एहसास हुआ कि कुछ छूट गया है।
बैग खोला।
डायरी थी।
चाबियाँ थीं।
मोबाइल था।
लेकिन चार्जर नहीं था।
उसने माथे पर हाथ रखा और गहरी साँस ली।
“ग्रेट, सुहानी… आज का दिन भी अधूरा ही रहेगा।”
चार्जर कोई बड़ी चीज़ नहीं थी,
लेकिन मोबाइल का प्रतिशत 18% दिखा रहा था
और सुहानी जानती थी—
आज उसे खुद से बचने के लिए मोबाइल की ज़रूरत पड़ेगी।
कैफ़े याद आया।
वही कोने वाली मेज़।
और सामने बैठा वह लड़का…
हर्ष।
उसका चेहरा अनायास ही आँखों के सामने आ गया।
शांत, सादा, बिना ज़्यादा सवाल किए बस सुनने वाला।
सुहानी ने खुद को झटका।
“बस एक अजनबी था,”
उसने मन ही मन कहा।
उधर हर्ष अपने कमरे में बैठा था।
लैपटॉप खुला था, लेकिन कोड की लाइनें धुंधली लग रही थीं।
उसका ध्यान बार-बार बैग की ओर जा रहा था।
आख़िरकार उसने बैग खोला।
चार्जर वहीं रखा था।
सफेद रंग का, थोड़ा सा पुराना,
लेकिन बहुत संभालकर रखा हुआ।
हर्ष ने उसे हाथ में लिया।
एक पल के लिए सोचा—
“कल वापस कर दूँगा।”
फिर रुक गया।
कल कैसे?
कहाँ?
उसके पास न नंबर था, न कोई पहचान।
सिर्फ़ एक याद…
और एक अधूरा “शायद।”
हर्ष ने चार्जर मेज़ पर रखा और वापस लैपटॉप की ओर देखा।
लेकिन स्क्रीन अब भी वही दिखा रही थी—
कुछ नहीं।
अगली शाम।
वही कैफ़े।
वही समय।
सुहानी अंदर आई, थोड़ी झिझक के साथ।
उसकी नज़रें सीधे उसी कोने की ओर गईं।
खाली।
उसके दिल में हल्की सी निराशा उतरी।
वह खुद नहीं जानती थी क्यों।
उसने काउंटर से कॉफी ली और बैठ गई।
पाँच मिनट।
दस मिनट।
“तुम सच में बेवकूफ़ हो,”
उसने खुद से कहा।
“किसी अजनबी से क्या उम्मीद कर रही हो?”
वह उठने ही वाली थी कि
कैफ़े का दरवाज़ा खुला।
हर्ष अंदर आया।
इस बार उसकी नज़रें सीधे सुहानी पर ठहर गईं।
जैसे वह पहले से जानता हो कि
वह यहीं होगी।
सुहानी भी उसे देख चुकी थी।
उसका दिल अजीब तरह से तेज़ हो गया।
हर्ष उसके पास आया।
“मैं सोच ही रहा था… शायद आप आएँ।”
सुहानी ने भौंहें उठाईं।
“शायद?”
हर्ष ने बैग से चार्जर निकाला।
“आप यह भूल गई थीं।”
सुहानी ने राहत की साँस ली।
“थैंक यू… सच में। मुझे लगा वापस नहीं मिलेगा।”
“मुझे लगा,”
हर्ष ने हल्के से कहा,
“कि आप आएँगी।”
सुहानी बैठ गई।
हर्ष भी।
इस बार ख़ामोशी अजीब नहीं थी।
जैसे दोनों को पता हो
कि यह चुप्पी भी कुछ कह रही है।
“आप रोज़ आती हैं?”
सुहानी ने पूछा।
“नहीं,”
हर्ष ने मुस्कराकर कहा,
“बस… जब लगता है कि घर छोटा पड़ रहा है।”
सुहानी समझ गई।
“वर्क फ्रॉम होम?”
उसने फिर पूछा।
“हाँ। और आप?”
“वर्क फ्रॉम खुद से,”
वह बोली।
“कभी-कभी सबसे मुश्किल नौकरी।”
हर्ष ने सिर हिलाया।
“सच।”
कुछ पल बाद सुहानी का फोन वाइब्रेट हुआ।
उसने स्क्रीन देखी…
और तुरंत लॉक कर दिया।
हर्ष ने फिर वही बदला हुआ चेहरा देखा।
इस बार वह चुप नहीं रहा।
“अगर ज़्यादा निजी न हो,”
उसने धीरे से कहा,
“तो… क्या वेलेंटाइन आपको परेशान करता है?”
सुहानी चौंक गई।
“क्या?”
“मतलब,”
हर्ष थोड़ा झिझका,
“आजकल हर जगह वही है… और कल आपने कहा था,
कुछ पुरानी आदतें पीछा नहीं छोड़तीं।”
सुहानी ने कॉफी के कप को घूरा।
कुछ सेकंड।
फिर बोली,
“कुछ तारीख़ें अच्छी यादें नहीं लातीं।”
“14 फरवरी?”
हर्ष ने अंदाज़ा लगाया।
सुहानी ने कुछ नहीं कहा।
बस हल्का सा सिर हिला दिया।
हर्ष ने और कुछ नहीं पूछा।
वह समझ गया—
कुछ सवालों का जवाब वक्त देता है।
उस रात।
हर्ष ने मोबाइल उठाया।
काफी देर तक स्क्रीन देखता रहा।
फिर एक मैसेज टाइप किया।
“आज अच्छा लगा आपसे दोबारा मिलकर।”
कुछ सेकंड रुका।
फिर डिलीट कर दिया।
सुहानी भी उसी वक्त मोबाइल देख रही थी।
एक अनजान नंबर से missed call।
उसने वापस कॉल नहीं किया।
उसने मोबाइल साइड में रखा
और छत की ओर देखते हुए सोचा—
“क्यों कुछ लोग बिना कोशिश किए
इतने क़रीब लगने लगते हैं?”
अगले दिन सुबह,
सुहानी के मोबाइल पर एक नोटिफ़िकेशन चमका—
“Harsh is typing…”
और उसी पल,
हर्ष के सामने लैपटॉप स्क्रीन पर
एक ईमेल खुला…
जिसमें सुहानी का नाम था।
दोनों में से किसी को नहीं पता था
कि यह सिर्फ़ एक मैसेज नहीं,
बल्कि एक ऐसी शुरुआत है
जो 14 फरवरी तक
सब कुछ बदल देने वाली है…
आगे जानने के लिए हमारे साथ बने रहे ।
BY............ Vikram kori..