यही बेहतर है मुझको गूँगा कर दे
नहीं तो सच को मैं सच ही कहूँगा ।
बयानों में भले हो कोई लेकिन
तेरी खामोशियों में, मैं रहूँगा ।
सयानों की हँसी हँसता रहा मैं
मैं बच्चों की तरह से कब हँसूँगा ।
तेरी फ़ेहरिस्त का हिस्सा नहीं हूँ
समय हूँ, कटते-कटते ही कटूँगा ।
देवेन्द्र आर्य