Hindi Quote in Story by ANAMCARA

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अकेलापन..
दीवाली की तैयारी की घर में अलग ही रौनक थी। हर कोई किसी न किसी काम में लगा हुआ था। किचन से आती मिठाई और नमकीन की खुशबू इस दिन को और खास बना रही थी। आँगन में दादी मिट्टी के दीये तैयार कर रही थीं और उनके पास बैठी सिया बत्तियाँ बनाने में व्यस्त थी। तभी किचन से आती बर्तनों की खनक के बीच माँ की आवाज गूंजी, “सिया, इधर आकर मेरी मदद करवा दे।” सिया सिर्फ 15 साल की थी, लेकिन घर में उसे अब बड़ी बेटी की तरह जिम्मेदारियां निभानी थीं। थोड़ी झिझक के साथ जब वह किचन की देहरी पर पहुंची, तो लड्डू बना रही चाची ने हल्का-सा मुस्कुराते हुए कहा, “सिया, अगर खेलना हो गया हो तो सबके लिए चाय बना लो। देखो, वेदु तुमसे छोटी है, फिर भी कैसे हाथ बँटा रही है।” सिया ने उम्मीद भरी नजरों से माँ की तरफ देखा, लेकिन माँ ने कड़ाही से नमकीन निकालते हुए बस इतना कहा, “चाची ठीक कह रही हैं।” यह सुनकर सिया चुपचाप चाय बनाने में लग गई।
​जब शाम को सब दीवाली की जगमगाहट में डूबे हुए थे, तो सिया छत पर अकेली दूर आती रोशनी को निहार रही थी। शायद वह खुद को ही ढूँढ़ने की कोशिश कर रही थी। वह अक्सर सोचती थी कि आखिर वह ऐसा क्या करे जिससे सबको लगे कि वह भी इस घर का हिस्सा है? क्या घर में सिर्फ लोगों के काम आना और पढ़ाई करना ही पहचान का पैमाना है? वक्त के साथ सिया अपने ही अंदर कहीं खोती चली गई। उसे जब कोई बात चुभती, तो वह चुप हो जाती, और घरवाले उसकी इस खामोशी को उसका घमंड समझ लेते। जबकि वह तो बस यह चाहती थी कि जैसी वह है, सब उसे वैसे ही अपना लें।
​एक दिन अपनी 12वीं की मार्कशीट हाथ में लेते हुए उसे याद आया कि कैसे उसने सबके दिल में जगह बनाने के लिए दिन-रात मेहनत करके 75% हासिल किए थे। उसे लगा था कि सब खुश होंगे, लेकिन उसी दिन वेदु का 10वीं का रिजल्ट भी आया था। वेदु हमेशा टॉप करती थी और उससे 85% आने की उम्मीद नहीं थी।
उसके 85% आने पर घर में सबको इतना दुख हुआ था कि वे यह भी भूल गए थे कि आज सिया का भी रिजल्ट आया है।
अपने ख्यालों में डूबी सिया ने खुद से कहा, “चलो सिया, कुछ तुममें ही कमी होगी... या शायद मैं ही पीछे छूट जाती हूँ?” तभी आँगन से माँ की आवाज ने उसे फिर हकीकत में खींच लिया। किचन में काम करते हुए उसने सुना कि चाची और माँ गर्व से वेदु की तारीफ कर रही हैं, और माँ कह रही हैं, “मुझे तो बस सिया की फिक्र होती है, न इसे काम-काज आता है, न पढ़ाई में मन है।” रोटी बनाती सिया के मन में उधेड़बुन चल रही थी कि अगर कोई थोड़ा सा भी उस पर भरोसा कर लेता या प्यार से पूछ लेता कि उसके सपने क्या हैं, तो शायद वह भी कुछ कर पाती।
​घर की इन घुटन भरी दीवारों के बीच, जब सिया ने बाहर की दुनिया में थोड़ी राहत और अपनापन तलाशना शुरू किया, तो उसकी जिंदगी में राज आया। राज उसकी चुप्पी को कभी घमंड नहीं समझता था, बल्कि प्यार से पूछता— “आज फिर चुप हो?” धीरे-धीरे सिया अपनी छोटी-छोटी बातें, घर के ताने और मन का हर डर राज से कहने लगी। राज उसे समझाता नहीं था, बस उसका साथ देता था। जब राज ने उससे पूछा कि वह आगे क्या करना चाहती है, तो सिया कुछ देर चुप रही, क्योंकि इतने सालों में किसी ने उससे यह सवाल कभी नहीं पूछा था। राज के रूप में उसे वह अपनापन मिल गया जिसकी तलाश उसे बचपन से थी। इसी सहारे के चलते, जब घर में शादी की बात उठी, तो उसने राज का नाम लिया और राज ने भी हामी भर दी। सिया को लगा कि अब उसे रोज-रोज खुद को साबित नहीं करना पड़ेगा।
​लेकिन वह दिन आया जब सिया सब तैयार होकर राज का इंतजार करती रही। सुबह से शाम ढल गई, पर राज नहीं आया। घर की नजरों में जो सवाल और तंज थे, वे किसी तीर की तरह चुभ रहे थे। रात करीब 11 बजे राज का फोन आया और उसने बेफिक्र अंदाज में कहा कि घर की किसी समस्या के चलते वह आ नहीं पाया। उस एक फोन ने सिया के अंदर वर्षों से जमा हुआ बाँध तोड़ दिया। वह फूट-फूटकर रोई, अपनी जिंदगी के हर उस पल को याद करके रोई जहाँ उसे किसी अपने का साथ चाहिए था, जो उसे कभी नहीं मिला।
​रोते-रोते जब उसकी आँखें सूख चुकी थीं, तो खिड़की से सूरज की पहली किरण उसके कमरे में दाखिल हुई। उस गुलाबी रोशनी ने सिया के मन को एक ऐसा सुकून दिया जिसकी तलाश उसे उम्रभर थी— अपने अकेलेपन से दोस्ती करने का सुकून, खुद को खुश रखने का सुकून। सिया के चेहरे पर एक नई चमक के साथ हल्की-सी मुस्कान उभरी। वह उठी, अपना मनपसंद जोड़ा पहना और अच्छे से तैयार हुई। उसकी आँखों में अब उदासी नहीं, बल्कि अपने सपनों को जीने की जिद थी। जिंदगी में पहली बार, सिया को किसी और के जरिए अपनी पहचान साबित करने की जरूरत नहीं महसूस हुई; उसे सिर्फ खुद को पहचानना था।
☆अनामकारा

Hindi Story by ANAMCARA : 112037268
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