"मैं बदलने चली थी"
मैं बदलने चली थी किसी रोज़।
सूरज से पहले उठी।
बाल नहीं संवारे।
चेहरा नहीं धोया।
बस नंगे पांव चल पड़ी।
अपने ही घर से बाहर।
अपने ही अंधेरे की तरफ।
रास्ते में मिलीं मेरी पुरानी आदतें।
वो जो कहती थीं "लोग क्या कहेंगे"।
मैंने कहा …."कहने दो।"
और आगे बढ़ गई।
मिलीं मेरी पुरानी ख़ामोशियां।
वो जो गले में अटक कर
लहू बन गई थीं।
मैंने उन्हें थूक दिया।
और पहली बार
ऊंची आवाज़ में सांस ली।
धूप आने से पहले
मैंने अपना अंधेरा नहीं छुपाया।
उसे गले लगाया।
कहा …."तूने मुझे बचाया था।
जब कोई नहीं था तब तू था।
अब तू जा।
मैं उजाले की दोस्त बन गई हूं।"
लोगों ने पूछा …"क्या हुआ?"
मैंने कहा …"कुछ नहीं।
बस वो दाग जो चांद से उधार लिए थे,
वापस कर दिए।
अब मेरे चेहरे पर
मेरी ही रातें हैं।
और वो खूबसूरत हैं।"
किसी ने कहा "तू टूट गई थी न?"
मैं हंसी।
"हां। तारों की तरह।
और तारों का काम ही है टूटना।
ताकि किसी की मन्नत पूरी हो।
आज मैं अपनी मन्नत हूं।"
मैं बदलने चली थी।
और बदल गई।
बिना ऐलान के।
बिना तमाशे के।
जैसे दरख्त बदलते हैं
एक दिन पत्ते गिर जाते हैं।
दूसरे दिन कोंपल आ जाती है।
किसी को पता नहीं चलता।
पर दरख्त को पता होता है।
कि वो अब पहले वाला नहीं रहा।
अब मैं सूरज के साथ उठती हूं।
अंधेरे को साथ लेकर।
दागों को साथ लेकर।
टूटन को साथ लेकर।
क्योंकि बदलना मतलब
पुराना मिटाना नहीं होता।
बदलना मतलब
पुराने को सीने में रखकर
नया जीना होता है।
मैं बदलने चली थी किसी रोज़।
और वो रोज़...
आज था।
प्राची गुर्जर…..