हम पे कुछ भी लिखा नहीं जाता
अपनी क़िस्मत है हाशियों वाली
भूखे बच्चे को माँ ने दी रोटी
चंदा मामा की लोरियों वाली
आज फिर खो गई है दफ़्तर में
तेरी अर्ज़ी शिकायतों वाली
तू भी फँसता है रोज़ जालों में
हाय क़िस्मत ये मछलियों वाली
भूल जाते, मगर नहीं भूले
अपनी बोली महब्बतों वाली
द्विजेन्द्र 'द्विज'