अकेली राह का मुसाफिर हुँ में.,
जिसका काेई ठिकाना नही हैं.
ऐसी हवा हु में जिसका काेई फसाना नही हैं....
चलती है मेरे साथ मेरी तन्हाइया.,
आैर जलता रेहता हु में एक शमा की तरह.,
जिसका बुजने का काेई मंज्जर नही हैं....
अकेली राह का मुसाफिर हुँ में.,
जिसका काेई ठिकाना नही हैं....
-Pruthvi Solanki