है ना खूबसूरत सा अभिनय
अंतरमन में कितनी दुविधा फिर भी मुस्कुराता हुआ चेहरा
कितना श्रेष्ठ अभिनय है ना ,
तुम समझते ही नही रोज़ दर्शक बन देखते भी हो
अलग अलग परिस्थिति अलग अलग भाव
अनेक उलझनों में भी रोज़ सुलझती हुई
कितने सारे रंगो को एक साथ तुमने डाला है मुझपर
तुम समझते ही नहीं दर्शक बन रंगो के खेल को देखते भी हो ,
कितनी उहा पोह में भी शांत सी बह रही हूं
रोज़ तुमसे पूछती आज सब अच्छा था ना
तुम समझते ही नही रोज़ दर्शक बन ताली भी बजाते हो
है ना श्रेष्ठ अभिनय जीवन का